Constitution Bench: क्या महत्त्व है संवैधानिक बेंच का, क्यों इसका गठन किया जाता है?
समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की बेंच सुनवाई कर रही है। आमतौर पर दो या तीन सदस्यीय बेंच ही किसी मामले की सुनवाई करती है।

Constitution Bench: सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के अनुरोध वाली याचिकाओं की सुनवाई पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है। इस संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एसआर भट्ट, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीती 13 मार्च को समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था और कहा कि यह मुद्दा बुनियादी महत्व का है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने दिया था। उन्होंने ही कहा कि इस मामले को संविधान के अनुच्छेद 145 (3) के तहत पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेज दिया जाए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में इस समय कुल 34 न्यायाधीश हैं, जिनमें तीन महिला न्यायाधीश शामिल हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश की कोई भी सीट खाली नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या भी 34 ही है। जब साल 1950 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई थी, तो उस समय मुख्य न्यायाधीश के अलावा सात अन्य न्यायाधीश इस कोर्ट में थे। इसके बाद अलग-अलग वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों में बढ़ोतरी की गई।
क्या है संवैधानिक पीठ?
सुप्रीम कोर्ट में अक्सर दो या तीन सदस्यीय पीठ जिसे बेंच भी कहते हैं, किसी मामले की सुनवाई करती है। इस बेंच को डिविजन बेंच यानी खंड पीठ कहा जाता है। लेकिन, विशेष परिस्थितियों में या संविधान की व्याख्या से संबंधित मामलों में संवैधानिक पीठ का गठन किया जाता है। संविधान पीठ सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ होती है, जिसमें पांच या उससे अधिक न्यायाधीश शामिल होते हैं। संविधान पीठ का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 145 (3) के तहत किया गया है। इस पीठ का गठन अस्थाई तौर पर किया जाता है और मामले के निपटारे के बाद इसे भंग कर दिया जाता है।
संविधान पीठ का गठन कौन करता है?
भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास संविधान पीठ को गठित करने का विशेषाधिकार होता है। मास्टर ऑफ रोस्टर होने के नाते मुख्य न्यायाधीश ही यह फैसला करते हैं कि इस संविधान पीठ में कौन-कौन से न्यायाधीश रहेंगे और मामले की सुनवाई कब की जाएगी।
किन परिस्थितियों में किया जाता है संविधान पीठ का गठन?
आमतौर पर चार परिस्थितियों में संविधान पीठ का गठन किया जा सकता है -
● यदि किसी मामले में संविधान या संविधान के प्रावधानों की व्याख्या की जरूरत हो, तो संविधान पीठ का गठन किया जा सकता है,
● यदि राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत किसी कानून या तथ्य पर सुप्रीम कोर्ट की राय मांगते हैं। हालांकि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है और वे एक अलग दृष्टिकोण अपना सकते हैं,
● जब दो न्यायाधीशों की पीठ और बाद में तीन न्यायाधीशों की पीठ एक ही मुद्दे पर परस्पर विरोधी निर्णय देती है,
● यदि तीन न्यायाधीशों की पीठ एक निर्णय देती है, जो किसी मुद्दे पर पिछले तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए निर्णय से अलग है।
संविधान पीठ में कितने न्यायाधीश हो सकते हैं?
संविधान पीठ में कम-से-कम पांच न्यायाधीशों का होना जरूरी है और अधिकतम की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। इन सदस्यों की संख्या हमेशा ऑड नंबर यानि विषम संख्या में होनी चाहिए। इसके पीछे का कारण यह है कि अगर इन न्यायाधीशों की राय में भिन्नता हो, तो बहुमत का निर्णय लेने में मुश्किल न हो। दूसरी बात यह है कि अगर किसी संविधान पीठ के फैसले पर ही विवाद या टकराव हो जाए, तो इस मामले के निपटारे के लिए उससे बड़ी बेंच का गठन किया जाता है।
संवैधानिक पीठों के कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले
उल्लेखनीय है कि केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के केस में 13 न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ का गठन किया गया था। 24 अप्रैल 1973 को 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने संविधान की बुनियादी संरचना को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इस फैसले में कहा गया था कि संविधान की बुनियादी संरचना को नहीं बदला जा सकता है। संसद को इसे किसी भी संशोधन के द्वारा बदलने का अधिकार नहीं है और संविधान ही सर्वोपरि है।
फिर साल 1977 में केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने 'जनहित' में मेनका गांधी का पासपोर्ट जब्त कर लिया था। जब सरकार ने इसका कारण बताने से मना कर दिया, तो मेनका गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 21 में निहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हुए सरकार के खिलाफ फैसला दिया।
24 अगस्त 2017 को नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया था। पीठ ने कहा था कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। इस फैसले के द्वारा संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उन दो पुराने फैसलों को खारिज कर दिया, जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था।
6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अनुच्छेद 377 को असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने साल 2013 के अपने ही फैसले को पलटते हुए आईपीसी की धारा 377 को रद्द कर दिया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे में रखने वाली धारा 377 के हिस्से को तर्कहीन और बचाव नहीं किए जाने वाला करार दिया। इस संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड शामिल थे। आईपीसी की धारा 377 में समलैंगिक संबंध बनाने वालों के लिए 10 साल की कैद का प्रावधान किया गया था।
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9 नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 40 दिनों तक सुनवाई की और अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। इस संविधान पीठ में जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एसए नजीर शामिल थे।












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