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Sponge City: क्या हैं 'स्पंज सिटी' और कैसे वे बाढ़, जलवायु परिवर्तन से निपटने में करेंगी मदद

Sponge City: दुनिया में हर साल लाखों जानवरों और लोगों की जान सिर्फ बाढ़ आने की वजह से चली जाती है। साथ ही बाढ़ के कारण संक्रमण और बीमारी फैलने, घायल होने और बिजली का करंट आदि लगने का भी खतरा बढ़ जाता है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार बाढ़ भारत में ही हर साल लगभग 75 लाख हेक्टेयर भूमि को प्रभावित और करोड़ों रुपये का नुकसान करती है। जबकि आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के अनुसार 2020 में भारत में बाढ़ की वजह से लगभग 54 लाख लोगों का विस्थापन हुआ था।

Sponge Cities

जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय इंश्योरेंस कंपनी 'मुनीच रे' की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर साल बाढ़ से 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है। इतिहास की सबसे महंगी बाढ़ आपदा जुलाई 2021 में मध्य यूरोप में हुई थी। तब पश्चिमी जर्मनी और पड़ोसी देशों में विनाशकारी बाढ़ के कारण कुल मिलाकर 54 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ था। यह दशकों तक यूरोप में किसी भी प्रकार की सबसे महंगी प्राकृतिक आपदा भी थी।

अब इन्हीं बाढ़ आपदाओं से बचने के लिए दुनिया के कई देश अपने शहरों को 'स्पंज सिटी' का रूप देने में जुटे हुए हैं। इसमें सबसे आगे चीन है। चीन अपने 60 शहरों को 'स्पंज सिटी' बनाने की दिशा में काम कर रहा है। रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार हर साल चीन में बाढ़ की वजह से सैंकड़ों लोगों की जान चली जाती है और अरबों डॉलर का नुकसान भी झेलना पड़ता है। अब सवाल उठता है कि आखिर ये 'स्पंज सिटी' क्या होती है? यह कैसे जलवायु परिवर्तन में निपटने में मददगार साबित हो सकती है?

'स्पंज सिटी' क्या है?

'स्पंज सिटी' का उद्देश्य इसके नाम से ही पता चलता है, इसका मतलब है जिस तरह एक स्पंज यानी फोम अपने आसपास के पानी को सोख लेता है। वैसे ही एक शहर की कल्पना करके उसे बनाया जा रहा है। ताकि, जब बाढ़ आए तो इससे बचा जा सके। ज्यादा आबादी वाले शहरों में बाढ़ आने या सूखा पड़ने का खतरा ज्यादा होता है। क्योंकि भारी मात्रा में कंस्ट्रक्शन के चलते जमीन की पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है।

शहर बनता है तो पेड़ कटते हैं और मैदानी जमीन कंक्रीट से ढंक जाती है। इस वजह से पानी जमीन के अंदर नहीं पहुंचता। ऐसे में बारिश आने पर बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए इस दिक्कत का हल निकालने के लिए स्पंज सिटी बनाई गई, यानी वो शहर जो पानी सोख सके।

'स्पंज सिटी' का उद्देश्य ये है कि जब तेज या ज्यादा बारिश होगी तो इस पानी को एक जगह स्टोर कर लिया जाएगा। फिर, उससे या तो ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने की कोशिश की जाएगी या फिर पानी को किसी अन्य तरीके से इस्तेमाल किया जाएगा। वैसे भारत में अब चेन्नई मेट्रोपोलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी भी इस दिशा में काम कर रही है। चेन्नई के 57 से ज्यादा 'स्पंज पार्कों पर काम चल रहा है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के 15 शहरों को भी स्पंज सिटी बनाने की दिशा में तैयारी चल रही है। इन पार्कों के जरिए जमीनी जल स्तर सुधारने और बाढ़ के पानी का सही इस्तेमाल किया जा रहा है।

कैसे बनाई जा रही हैं 'स्पंज सिटी'?

स्पंज सिटी बनाने के लिए दुनिया भर में कई देशों की सरकारों की ओर से कदम उठाए जा रहे हैं। इसके लिए कुछ देशों के शहरों में रिचार्ज शाफ्ट बनाए जा रहे हैं तो कई शहरों में पेड़-पौधों (हरियाली) को ज्यादा लगाने पर जोर दिया जा रहा है। वैसे रिचार्ज शाफ्ट्स एक तरह के तालाब या गड्डे बनाए जाएंगे, जिसमें बारिश का पानी इकट्ठा होगा और इसके जरिए पानी जमीन में चला जाएगा, जिससे जमीन का जल स्तर काफी बढ़ जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु जांच एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार शंघाई, न्यूयॉर्क और कार्डिफ जैसे शहरों में स्पंजनेस को बढ़ाने के लिए शहर के अंदर बगीचों, पार्कों, फुटपाथ के किनारों पर पौधों को ज्यादा से ज्यादा लगाया जा रहा है। ताकि, प्राकृतिक रुप से स्पंजनेस को बढ़ावा मिले।

'स्पंज' के लिए इन शहरों पर किया गया शोध

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु जांच एजेंसी की शोधकर्ताओं ने इसके लिए सात प्रमुख शहरों (न्यूयॉर्क, लंदन, सिंगापुर, मुंबई, ऑकलैंड, शंघाई और नैरोबी) पर शोध किया था। यह पता लगाया गया कि इन शहरों में कितना हिस्सा घास, पेड़, तालाब और झीलों सहित 'नीले और हरे बुनियादी ढांचे' से ढका हुआ था, और कितना हिस्सा कंक्रीट, फुटपाथ और इमारतों जैसे 'ग्रे बुनियादी ढांचे' से ढका हुआ था।

रिपोर्ट के मुताबिक शहरी मिट्टी के प्रकार और बनावट को भी देखा गया ताकि यह आकलन किया जा सके कि इसमें कितना पानी हो सकता है। साथ ही पौधों का आवरण भी, जो पानी को बनाए रखने और अप्रवाह को रोकने में मदद कर सकता है। जांच करने के लिए शोधकर्ताओं ने उपग्रह इमेजरी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और मशीन लर्निंग का उपयोग किया था। साथ ही एआई डिजिटल मैपिंग का इस्तेमाल किया था।

प्रत्येक शहर को 1-100% का 'स्पंजनेस' प्रतिशत दिया गया था। उच्च रेटिंग वाले शहर वर्षा के दौरान अधिक पानी सोख सकते हैं। न्यूजीलैंड का ऑकलैंड 35% स्पंज रेटिंग के साथ शीर्ष पर रहा था। क्योंकि, यहां परंपरागत जल प्रणालियां, कई गोल्फ कोर्स, हरे पार्क और हर घर में गार्डेन रखने की परंपरा है। इसलिए इस शहर में बाढ़ आने का खतरा कम है।

इसके बाद नैरोबी 34% के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि न्यूयॉर्क, मुंबई और सिंगापुर 30% के साथ तीसरे स्थान पर हैं, और शंघाई 28% स्पंज सिटी रेटिंग के साथ चौथे स्थान पर है। अंतिम स्थान पर 22% के साथ लंदन था, जिसका मुख्य कारण कंक्रीट का उच्च स्तर और मिट्टी की खराब अवशोषकता थी।

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