Election Symbols: क्या होते हैं चुनाव चिन्ह, शिवसेना से पहले भाजपा-कांग्रेस के भी चुनाव चिन्ह बदल चुके हैं
शिवसेना के चुनाव चिन्ह पर सियासी घमासान मचा हुआ है। हालांकि देश में चुनाव चिन्ह पर आखिरी फैसला चुनाव आयोग का ही होता है।

Election Symbols: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना और पार्टी का चुनाव चिन्ह 'धनुष-बाण' आवंटित करने के फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तय प्रक्रिया से आने की बात कहते हुए कोई भी आदेश पारित करने से इंकार कर दिया। बीते साल महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना विधायकों के अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देने के बाद चुनाव आयोग ने 8 अक्टूबर को शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह 'धनुष-बाण' को फ्रीज कर दिया था। वैसे, चुनाव चिन्ह को लेकर हुए विवाद का ये इकलौता मामला नहीं है।
पार्टी चुनाव चिन्ह क्या होता है?
किसी भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दल को चुनाव आयोग की ओर से एक प्रतीक आवंटित होता है, जिससे पार्टी की पहचान होती है। यही प्रतीक चुनावों के दौरान चुनाव चिन्ह के तौर पर जाना जाता है। शुरुआत में, चुनाव आयोग निरक्षर मतदाताओं को राजनीतिक दल की पहचान करने में मदद के उद्देश्य से चुनाव चिन्ह की सुविधा लाया था। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को मिलने वाला प्रतीक ही चुनावों के दौरान चुनाव चिन्ह के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। सियासी दल चुनाव प्रचार से लेकर पार्टी से जुड़े हर काम में इसका इस्तेमाल करते हैं।
चुनाव आयोग कैसे चुनाव चिन्ह आवंटित करता है
ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक के हर चुनाव में चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल किया जाता है। चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के तहत भारत निर्वाचन आयोग को राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों को मान्यता और चुनाव चिन्ह देने का अधिकार देता है। चुनाव चिन्ह दो श्रेणी के होते हैं, जिनमें से एक रिजर्व कैटेगरी होती है। रिजर्व प्रतीक विशेष तौर पर राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को आवंटित होते हैं, जो चुनावों के दौरान अपने प्रत्याशियों को पार्टी की ओर से दिए जाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां देशभर में अपने चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल कर सकती हैं। वहीं, क्षेत्रीय दल केवल संबंधित राज्य में ही अपने चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर बीजेपी, कांग्रेस, टीएमसी, सपा, एनसीपी, बीएसपी जैसे दलों के चुनाव चिन्ह रिजर्व कैटेगरी में आते हैं।
वहीं, दूसरी श्रेणी फ्री यानी मुक्त प्रतीक की होती है, जिसमें रिजर्व चिन्ह के अलावा अन्य चुनाव चिन्ह आते हैं। चुनावों के दौरान इन प्रतीकों में से ही नए स्थानीय दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाते हैं। भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के अनुसार जनवरी 2023 तक आयोग के पास 197 फ्री प्रतीक हैं।
निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए क्या नियम है?
किसी भी चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों को फ्री प्रतीक वाली लिस्ट में से ही चुनाव चिन्ह आवंटित किया जाता है। यही प्रक्रिया छोटे सियासी दलों के लिए भी इस्तेमाल में लाई जाती है। अगर कोई दल अपनी ओर से कोई चुनाव चिन्ह (जो अन्य पार्टियों को आवंटित न किया गया हो) भारत निर्वाचन आयोग को देता है, तो वो प्रतीक उस पार्टी को आवंचित कर दिया जाता है।
एक ही चिन्ह को दो पार्टियों के दावे पर क्या नियम है?
आमतौर पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सियासी दलों के साथ ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती है। हालांकि, राज्य स्तर के दलों को किसी अन्य प्रदेश की पार्टी का प्रतीक चिन्ह तभी मिल सकता है, जब वो किसी अन्य दल को आवंटित न किया गया हो। वहीं, दो पार्टियों के एक ही प्रतीक चिन्ह पर दावे की स्थिति में उस दल को आवंटन में प्राथमिकता दी जाती है, जो रजिस्ट्रेशन की सूची में पहले से दर्ज हो। आसान शब्दों में कहें, तो उस सियासी दल का रजिस्ट्रेशन पहले भी भारत निर्वाचन आयोग में हो चुका हो।
भारत में कितने सियासी दल हैं और कितने चुनाव चिन्ह?
भारत निर्वाचन आयोगी की वेबसाइट के अनुसार सितंबर 2021 तक 8 सियासी पार्टियां राष्ट्रीय दलों की मान्यता रखती हैं। बीजेपी, कांग्रेस, टीएमसी, बसपा, एनसीपी, सीपीआई, सीपीआई (एम) और नेशनल पीपुल्स पार्टी के पास राष्ट्रीय दलों का दर्जा है। गुजरात विधानसभा चुनाव में 5 सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद आम आदमी पार्टी को भी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल हो गया है। वहीं, राज्य स्तर की 63 क्षेत्रीय पार्टियों को मान्यता प्राप्त है। वहीं, रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 2796 है। इन राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह की बात करें, तो केवल राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को ही चुनाव चिन्ह आवंटित होता है। इस हिसाब से 72 सियासी पार्टियों को चुनाव चिन्ह आवंटित हैं।
किस तरह के चुनाव चिन्ह लिए जा सकते हैं?
भारत निर्वाचन आयोग की ओर से 197 मुक्त प्रतीकों वाली लिस्ट से ही प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाते हैं। चुनाव चिन्ह के तौर पर रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीजों यानी सब्जियों, घरेलू चीजों और उपकरणों, खेल से जुड़े सामानों वगैरह को चुनाव चिन्ह के तौर पर आवंटित किया जा सकता है। पशु-पक्षियों को चुनाव चिन्ह के तौर पर आवंटित नहीं किया जाता है। बसपा को मिला हाथी चुनाव चिन्ह इस मामले में अपवाद के तौर पर माना जा सकता है।
भाजपा और कांग्रेस के भी बदल चुके हैं चुनाव चिन्ह
देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस को 1952 में हुए पहले चुनाव में 'दो बैलों की जोड़ी' चिन्ह मिला था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद ये चुनाव चिन्ह फ्रीज हो गया था। बैलों की जोड़ी का ये चुनाव चिन्ह बाद में कांग्रेस (ओ) को दिया गया और इंदिरा गांधी को गाय-बछड़ा का चुनाव चिह्न मिला। 1977 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद एक बार फिर से कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बदला और हाथ का पंजा हो गया। जो अब तक कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बना हुआ है।
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दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल है। बीजेपी की स्थापना 8 अप्रैल 1980 में हुई थी। इससे पहले पार्टी जनसंघ के तौर पर जानी जाती थी। स्वतंत्रता सेनानी श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक था। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया और इसका चुनाव चिन्ह हलधर किसान हो गया। 1980 में जनता पार्टी में आंतरिक मतभेदों के चलते विघटन हुआ और बीजेपी की स्थापना हुई। तब से इसका चुनाव चिन्ह कमल का फूल है।
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