One Nation One Election: क्या है एक देश एक चुनाव प्रस्ताव, जानें इसके फायदे और नुकसान
One Nation One Election: मोदी सरकार ने 18 से 22 सितंबर 2023 तक संसद का विशेष सत्र बुलाया है। संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विपक्ष भड़क गया है। इस विशेष सत्र बुलाने की वजह है कि कई तरह के कयास लगने लगे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा एक देश-एक चुनाव बिल की संभावना को लेकर हो रही है। दरअसल अगले साल लोकसभा का चुनाव है। इसी के साथ-साथ विधानसभा का भी चुनाव कराने को लेकर मोदी सरकार संसद में बिल ला सकती है। क्योंकि, खुद पीएम मोदी कई बार इसकी वकालत कर चुके हैं।
क्या है वन नेशन वन इलेक्शन
दरअसल भारत के राज्यों और केंद्र में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं। दोनों ही सरकारें प्रत्यक्ष चुनाव से चुनकर आती हैं। हर साल देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव होते ही रहते हैं। जैसे कि इस साल के अंत तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मिजोरम और राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने हैं। वहीं अगले साल देश में लोकसभा का चुनाव, साथ में हरियाणा, महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। ऐसे में लंबे समय से इस पर चर्चा हो रही है कि क्यों न सारे चुनाव एक साथ करवाए जाएं। यानि केंद्र और राज्यों में एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया को ही 'वन नेशन वन इलेक्शन' नाम दिया गया है।

पूरे देश में एक साथ चुनाव कराना संभव है
पूरे देश में केंद्र और राज्य दोनों जगह एक साथ चुनाव कराना बिल्कुल संभव है। क्योंकि देश में पहले भी कई बार एक साथ चुनाव हो चुके हैं। हालांकि, वक्त के साथ अलग-अलग राज्यों में सरकारों के गिरने और बनने की परंपरा के कारण समय में अंतर आ गया है।
बता दें कि आजाद भारत में पहला चुनाव साल 1951-52 में हुआ। तब विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ ही करवाए गये थे। इसके बाद भी सभी सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया इसलिए 1957, 1962 और 1962 में भी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ ही हुए थे। लेकिन, साल 1967 आते-आते इसमें बदलाव आ गया। क्योंकि, 1967 में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस पार्टी से बगावत कर दी थी। जिसके वजह से सीपी गुप्ता की सरकार गिर गयी थी। यहीं से चुनाव का गणित बिगड़ गया था। इसके बाद साल 1971 में इंदिरा गांधी ने एक साल पहले ही लोकसभा चुनाव करवा दिये तो बाकी राज्यों के साथ चुनाव में अंतर आ गया।
एक साथ चुनाव कराने से इन राज्यों को होगा घाटा
अगर वन नेशन वन इलेक्शन बिल संसद में पास हो जाता है। तब साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होते हैं, तो सबसे ज्यादा घाटा इन राज्यों को हो सकता है। जिसमें उत्तर प्रदेश (बीजेपी), हिमाचल प्रदेश (कांग्रेस), कर्नाटक (कांग्रेस), पंजाब (आप), गुजरात (बीजेपी) और गोवा (बीजेपी) जैसे राज्यों में बहुत कम समय में ही फिर से चुनाव हो जायेंगे।
अब क्या कहता है कानून?
जब साल 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'वन नेशन वन इलेक्शन' का मुद्दा उठाया था। तब विधि आयोग ने एक रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि बार-बार राज्यों में चुनाव कराने से देश के संसाधनों और धन की बर्बादी होती है। साथ ही रिपोर्ट में कहा कि देश में जो चुनाव कराने के नियम हैं, उनके मुताबिक एक साथ सभी राज्यों और केंद्र में चुनाव कराना संभव नहीं होगा। क्योंकि इसके लिए संविधान में कुछ संशोधनों की जरूरत है। जैसे वन नेशन वन इलेक्शन बिल से पहले संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में पेश कराना होगा। इन दोनों सदनों से बहुमत से इस विधेयक का पारित होना जरूरी है। इसके बाद कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं से इसे अनुमोदित कराना होगा कि वे समय से पूर्व या बाद में सरकार भंग कर दें।
देश को क्या होगा फायदा
वन नेशन वन इलेक्शन की नीति से जब पूरे देश में एक साथ चुनाव होगा तो देश की भारी धनराशि बच जायेगी। बता दें कि 1951-1952 लोकसभा चुनाव में 11 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। जबकि नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 के लोकसभा चुनाव में 60 हजार करोड़ रुपये की भारी भरकम धनराशि खर्च हुई थी। वहीं हर राज्य में चुनाव के लिए अलग से धनराशि और मशीनरी, संसाधनों पर खर्च किया जाता है। इन चुनावों के आयोजन में पूरी स्टेट मशीनरी और संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, यह बिल लागू होने से बार-बार चुनावों की तैयारी में लगने वाला खर्च कम हो जायेगा।
एक बार चुनाव होने से देश के अलग-अलग हिस्सों में चुनाव के मद्देनजर बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी। वहीं इससे देश में अलग-अलग हिस्सों में चल रही सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों को मिलता रहेगा। चुनाव के चक्कर में बार बार सरकारी काम बंद नहीं होंगे।












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