Startups Funding: भारतीय स्टार्टअप्स की फंडिंग में भारी कमी, जानें इसकी वजह
वैश्विक आर्थिक मंदी और लेट स्टेज फंडिंग में कमी की वजह से 2023 की पहली तिमाही में इन स्टार्ट-अप कंपनियों को मिलने वाले निवेश में 75 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई है।

Startups Funding: ग्लोबल आर्थिक मंदी का असर भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों और यूनिकॉर्न पर भी पड़ा है। 2023 की पहली तिमाही में इन कंपनियों की फंडिंग में 75 प्रतिशत तक की कमी आई है। एक ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस रिसर्च फर्म Tracxn की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 की पहली तिमाही में एक भी स्टार्ट-अप कंपनी यूनिकॉर्न नहीं बन पाई, जबकि पिछले साल 2022 की पहली तिमाही में 14 स्टार्ट-अप कंपनियों को यूनिकॉर्न का दर्जा मिला था।
भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को पहली तिमाही में केवल $2.8 बिलियन का फंड मिला है, जो पिछले साल की पहली तिमाही के मुकाबले 75 प्रतिशत कम है। 2022 की शुरुआती तिमाही में भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को $11.9 बिलियन का फंड मिला था।
ग्लोबल मार्केटिंग रिसर्च फर्म की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टार्ट-अप कंपनियों को मिलने वाले निवेश में यह गिरावट लेट स्टेज फंडिंग की वजह से आई है। भारतीय कंपनियों को मिलने वाली यह फंडिंग 2022 की आखिरी तिमाही के मुकाबले 16 प्रतिशत कम है। अर्ली स्टेज फंडिंग की बात करें तो साल की पहली तिमाही में 2022 की आखिरी तिमाही के मुकाबले 68 प्रतिशत कम है। वहीं, साल-दर-साल और महीने-दर-महीने मिलने वाली फंडिंग में 54 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। इस तरह से 2023 की पहली तिमाही में 2022 की आखिरी तिमाही के मुकाबले कुल 21 प्रतिशत तक की कमी आई है।
क्या होती है लेट-स्टेज फंडिंग?
लेट स्टेज निवेश केवल उन कंपनियों में किया जाता है, जो स्टार्ट-अप फेज से आगे बढ़ गयी हैं। ये कंपनियां अपना डेवलपमेंट फेज पार कर चुकी होती हैं और इनकी सेल्स में भारी ग्रोथ देखी जाती है। ऐसी कंपनियों में निवेशक ज्यादा पैसा लगाना चाहते हैं क्योंकि लेट स्टेज इन्वेस्टमेंट, अर्ली स्टेज के मुकाबले कम रिस्की होता है। यानी निवेशकों के पैसे डूबने का खतरा कम रहता है।
लेट स्टेज इन्वेस्टमेंट के जरिए स्टार्ट-अप कंपनियों में पैसा लगाने वाले निवेशकों का फंड तेजी से कैश में कन्वर्ट होता है, जिसकी वजह से यह स्टेज ज्यादातर निवेशकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
सिलिकॉन वैली बैंक डूबने का भी पड़ा असर
भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को फंड देने वाला सिलिकॉन वैली बैंक पिछले दिनों डूब गया। जिसका असर भी भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को मिलने वाले निवेश पर पड़ा है। सिलिकॉन वैली बैंक ज्यादातर स्टार्ट-अप कंपनियों को अर्ली स्टेज में ही फंड मुहैया कराता था। अर्ली स्टेज इन्वेस्टमेंट में निवेशक किसी भी स्टार्ट-अप कंपनी के आइडिया और उसके पोटेंशियल को देखकर पैसा लगाते हैं। इस स्टेज पर फंडिंग करना ज्यादा रिस्की होता है, लेकिन यहां मुनाफे की संभावना भी ज्यादा रहती है। अर्ली स्टेज फंडिंग में स्टार्ट-अप को विस्तार करने का मौका मिलता है।
अर्ली स्टेज इन्वेस्टमेंट करने से पहले निवेशक मार्केट रिसर्च करते हैं, लेकिन अनप्रेडिक्टेबल मार्केट कंडीशंस की वजह से उनका निवेश हाई रिस्क में चला जाता है। सिलिकॉन वैली बैंक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। कोरोना महामारी की वजह से कई बड़ी कंपनियों के सप्लाई चेन पर असर पड़ा था, जिसकी वजह से उनकी सेल्स में कमी आई थी। ऐसे में स्टार्ट-अप कंपनियों पर लगाए जाने वाला निवेश भी कम हुआ है और जो भी स्टार्ट-अप कंपनियां अर्ली स्टेज में थी उनपर इसका भारी असर पड़ा है।
फिनटेक स्टार्ट-अप कंपनियों को मिले ज्यादा निवेश
इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 की पहली तिमाही में केवल 9 भारतीय स्टार्ट-अप और यूनिकॉर्न कंपनियों को ही $100 मिलियन से ज्यादा का निवेश मिला है, जिनमें लेंसकार्ट, फोनपे, मिंटीफाई, इंश्योरेंस देखो, फ्रेश टू होम फूड्स, टी क्लीन मोबिलिटी और क्रेडिटबी जैसी फिनटेक स्टार्टअप कंपनियां शामिल हैं।
फोनपे को पहली तिमाही में $650 मिलियन से ज्यादा की फंडिंग मिली है, जिसकी वजह से फोनपे का कुल वैल्यूएशन $12 बिलियन हो गया। वहीं, लेंसकार्ट को पहली तिमाही में $500 मिलियन की फंडिंग मिली है। लेसकार्ट का कुल वैल्यूएशन $4.5 बिलियन हो गया है। पहली तिमाही में जिन स्टार्ट-अप कंपनियों को सबसे ज्यादा फंड मिला है, उनमें ज्यादातर फिनटेक कंपनियां हैं। फिनटेक कंपनियों को भी पिछले साल के मुकाबले मिलने वाली फंडिंग में 51 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है।
2022 में निवेशकों ने खींचा हाथ
PwC India की पिछले साल आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में भी 2021 के मुकाबले स्टार्ट-अप कंपनियों को मिलने वाली फंडिंग में 33 प्रतिशत की गिरावट आई थी। पिछले साल भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को कुल $24 बिलियन का निवेश मिला था। वहीं, साल 2021 में भारतीय कंपनियों को $35.2 बिलियन का निवेश मिला था। हालांकि, साल 2019 और 2020 में स्टार्ट-अप कंपनियों को क्रमशः $13.2 बिलियन और $10.9 बिलियन का निवेश मिला।
2021 में भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को सबसे ज्यादा निवेश मिला था। हालांकि, पिछले साल आई ग्लोबल आर्थिक मंदी की वजह से निवेशक स्टार्ट-अप कंपनियों को निवेश देने से कतरा रहे हैं। हालांकि, पिछले साल आई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेशक अभी भी भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों को लेकर काफी सकारात्मक हैं।
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