चरित्र रखने वाले समाज को राज्य की कोई आवश्यकता नहीं- प्रोफेसर विश्वनाथ तिवारी
Gorakhpur News: गोरखपुर लिटफेस्ट का शुभारंभ शनिवार को प्रख्यात आलोचक व साहित्यकार प्रोफेसर विश्वनाथ तिवारी की अध्यक्षता में शुरु हुआ। अतिथि वक्ता के रुप में पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,मेयर डॉक्टर मंगलेश श्रीवास्तव ने अपने विचार व्यक्त किए।
पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र और साहित्य का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है क्योंकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि समस्त शासन प्रणालियों में यह न्यूनतम शासन की अवधारणा और व्यावहारिक रूप से स्वीकार्य होने के कारण सबसे बेहतर शासन प्रणाली है। गाँधीजी ने सभ्यता को नीति का पालन करने और इंद्रियों पर अंकुश रखने के रूप में परिभाषित किया। इस परिभाषा के अनुसार चरित्र रखने वाले समाज को राज्य की कोई आवश्यकता नहीं। यह कोई ज़रूरी नहीं कि जो विकसित हो वह सभ्य भी हो। लोकतंत्र की सबसे सुंदर बात यह है कि उसमें असहमति व विरोध की छूट है। आपातकाल के दौरान लेखक और पत्रकार सर्वाधिक प्रताड़ित किये गए थे क्योंकि लेखक और साहित्यकार सदैव लोकतंत्र का पक्षधर होता है और लिखते समय हर लेखक स्वयं को स्वाधीन मानता है। लेखन की बुनियाद है स्वाधीनता। दुनिया के बड़े से बड़े उल्लेखनीय साहित्य तानाशाही के विरोध में ही लिखे गए हैं। साहित्य के पक्ष में अगर कोई व्यवस्था खड़ी दिखती है तो वह लोकतंत्र है।

इस दौरान मेयर डॉक्टर मंगलेश श्रीवास्तव ने कहा कि गोरखपुर लिटफेस्ट गोरखपुर की विकास यात्रा में साहित्यिक विकास के मंच पर नया आयाम स्थापित कर रहा है। साहित्य जगत में लिटफेस्ट का यह छठा अध्याय इतिहास गढ़ेगा ऐसा विश्वास है।
मुख्य वक्ता कुलदीप सुम्बली उपाख्य अग्निशेखर ने कहा कि स्वामी अमरनाथ की भूमि से गुरु गोरखनाथ की भूमि पर आना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। गोरखपुर की भूमि में चुम्बकत्व है जो साहित्यप्रेमियों को बरबस ही खींच लेती है। आज के समय में यह विकट समस्या है कि हममें दूसरों को सुनने की आदत खत्म हो गई है। हमारे पूर्वाग्रह ने हमें ऐसा बना दिया है कि हम स्वभाव से लोकतांत्रिक न रहकर वह सुनना पसंद करने लगे हैं जो हमें सुनना पसंद है। स्वतंत्रता समानता व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तत्त्व आज व्यवाहरिकता से दूर हो रहे हैं। साहित्य शब्द को सबसे पहले कश्मीरी विचारक कुंतक ने प्रयोग में लाया। साहित्यकार स्वयं में एक राजसत्ता होता है। वह सत्ता का चाटुकार नहीं होता। लेखक स्वायत्त होता है। वह किसी रिमोट कंट्रोल का गुलाम नहीं होता। बुध्दिमत्ता और शक्ति के संयोग से किसी भी बड़ी समस्या का मानवीय समाधान किया जा सकता है। शब्द और कर्म की स्वायत्तता से समाज के परिवर्तन की यात्रा पूरी की जा सकती है। लोकतंत्र और साहित्य इस दृष्टि से एक दूसरे के पूरक हैं। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना एक महत्वपूर्ण पक्ष है। प्रश्न पूछना तो हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। प्रश्नों पर तो हमारे यहां उपनिषद हैं।












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