क्यों उठता रहा है मुस्लिम आरक्षण पर विवाद?
Muslim Reservation: पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह आरोप लगाया कि कांग्रेस अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण कोटे को कम करके उसे मुसलमानों को देने की योजना बना रही है।
काँग्रेस की कर्नाटक सरकार ने प्रदेश के सभी मुसलमानों को ओबीसी कैटेगरी में शामिल करके उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ दे दिया, वहीं आंध्र प्रदेश में मुसलमानों के लिए आरक्षण में 5 प्रतिशत कोटा प्रदान करने का प्रस्ताव किया था, जिसे पीएम मोदी काँग्रेस का एक पायलट प्रोजेक्ट बता रहे हैं।

हालांकि काँग्रेस ही नहीं कई और सेकुलर कहने वाले दलों ने भी ऐसे ही प्रयास और वादे किये हैं। जब भी इस तरह के निर्णय या प्रस्ताव सामने आते हैं तो उस पर बड़ा विवाद खड़ा हो जाता है। आखिर क्यों उठता है मुस्लिम आरक्षण का मामला और क्यों यह चुनावी मुद्दा भर बन कर रह जाता है, इसकी एक पड़ताल जरूरी है।
काँग्रेस की हाँ और बीजेपी की ना
आंध्र प्रदेश में तो मुस्लिम आरक्षण की घोषणा की गई, लेकिन कर्नाटक में 1994 में काँग्रेस की वीरप्पा मोइली सरकार ने मुसलमानों, बौद्धों, और अनुसूचित जाति से धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों के लिए आरक्षण लागू करने की घोषणा की थी। लेकिन इसे लागू करने से पहले ही मोइली सरकार गिर गई और उसके बाद बनी देवेगौड़ा सरकार ने मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण ओबीसी कोटा के अंतर्गत एक विशेष कैटेगरी बनाकर दे दिया था।
2018 में बनी भाजपा सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा होने से कुछ समय पहले 2023 में लिंगायत और वोक्कलिगा समुदायों को दो दो प्रतिशत आरक्षण देने और चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण को समाप्त करने की घोषणा की थी। हालांकि यह मामला कोर्ट में चला गया और अभी इस पर सुनवाई चल रही है।
यह जानते हुए भी कि देश में मजहब के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है, कुछ राजनीतिक पार्टियां इसका प्रयास करती रहती हैं। एसटी/एससी या ओबीसी को आरक्षण उन्हें समान अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दिया जाता है। संविधान में आरक्षण का प्रावधान दलितों या पिछड़ों को उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के उद्देश्य से किया गया था। धर्म के आधार पर आरक्षण देने का संविधान सभा में ही विरोध हुआ था और इसके लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं रखा गया है।
क्या है वास्तविकता
धर्म के आधार पर आरक्षण न देने के संविधान सभा के निर्णय के बाद भी केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर अधिकांश मुस्लिम समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की कैटेगरी में रख कर आरक्षण नीति में शामिल किया गया है। ओबीसी कोटा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके से काम करता है।
कर्नाटक में मुसलमानों को 32 प्रतिशत ओबीसी कोटा के भीतर 4 प्रतिशत उप-कोटा दिया गया। इसी तरह केरल के 30 प्रतिशत ओबीसी कोटे में 8 प्रतिशत मुस्लिम समाज का भी कोटा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसी साल फरवरी में विधानसभा में यह कहा था कि राज्य सरकार पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों और गैर-अधिसूचित समुदायों के उन सदस्यों को भी आरक्षण देने पर विचार करेगी, जिन्होंने इस्लाम अपना लिया है।
असम, बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में भी मुसलमानों की कई जातियों को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। जिन मुसलमानों को इन प्रदेशों में आरक्षण दिया जा रहा है, उनको मजहब के आधार पर नहीं, बल्कि पिछड़ी जातियों के आधार पर दिया जा रहा है।
क्या था आंध्र में काँग्रेस का 'प्रयोग'
