प्राचीन भारतीय ज्ञान और विज्ञान के संबंध को दर्शाती है यह संगोष्ठी: प्रो. पूनम टंडन
DDU University News Uttar Pradesh: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित 'सोशियोलॉजिकल डिसकोर्स इन इंडियन नॉलेज सिस्टम' विषयक द्विदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि गोविंद बल्लभ पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो. बद्रीनारायण (प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक एवं कवि) द्वारा किया गया। संवाद भवन में आयोजित उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने किया। विशिष्ट अतिथि अधिष्ठाता कला संकाय प्रो. राजवंत राव रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत वाग्देवी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर हुई। संगीत एवं ललित कला विभाग के विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना तथा कुलगीत गायन किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की *कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि* विश्वविद्यालय की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित यह अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी प्राचीन भारतीय ज्ञान और विज्ञान के संबंध को दर्शाती है। कुलपति ने भारत सरकार के 'वन नेशन, वन रजिस्ट्रेशन' पहल के अंतर्गत विश्वविद्यालय द्वारा शोध को बढ़ावा देने के प्रयासों का भी उल्लेख किया।

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अपने उद्बोधन में *मुख्य अतिथि प्रो. बद्रीनारायण ने कहा कि* भारतीय ज्ञान परम्परा ऐसे लोकतंत्र की बात करता है जहां न केवल मानव अपितु सभी जीवों का कल्याण हो। समाज ज्ञान को पैदा करता है और उसका परिमार्जन करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा खुद में समृद्ध, वैज्ञानिक और सर्वजनहित के गुणों को धारण किए हुए है। भारतीय परम्परा में व्याप्त लोकगीत, अनुष्ठान, जन रीतियां सम्पूर्ण जीव कल्याण का उपदेश देती है, लोकगीत और अनुष्ठान के माध्यम से नदी, मिट्टी, वायु, जल का आह्वाहन किया जाता है। भारतीय समाज ऐसा समाज है जहां पेड़ से पत्ती तोड़ने के लिए भी सिस्टम है, किस प्रकार हम उन संसाधनों का उपयोग करते हुए उनका ख्याल रखें। भारतीय ज्ञान को समझने और सीखने के लिए समाज वैज्ञानिकों को क्षेत्र अध्ययन पर जोर देना होगा और सामान्यजन में व्याप्त ज्ञान को भावपूर्ण ढ़ंग से सीखने की जरूरत है।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के *विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. राजवंत राव ने कहा कि* भारतीय ज्ञान परंपरा ही भारतीय संस्कृति का निर्माण करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति अन्योन्याश्रीत है। कर्म का सिद्धांत जो वैदिक काल से लेकर आजतक हर भारतीय के मन में बसा है और निरंतर प्रवाहमान है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है इसकी नित्य नूतन परिवर्तन की प्रकृति और जिस कारण भारतीय ज्ञान परंपरा बिना नष्ट हुए निरंतर प्रवाहमान है। भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन समाजशास्त्र विभाग का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में स्वागत वक्तव्य संगोष्ठी निदेशक प्रो. अनुराग द्विवेदी ने दिया। उद्घाटन सत्र का संचालन शोध छात्रा अदिति सिंह तथा धन्यवाद संगोष्ठी समन्वयक डॉ. मनीष कुमार पांडेय ने किया।
उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, शहर के गणमान्य नागरिक समेत बड़ी संख्या में विद्वतजन और विद्यार्थी उपस्थित रहे।












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