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Work Hours: काम के घंटों पर बहस जारी, क्या हैं विभिन्न देशों में काम करने के नियम?

Work Hours: जब सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस के सह संस्थापक नारायण मूर्ति ने भारत में युवाओं से हर हफ्ते 70 घंटे काम करने की बात कही, तो इससे कई कंपनियों के मालिक खुश हो गए थे। लेकिन इस मुद्दे को लेकर युवाओं के बीच काफी नाराजगी देखी जा रही है।

भारत में बहुत से लोग कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और काम के घंटे बहुत ज्यादा होते हैं। खासतौर से अगर कम कुशल या अकुशल श्रमिकों की बात करें, तो वह लोग हर रोज तकरीब 10 से 16 घंटे काम करते हैं। यहां तक कि आईटी सेक्टर में जहां कई कुशल प्रोग्रामर काम करते हैं, वहां भी उन लोगों से कंपनी की तरफ से ज्यादा काम की उम्मीद की जाती हैं।

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स्वास्थ्य और काम पर पड़ता है बुरा असर

द लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक लॉन्ग सीटिंग या फिर अधिक काम करने से हृदय संबंधी बीमारियों और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है, साथ ही ज्यादा काम करने का असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। National Center for Biotechnology Information के अनुसार काम के घंटे अधिक होने से हृदय और मस्तिष्क संबंधी रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अवसाद, चिंता, काम का तनाव, नींद न आने की समस्या और थकान जैसी स्वास्थ्य परेशानियां बढ़ सकती हैं, जबकि इसका असर काम पर भी दिखाई देता है और नौकरी पेशा लोगों के प्रदर्शन और उत्पादकता में भी कमी आती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार हफ्ते में 55 घंटे से ज्यादा काम करने वाले लोगों को मौत का खतरा अधिक रहता है, जबकि हर साल 7 लाख 45 हजार लोगों की मौत स्ट्रोक या हार्ट अटैक से होती है। बता दें कि दक्षिण पूर्व एशिया में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है, यहां 55 घंटे से ज्यादा काम करने वाले 3 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी बीमारियों की चपेट में आने से होती है। है। वहीं पश्चिम प्रशांत महासागर के इलाकों में यह आंकड़ा 2 लाख से ज्यादा है, जबकि पूर्वी भूमध्य सागर के इलाकों में 77 हज़ार, यूरोप में 57 हज़ार, अमेरिका में 43 हज़ार और अफ्रीका में 40 हज़ार लोग काम के अधिक घंटों की वजह से अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।

इन सभी क्षेत्रों में काम के घंटे अधिक होने की वजह से लोग अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, जो न तो कसरत करते हैं और न ही अपना स्ट्रेस कम करने के लिए दोस्तों और परिवार के साथ वक्त बिताते हैं। इसका सीधा असर व्यक्ति की स्लिपिंग साइकिल पर पड़ता है और बीमार होने की स्थिति में उन्हें पर्याप्त आराम भी नहीं मिल पाता है, क्योंकि ऑफिस में काम का प्रेशर ज्यादा होता है।

कहां से आया 8 घंटे काम करने वाला आंकड़ा?

एक दिन में 8 से 9 घंटे काम करने का नियम साफतौर पर मनमाना लगता है, क्योंकि कई कर्मचारियों का मानना है कि काम और घंटों को एक साथ जोड़कर देखना गलत है। यह नियम उस कर्मचारी आंदोलन से आता है, जिसमें 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे जो मन आए वह करने की आज़ादी देता है। लेकिन अगर वास्तविक तौर पर देखा जाए, तो काम करने के लिए 8 घंटे का समय निर्धारित करना पूरी तरह से सही नहीं है।

आज दुनिया भर में काम करने के घंटों के कई आदर्श मॉडल हैं, जहां कर्मचारियों के वर्क लाइफ बैलेंस को लेकर सख्त नियमों का पालन किया जाता है। जर्मनी में हफ्ते में चार दिन काम और 3 दिन आराम के मॉडल पर विचार किया जा रहा है, ताकि कर्मचारी वीकेंड के मौके पर अपने दोस्तों और परिवार के साथ वक्त बीता सके। लेकिन अनेक देश अब भी कर्मचारियों को ज्यादा घंटों तक काम करने के लिए मजबूर करते हैं, जिसके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया जा रहा है।

संयुक्त अरब अमीरात में हर हफ्ते कर्मचारियों से 52.6 घंटे काम लिया जाता है, जो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा काम के घंटे होते हैं। भारत में कर्मचारियों से प्रति हफ्ते 47 घंटे काम लिया जाता है, वहीं चीन में लोग हर हफ्ते में 46 घंटे और अमेरिका में 36.4 घंटे काम करते हैं। अगर जर्मनी की बात करें, तो वहां हर हफ्ते कर्मचारी सिर्फ 34.5 घंटे काम करते हैं और इस वजह से जर्मनी का नाम सबसे कम काम लेने वाले देशों की सूची में शामिल है।

काम के घंटों का इतिहास

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की वेबसाइट में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आज के मुकाबले प्राचीन समय में कर्मचारियों से कहीं ज्यादा काम करवाया जाता था। वर्ष 1870 में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, स्वीडन, बेल्जियम, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में कर्मचारी सालाना 3 हज़ार घंटे काम करते थे। वहीं काम के घंटों में कमी आने की शुरुआत साल 1950 में हुई थी, जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था।

साल 1950 में चीन, भारत, अमेरिका, कोरिया, ब्राज़ील और जर्मनी में सालाना काम के घंटे 2,500 कर दिए गए थे। लेकिन 1970 के दशक बाद से जर्मनी, ब्राज़ील और अमेरिका में सालाना काम के घंटों में सबसे ज्यादा कमी देखने को मिली है, जहां कर्मचारी हर साल 1,500 से 2,000 घंटे काम करते हैं।

काम के घंटों को लेकर क्या कहता है भारतीय कानून?

भारतीय श्रम कानून के अनुसार भारतीय कर्मचारियों के लिए रोजाना अधिकतम 9 घंटे निर्धारित किए गए हैं, जिसमें से एक घण्टे का लंच और टी ब्रेक के रूप में शामिल किया जाता है। ऐसे में कंपनी को अपने कर्मचारियों को 9 घंटे की अवधि के हिसाब से न्यूनतम वेतन का भुगतान करना आवश्यक है।

इसके अलावा अगर कंपनी कर्मचारियों से 9 घंटे से अधिक काम लेती है, तो उन अतिरिक्त घंटों को ओवर टाइम माना जाता है और उसके बदले कंपनी को कर्मचारी को अतिरिक्त वेतन का भुगतान करना पड़ता है। वहीं कुछ कर्मचारी ऐसे भी हैं, जो कंपनी के ओवर टाइम वाले नियम से खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि काम के घंटे अधिक होने से उनकी सेहत और पारिवारिक रिश्तों पर बुरा असर पड़ता है, लिहाजा कंपनी को वर्क लाइफ बैलेंस के नियमों को सख्ती से लागू करना चाहिए।

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