आंध्र प्रदेश में 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की आबादी लगभग 9.5 प्रतिशत है। डुडेकुला, लद्दाफ, पिंजारी/नूरबाश और मेहतर जैसे मुस्लिम समूह राज्य ओबीसी सूची में शामिल हैं, और इन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है। लेकिन पीएम मोदी जिसे प्रयोग कह रहे हैं, दरअसल 2004 में आंध्र में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद अल्पसंख्यक कल्याण आयुक्त का वह सरकारी आदेश है जिसमें कहा गया था कि राज्य में मुस्लिम समुदाय की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति ऐसी है कि उन्हें ओबीसी के रूप में शामिल किया जा सकता है।
तब काँग्रेस सरकार ने पिछड़े वर्गों के समान रोजगार, शैक्षिक और अन्य क्षेत्रों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने की यह सिफ़ारिश लागू भी कर दी। लेकिन सितंबर, 2004 में ही आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने इस आरक्षण कोटा पर रोक लगा दी। कोर्ट का कहना था कि कोटा पिछड़ा वर्ग आयोग के संज्ञान के बिना लाया गया था और दूसरा कोटा आर्थिक आधार पर पिछड़ों को नहीं, बल्कि सभी मुसलमानों के लिए कोटा तय किया गया था। काँग्रेस मुस्लिम वर्ग को एक समूह के रूप में सामाजिक आरक्षण देने के हक में थी।
अदालत द्वारा मुस्लिम आरक्षण पर रोक के बाद आंध्र की काँग्रेस सरकार ने जून 2005 में एक अध्यादेश के जरिए मुसलमानों को फिर से 5 प्रतिशत का कोटा जारी कर दिया। इस बार राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश भी साथ में थी। अध्यादेश को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई और एक बार फिर कोर्ट ने इस अध्यादेश पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि आरक्षण की सिफारिश करते समय राज्य पिछड़ा आयोग ने ओबीसी में शामिल जातिगत आरक्षण का कोई हवाला नहीं दिया और सभी मुसलमानों के लिए आरक्षण का प्रावधान कर दिया। राज्य सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची और वहाँ से अभी तक इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए कौन जिम्मेदार
इसमें कोई दो राय नहीं है कि मुस्लिम शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। शायद इसलिए भी कि उनका रुझान आधुनिक शिक्षा लेने के बजाय इस्लामिक शिक्षा लेने पर ज्यादा है। मुस्लिम समुदाय अभी भी अपने बच्चों को स्कूलों के बजाय मदरसों में भेजने का विकल्प ज्यादा चुनता है। लेकिन राजनेता इस पर कोई बात नहीं करते। भारत में मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित करने की मांग भी उनके वोट लेने की रणनीति के तहत की जाती है। ऐसा इसलिए कि मुस्लिम के लिए आरक्षण की मांग मुस्लिम वोट को आकर्षित कर सकती है।
देश में मुस्लिम आरक्षण की तेज होती मांग
हाल ही में महाराष्ट्र के मुस्लिम नेताओं ने राज्य सरकार को चेताते हुए कहा है कि अगर महाराष्ट्र में शिक्षा में 5 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण की बहाली की मांग पूरी नहीं की गई तो मुसलमान मराठों और धनगरों की तरह सड़कों पर आने के लिए मजबूर हो जाएंगे। कांग्रेस-एनसीपी की पुरानी सरकार ने मुस्लिम समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया था, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण को खत्म कर दिया था, पर शिक्षा में बरकरार रखा था।
भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार और उसके बाद में शिवसेना के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार ने इसे लागू नहीं किया। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने भी महाराष्ट्र और तेलंगाना सहित पूरे देश में मुसलमानों के लिए आरक्षण और इसकी निगरानी के लिए एक तंत्र बनाने की मांग की है।
आरजेडी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का वीडियो आज भी उपलब्ध है, जिसमें वह मुसलमानों को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि बिलकुल आपको इन्साफ मिले, आपको न्याय मिले, आपका हक आपको मिले... इसमें लालू यादव आपके साथ कदम कदम पर है। अगर जरूरत पड़ी तो हम संविधान में संशोधन की भी मांग करेंगे।
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