गूगल में जातिगत भेदभाव के आरोपों के बाद दुनियाभर में तीखा विरोध

वॉशिंगटन, 06 जून। गूगल में जातिगत भेदभाव की खबरें आने के बाद दुनियाभर की कई कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने अमेरिकी टेक कंपनी के सीईओ भारतीय मूल के सुंदर पिचाई को एक खुला पत्र लिखा है. पिछले हफ्ते अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने एक खबर छापी थी, जिसमें बताया गया था कि दलित कार्यकर्ता और इक्विटी लैब्स नामक संगठन की संस्थापक थेनमोजी सुंदरराजन का गूगल में होने वाला कार्यक्रम इसलिए रद्द कर दिया गया, क्योंकि कंपनी के कर्मचारियों ने उनके खिलाफ अभियान छेड़ दिया.
थेनमोजी सुंदरराजन दलित अधिकारों के लिए काम करने वाली एक जानीमानी कार्यकर्ता हैं जो अमेरिका में रहती हैं और लंबे समय से जातिगत भेदभाव के खिलाफ काम कर रही हैं. अप्रैल में 'दलित हिस्ट्री मंथ' के दौरान सुंदरराजन को गूगल न्यूज के कर्मचारियों को दलित अधिकारों और उनके साथ होनेवाले शोषण के बारे में जागरूक करने के लिए बुलाया गया था.
वॉशिंगटन पोस्ट लिखता है, "लेकिन, गूगल के कर्मचारियों ने कंपनी के उच्चाधिकारियों को ईमेल लिखने शुरू कर दिए जिनमें सुंदरराजन को हिंदू-विरोधी और हिंदुओं से नफरत करने वाला बताया गया." इस बारे में बहुत से कर्मचारियों ने नाम ना छापने की शर्त पर वॉशिंगटन पोस्ट से बातचीत में बताया कि "गूगल के इंटरानेट और मेलिंग लिस्ट में हजारों कर्मचारियों ने" सुंदरराजन के विरोध में संदेश लिखे.
तनुजा गुप्ता का इस्तीफा
अखबार लिखता है, "सुंदरराजन ने सीधे गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई से अपील की जो एक ऊंची जाति वाले परिवार से आते हैं. उन्होंने पिचाई से अनुरोध किया कि उनके कार्यक्रम को होने दिया जाए लेकिन उसे रद्द कर दिया गया. इस पर कुछ कर्मचारियों ने निष्कर्ष निकाला कि गूगल जानबूझ कर जातिगत भेदभाव को नजरअंदाज कर रही है. इसके बाद सुंदरराजन को कार्यक्रम में आमंत्रित करने वालीं गूगल न्यूज में वरिष्ठ अधिकारी तनुजा गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया."
यह भी पढ़ेंः अमेरिकी यूनिवर्सिटी ने जातिगत भेदभाव को नीति में शामिल किया
सात पेज लंबे अपने इस्तीफे में तनुजा गुप्ता ने लिखा है, "जानबूझ कर जाति आधारित शोषण को नजरअंदाज करने, विविधता-समानता-समावेश की नीति पर दोहरे मानदंड अपनाने, गोपनीयता को हथियार बनाकर जवाबदेही से बचने और जो बोलते हैं उनके खिलाफ बदले की कार्रवाई को सामान्य बनाने के कारण गूगल में अब मेरा करियर खत्म होता है."
The #MeToo Movement has expressed its support for Tanuja Gupta and Equality Labs. Google News cannot continue to allow #WomenInTech and #WomenofColor to be subjugated to #CasteDiscrimination. #MeTooTech pic.twitter.com/y775MuNwRm
— Equality Labs (@EqualityLabs) June 4, 2022
एक हिंदू-जैन परिवार में टेक्सस में जन्मीं तनुजा गुप्ता ने अपने इस्तीफे में सिलसिलेवार ब्यौरा देकर बताया है कि किस तरह "गूगल ने सुंदरराजन का कार्यक्रम रद्द किया और दलित अधिकारों की अनदेखी की." गुप्ता लिखती हैं, "असली पीड़ित थेनमोजी सुंदरराजन हैं जिनकी आवाज को दबा दिया गया, वे लोग हैं जो हर रोज जातिगत भेदभाव झेलते हैं लेकिन बोल नहीं सकते क्योंकि उन्हें डर होता है कि उनका वीजा ना छिन जाए या फिर उनके साथ हेट क्राइम हो सकता है."
तीखा विरोध
वॉशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है. दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कंपनी की आलोचना की है. गूगल के कर्मचारियों की यूनियन ने भी तनुजा गुप्ता का समर्थन किया है. एक ट्वीट में अल्फाबेट वर्कर्स यूनियन ने कहा, "जातिगत भेदभाव एक वास्तविकता है और गूगल को अपने यहां जाति-समानता स्थापित करनी चाहिए. हम थेनमोजी सुंदरराजन, तनुजा गुप्ता और उन सभी के साथ खड़े हैं जो जाति-आधारित शोषण झेलते हैं और उसके खिलाफ बोलते हैं."
Caste discrimination is a real issue & Google must take action to establish caste-equity in the workplace.
— Alphabet Workers Union (AWU-CWA) (@AlphabetWorkers) June 3, 2022
We stand with Thenmozhi Soundararajan, Tanuja Gupta & all those who experience and speak out against caste-based oppression. https://t.co/s5Qw6WaqBa
भारत के जानेमाने दलित अधिकार कार्यकर्ता दिलीप मंडल ने गूगल से दक्षिण एशियाई कर्मचारियों की जाति-विविधता रिपोर्ट प्रकाशित करने की मांग की है. सुंदर पिचाई के नाम लिखे खुले पत्र में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लिखा है कि गूगल को कंपनी के भीतर हुई जातीय हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.
पत्र कहता है, "ये गतिविधियां और ज्यादा परेशान करने वाली हैं क्योंकि जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद आपने आगे बढ़ने के लिए ठोस प्रतिबद्धताएं तय करने की बात की थी ताकि गूगल के भीतर अश्वेत और अन्य समुदायों के लिए समानता आधारित माहौल बनाया जा सके." इस पत्र में गूगल से कई मांगें की गई हैं जिनमें कंपनी के भीतर जाति आधारित समानता का माहौल बनाने, दलित-अधिकार कार्यकर्ताओँ के कार्यक्रमों के जरिए जागरूकता बढ़ाने और भेदभाव का शिकार होने वाली जातियों के कर्मचारियों का एक टैलंट-पूल बनाने जैसे कदम उठाने की बात की गई है.
पढ़ेंः दलित छात्रों के लिए भयानक जगह बन चुकी हैं कक्षाएं: विशेषज्ञ
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली ऑस्ट्रेलिया के न्यू कासल विश्वविद्यालय की डॉ. निशा थपलियाल कहती हैं कि भेदभाव के बारे में बात करना विभाजनकारी नहीं होता. वह कहती हैं, "जाति, नस्ल और लिंग आदि के बारे में बात करना विभाजनकारी नहीं होता. यह संस्थाओं और समाज में मौजूद गैरबराबरी को दूर करने का एकमात्र तरीका है. जो लोग थेनमोजी जैसे दलित कार्यकर्ताओं को रोकने की कोशिश करते हैं, वे जातिगत दमन की सच्चाई को छिपाना चाहते हैं. चुप रहना भी हिंसा है. दलित अपने सम्मान और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब उन्हें रोका नहीं जा सकता."












Click it and Unblock the Notifications