कोरोना से पहले मां की जान गई, फिर पिता भी नहीं रहे, तीन बेटियों ने ही दिया अर्थी को कंधा, देखता रहा पूरा गांव

अरवल्ली। गुजरात में अरवल्ली जिले की मोडासा तहसील के एक गांव में तीन बेटियों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया। पिता की मौत कोरोना से हुई थी। पिता से कुछ समय पहले मां की जान भी कोरोना से ही गई थी। उन बहनों का कोई भाई नहीं था। उनके सिर से पिता का साया उठा तो बिलखने लगीं। दुख की घड़ी में कोई सगा उन्हें संभालने वाला नहीं रह गया। ​लोगों ने जब उन्हें कहा कि, पिता का दाह संस्कार किया जाना है, तो वे तीनों श्मशान जाने को तैयार हो गईं। उन्होंने भाई की कमी महसूस नहीं होने दी और पिता की अर्थी को कंधा दिया।

भाई नहीं, मां-बाप भी नहीं रह गए बेटियों के

भाई नहीं, मां-बाप भी नहीं रह गए बेटियों के

यह घटना लिंभोई गांव की है। जहां कोरोना महामारी के कारण कई परिवार खत्म हो गए हैं। महामारी की दूसरी लहर में जहां बहुत से लोग अनाथ हो गए, वहीं बच्चों के सिर से मां-बाप का साया उठ गया। लिंभोई गांव में सुरेश भाई नामक शख्स थे, जो तीन बेटियों के पिता थे। कुछ दिनों पहले सुरेश भाई की पत्नी को कोरोना हो गया था। जिससे वो चल बसीं। पत्नी के अंतिम संस्कार के बाद खुद सुरेश भाई भी कोरोना संक्रमित हो गए और उनकी भी मृत्यु हो गई।

श्मशान में बड़ी बेटी ने मुखाग्नि दी

श्मशान में बड़ी बेटी ने मुखाग्नि दी

मां-बाप दोनों को खोने पर उनकी बेटियों पर मानो पहाड़ टूट पड़ा हो। वे अनाथ रह गईं। उनका कोई सगा भाई भी नहीं है। उन्होंने ही अपने पिता की अर्थी को कंधा देने का फैसला किया। अस्पताल से जिस समय पिता की लाश को श्मशान ले जाया जा रहा था, तब गांव के लोग भी देख रहे थे। काफी लोग इन बेटियों के साथ हो लिए। पिता के अंतिम संस्कार के समय बड़ी बेटी ने मुखाग्नि दी। उस वक्त वहां मौजूद सभी गम-गीन थे।

पुत्र की तरह पाल रहे थे ​बेटियों को

पुत्र की तरह पाल रहे थे ​बेटियों को

बेटियों के आंसू बह रहे थे और परिचित लोग दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे। एक बुजुर्ग ने कहा कि, सुरेशभाई के कोई बेटा नहीं हुआ। उन्होंने अपनी इन बेटियों को ही पुत्र-प्रेम दिया। सुरेश चाहते थे कि बेटियां उनका नाम रोशन करें। मगर, किसी को क्या पता था कि ख्वाब पूरा होने से पहले वे दुनिया को अलविदा कह कर इन्हें अकेले छोड़ जाएंगे।

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