किसकी डिग्री कितनी सच्ची कितनी झूठी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर आम आदमी पार्टी और स्वयं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तमाम सवाल उठाते हुए उसे फर्जी करार दे दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने साफ कर दिया कि डिग्री फर्जी नहीं है। खैर यह एक राजनीतिक उठापटक है, जो आये दिन आपको देखने को मिलेगी लेकिन उन हज़ारों लोगों का क्या, जो वाकई में फर्जी डिग्री लेकर घूम रहे हैं? अफसोस इस बात का है कि केजरीवाल जैसे लोगों ने कभी उन पर आवाज नहीं उठाई।

डीयू के रजिस्ट्रार ने कहा फर्जी नहीं है नरेंद्र मोदी की डिग्री

Whose degree is fake whose not

जी हां हम बात कर रहे हैं उन लोगों को जो बिना परीक्षा पास हो गये, जिन्हें बिना स्कूल-कॉलेज गये डिग्री डिग्री मिल गई और पैसे के बल पर अपनी जगह दूसरों को परीक्षा में बिठा दिया। असल में यह सब है दलालों का खेल, जिनसे अब तक कोई भी सरकार पूरी तरह से पार नहीं पा पायी है।

जी हां उत्तर प्रदेश में ऐसे तमाम उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। लॉ किया है। लेकिन क्लास एक भी दिन नहीं गए। एग्जाम में खुला नकल चली। और आ गया तमगा हाथ में कि वकालत किए हैं। बी0 टेक0 किया। इंटर्नल में पूंछाताछी से पास हो गए। बैक लगी तो रहमोकरम पर भी पास हो गए। एक्सटर्नल में एग्जाम्स में जमकर पैसा चला। पांच सौ दो और छापो जाकर। दरअसल ये सारी बातें मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि ये असलियत है आजकल डिग्री की।

सरकारी नौकरी पानी है और डेट ओवर हो चुकी है। चार-चार बार हाईस्कूल फिर से किया कि नौकरी लग जाए। हां असलियत में अंगूठा छाप हैं। पर मानक जो तय किया गया है उसके अनुरूप पाए गए। कुछ सोर्स सिफारिश लगी और मिल गई सरकारी नौकरी। समझ रहे हैं न आप कि क्या है डिग्रियों की हकीकत।

नौकरी देने में परिवारवाद

प्रोफेशनल्स कोर्स की डिग्रियों के हवाले नौकरी नहीं बल्कि आपमें कितनी समझ है काम को लेकर उस आधार पर नौकरी मिलती है। हां नौकरियों में परिवारवाद अब आम बन चुका है। बिरादरी भी मायने रखती है। हो सकता है इसमें अपवाद के तौर पर भी कुछ लोग हों, जिन्होंने नकल आदि का सहारा लेकर डिग्री न हासिल की हो। लेकिन वर्तमान दौर में शिक्षा का स्तर कुछ इसी प्रकार है। शिक्षा के झूठे बवंडर में डिग्रियों के सवाल का जवाब असल में क्या हो सकता है इसे आप सभी भलीभांति जान सकते हैं।

प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा की हालत

यूपी के लिहाज से गर प्राइमरी एजूकेशन की बात की जाए, दरअसल हम सरकारी शिक्षा की बात कर रहे हैं तो आपको बता दें कि मिड डे मील के चलते बच्चे स्कूल में जाते हैं। हकीकत जानकर आप भी शायद हैरान हो जाएंगे कि 20 बच्चों की संख्या को अटैंडेंस रजिस्टर में 100 दर्शाया जाता है। अगर मान लीजिए कोई अधिकारी जांच के लिए पहुंच गया तो उसे सफाई दे दी जाती है।

साथ ही बच्चों को बमुश्किल ही फेल किया जाता है क्योंकि इसके बाद प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों द्वारा कराई जा रही पढ़ाई पर ही सवाल उठने लगते हैं। कई जगहों पर तो शिक्षकों को खुद ही एप्पल जैसे आम शब्दों की स्पेलिंग का ही बोध नहीं होता। जिससे आप शिक्षा के स्तर का आंकलन खुद भी कर सकते हैं।

देखें यह वीडियो और बतायें कि इन की डिग्री सच्ची या झूठी-

उत्तर प्रदेश में जब हमने लोगों से समाजवादी सरकार और शिक्षा स्तर की बात की तो लोगों ने तीखे जवाब दिये।

2012 विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की जीत का कारण भी कहीं न कहीं यही रहा कि युवा वर्ग को लगता था कि कम से कम सपा सरकार में पास तो हो जाते हैं जबकि भाजपा और बसपा काल में जमकर मेहनत करनी पड़ती है और ज्यादा से ज्यादा लोग फेल ही होते हैं, वहीं जिन युवाओं को नौकरी की तलाश रहती है उन्हें भी भरोसा था कि पुलिस आदि में लग ही जाएंगे।

एमबीए स्टूडेंट शशांक दूबे कहते हैं कि शिक्षा का स्तर एकदम गिर जाता है। बोर्ड कॉपियों से निकले पैसे इसी बात का सबूत हैं। कि जो बिकाऊ है वो काम कर दे और जो बिकाऊ नहीं है वो तो उन कॉपियों को मीडिया को दिखा ही देगा।

लखनऊ के रहने वाले बीएससी के छात्र रमेश गौतम कहते हैं कि शिक्षा के स्तर कहिए या फिर डिग्रियों की हकीकत क्या है इसे साबित करने के लिए वो तस्वीरें भी काफी हैं जो स्कूल मीडिया के कैमरे में नकल कराते हुए कैद किए गए हैं। बहरहाल शिक्षा आरक्षण, कोटा, संबंध, पहुंच आदि के आगे नतमस्तक हो जाती है। इन तमाम बातों को जानने के बाद भी क्या आप अब कह सकते हैं कि भारत बदल रहा है। विकास के कदमों में आगे जा रहा है। हालांकि इतना तो जरूर है कि कुछ लोग जिन्होंने मेहनत, लगन के साथ भी पढ़ाई की है। वे भी तालाब की अन्य गंदी मछलियों के कारण वैसे ही आंके जाते हैं। इस तरह की स्थिति में किसी की डिग्रियों पर सवाल उसकी खुद की डिग्रियों को भी सवालों में खड़ा करता है। जरूरत है पूरी व्यवस्था में सुधार की।

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