Mother's Day: एक ' मां ' जिसने हौसलों से भरी उड़ान, कई बार मिली हार, आज हैं ' रत्न '
Mother's Day 2025 Story Sangita Pandey Gorakhpur: आज मदर्स डे है। मां जिसे भगवान से भी बड़ा दर्जा मिला है , उसकी ममता के आगे सब बेकार है। मां सिर्फ दुलार ही नहीं देती बच्चे के जीवन को नई दिशा और गति देने का भी काम करती है। ' मां ' को शब्दों में बयां करना संभव नहीं है। आज के इस खास दिन पर हम एक ऐसी मां की कहानी आपको बताने जा रहे हैं जिसने अपने बच्चों की खुशी के लिए अपनी खुशियों का त्याग किया। पहले खुद आत्मनिर्भर बनीं और अब अपने बच्चों का भविष्य संवार रहीं है। हम बात कर रहे हैं गोरखपुर रत्न अवार्ड से सम्मानित, एक सफल महिला उद्यमी संगीता पांडेय की। उन्होंने वन इंडिया हिंदी रिपोर्टर पुनीत श्रीवास्तव से खास बातचीत की।
घोर संकटों का किया सामना
संगीता पांडेय आज उत्तर प्रदेश की सफल महिलाओं में शामिल है। सीएम योगी आदित्यनाथ के हाथों गोरखपुर रत्न का अवॉर्ड भी मिल चुका है। मिठाई के डिब्बे बनाने के व्यवसाय ने आज उन्हें नई पहचान दी है। आज उत्तर प्रदेश, बिहार ,उत्तराखंड , नेपाल सहित कई जगहों पर इनके डिब्बों की डिमांड है। लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं था। संघर्ष की कहानी रुला देगी। एक समय ऐसा था जब संगीता घोर आर्थिक संकटों का सामना कर रहीं थी। शादी हो चुकी थी। तीन बच्चों की भी जिम्मेदारी आ चुकी थी। समय काफी विपरीत था। एक एक पल पहाड़ समान लग रहे थे।

हौसलों से भरी उड़ान
इस विपरीत परिस्थिति में भी संगीता खुद के लिए, बच्चों के लिए , परिवार के लिए, समाज के लिए कुछ करना चाहती थीं। विपरीत परिस्थितियों के बाद भी इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हौसलों से उड़ान भरी, अपने सपनो को पंख दिया।
महज 1500 से शुरू किया काम
संगीता पांडेय ने साल 2013 में खुद को आत्म निर्भर बनाने की ठानी। लेकिन समस्याएं भी साथ थीं। पास में महज 1500 रुपए और एक साइकिल। संगीता ने घर पर ही मिठाई के डिब्बे बनाने का काम शुरू किया और साइकिल से दुकान दुकान सप्लाई करना शुरू किया।
समाज ने भी किया विरोध
जब संगीता खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए संघर्ष कर रहीं थी उस समय समाज के ताने और तरह तरह की बातें संगीता को सुनने को मिल रहीं थी। लेकिन संगीता ने अपने काम पर फोकस किया।

बच्चों को छोड़कर घर से निकलना सबसे बड़ी चुनौती
संगीता ने जब काम की शुरुआत की उस समय उनके तीनों बच्चे काफी छोटे थे। छोटी बेटी महज 9 माह की थी। संगीता की सामने सबसे बड़ी चुनौती इन बच्चों को छोड़कर घर से निकलने की थी। कई बार उनके मन में आय कि काम न करके बच्चों को ही देखा जाए।
बच्चों के भविष्य ने किया प्रेरित
संगीता बताती हैं कि एक तरफ जहां बच्चों को छोड़ कर घर से बाहर निकलना मेरे लिए सबसे कठिन चुनौती थी , वहीं बच्चों को बेहतर भविष्य देने की इच्छा ने मुझे सबसे ज्यादा प्रेरित किया। मुझे लगा इस समय में अगर मुझे अपने तीनों बच्चों को अच्छा भविष्य देना है तो मुझे संघर्ष करना पड़ेगा।
बनाया संतुलन
बच्चों और काम के बीच बनाया सामंजस्य
संगीता कहती हैं कि इस सब के बाद मैने काम जारी रखने और बच्चों के परवरिश के बीच सामंजस्य बनाया। इसमें बहन का सहयोग लिया। जब घर से जाती तो बहन बच्चों का ध्यान रखती थी।
खड़ा किया करोड़ों का कारोबार
धीरे धीरे संगीता की मेहनत रंग लाती गई। इनके बने मिठाई के डिब्बों की डिमांड बढ़ती गई। उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल तक मिठाई के डिब्बों की डिमांड होने लगी। आज संगीता का कारोबार बुलंदियों को छू रहा है। उनका कारोबार कई करोड़ का है।
हजारों महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
संगीता ने संघर्ष कर सिर्फ अपने जीवन में हों खुशियां नहीं लाई बल्कि हजारों महिलाओं को रोजगार दिया है।
बच्चों को दे रहीं अच्छी शिक्षा
आज संगीता अपने सपनो को उड़ान दे रहीं है। खुद आत्म निर्भर बनने के बाद बच्चों का भविष्य संवार रहीं है। बड़ा बेटा दिल्ली विश्वविद्यालय से बीबीए कर रहा है तो दोनों बेटियां अंबाला गुरुकुल से अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहीं है।
मां पर है गर्व
संगीता पांडेय पांडेय के तीन बच्चे हैं। एक बेटा और दो बेटियों। ये कहते हैं मेरी मां ने हम लोगों के लिए जो संघर्ष किया है उसे हम हर पल याद रखते हैं। हम भाग्यशाली हैं जो इनकी जैसी मां हमे मिली। हम इनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे।
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