राजनीतिक चाल थी नेताजी सुभाषचंद्र बोस को 'फासीवादी' ठहराना
नई दिल्ली। नेताजी सुभाषचंद्र बोस 44 साल के थे, जब कोलकाता में 1941 में अंग्रेजों की नज़रबंदी तोड़कर फरार हुए और ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए धुरी राष्ट्र देशों जर्मनी, इटली और जापान से समर्थन लेने की कोशिश में जुट गये। तब जवाहरलाल नेहरू की उम्र 52 साल थी और महात्मा गांधी 72 साल के थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष रह चुके सुभाषचंद्र बोस का कद इतना बड़ा था कि महात्मा गांधी भी उनसे निश्चित दूरी बनाकर चल रहे थे। वहीं, जवाहरलाल नेहरू के मुकाबले नेताजी का कद और प्रभाव दोनों बहुत ज्यादा था। लेकिन चार साल बाद जब ताइवान में कथित विमान दुर्घटना हुई, तब परिस्थितियां बदल चुकी थीं। अमेरिकी परमाणु बम ने अंग्रेजों के दुश्मनों को धराशायी कर दिया था। अब सुभाष भारतीय राजनीति में भी 'फासीवादी' घोषित होकर अवांछित हो चुके थे।

'करो या मरो' की हड़बड़ी के पीछे आज़ाद हिन्द फौज थी वजह !
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब मित्र राष्ट्रों में शामिल ब्रिटेन पर अपने साम्राज्य की सुरक्षा का भारी दबाव था, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी लगा कि इसका फायदा उठाया जाना चाहिए। तब महात्मा गांधी ने अहिंसक आंदोलन की परंपरा से ऊपर उठते हुए 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन का फैसला किया और 'करो या मरो' का नारा दिया। दरअसल इस फैसले के पीछे सुभाषचंद्र बोस की गतिविधियां प्रमुख वजह थीं, जिन्होंने जापान की मदद से इंडियन नेशनल आर्मी का नेतृत्व संभाल लिया था। आज़ाद हिन्द फौज का गठन करते हुए पूर्वी एशिया में उन्होंने खुद को काफी मजबूत कर लिया था। आज़ाद हिन्द फौज़ की सफलता ने कांग्रेस नेतृत्व को बेचैन कर दिया था।
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अंग्रेजों ने सुभाष को 'फासीवादी' करार दिया
भारतीय राजनीति की यह अजीब विडंबना है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए लिए आंदोलन कर रही थी और सुभाष चंद्र बोस भी देश की सीमा से बाहर से अंग्रेजों पर उन्हें मार भगाने के लिए ही हमला कर रहे थे। फिर भी दोनों धड़ों में कोई मेल नहीं था। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज सरकार को न समर्थन दिया, न विरोध किया। वे दूरी बनाकर चलते रहे। अंग्रेजों पर सुभाषचंद्र बोस का ख़ौफ था। इस वजह से अंग्रेजों ने उन्हें फासीवादी, साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी करार दिया।

अंग्रेजों से बड़े 'फासीवादी-उपनिवेशवादी' बन गये नेताजी!
भारतीय राजनीति का वामधड़ा ऐसा था, जो सोवियत संघ से प्रभावित होकर दूसरे विश्वयुद्ध में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष को कमजोर नहीं होने देने के नाम पर 'भारत छोड़ो आंदोलन' तक में शरीक नहीं हुआ। यह अजीब बात है कि भारतीय कम्युनिस्टों को ब्रिटेन का साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी चरित्र नहीं दिख रहा था, जो भारत को सदियों से गुलाम बनाए हुए था। लेकिन, उन्हीं अंग्रेजों के कहने पर इन कम्युनिस्टों ने सुभाषचंद्र बोस को फासीवादी करार दिया। दरअसल कम्युनिस्ट हों या ब्रिटेन की सरकार, दोनों गांधी-नेहरू के राजनीतिक मकसद को पूरा कर रहे थे।

'करो या मरो' से पहले 'मरो या मारो' कर चुके थे नेताजी
जब 1942 में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन शुरू हुआ, तब तक सुभाषचंद्र बोस जापान की मदद पा चुके थे। इंडियन नेशनल आर्मी की कमान रास बिहारी बोस के हाथों से सुभाषचंद्र बोस के हाथों आ चुकी थी। 1943 में सिंगापुर में निर्वासित आज़ाद हिन्द सरकार को दुनिया के कई देशों ने मान्यता दे दी थी। सुभाषचंद्र बोस आज़ाद हिन्द सरकार और सेना के मुखिया बने। बिना देरी किए उन्होंने ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया। जापान ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह का नियंत्रण भी सुभाषचंद्र बोस को सौंप दिया। अब वे काफी ताकतवर नेता बन चुके थे।

नेताजी ने कैदियों को भी स्वतंत्रता सेनानी बना डाला
एशियाई देशों में अंग्रेजों ने जिन भारतीयों को बंदी बनाया था, सबको छुड़ाकर सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज की ताकत 36 हज़ार सैनिकों तक पहुंचा दी। सबको स्वतंत्रता सेनानी बना डाला। उन्होंने बर्मा को अंग्रेजों से आज़ाद कराने के बाद 'दिल्ली चलो' का नारा दिया।

धुरी राष्ट्र कमजोर हुए तो आज़ाद हिन्द फौज भी अकेले पड़ गयी
इस बीच द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी राष्ट्रों की हालत कमजोर पड़ने लगी थी। आज़ाद हिन्द फौज को जापान से मदद मिलनी बंद हो गयी। आसमान पर धुरी राष्ट्रों का कब्जा था। जल्द ही बड़ी लड़ाई में आज़ाद हिन्द फौज को अंग्रेजों से हार का सामना करना पड़ा। सुभाषचंद्र बोस भूमिगत हो गये। उनकी सेना ने लड़ाई जारी रखी। मगर, भारत से अंदरूनी राजनीतिक समर्थन सुभाष को नहीं मिला और हर मोर्चे पर पराजय की ख़बरें आने लगीं।

परमाणु धमाके में खो गये धुरी राष्ट्र
6 और 9 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु विस्फोट के बाद जब जापान ने समर्पण कर दिया, तो सुभाषचंद्र बोस के लिए भी मुश्किल दौर आ पहुंचा। उन पर युद्ध अपराधी घोषित किए जाने का ख़तरा था। भारतीय कांग्रेस नेतृत्व से उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। सुभाष चंद्र बोस पहले भी भगत सिंह की फांसी रोकने की मांग पर अंग्रेजी सरकार से लड़ने के विषय पर महात्मा गांधी से टकरा चुके थे। बदली हुई परिस्थिति में न गांधी से, न नेहरू से अच्छे संबंध रह गये थे। इसी बीच 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई कथित विमान दुर्घटना में उनके मारे जाने का किस्सा सामने आया।

नेताजी की 'मौत' से कांग्रेस भी 'आज़ाद'
विमान दुर्घटना में चाहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत हुई हो या नहीं, लेकिन इस दुर्घटना के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने सुभाष नाम का राजनीतिक ख़तरा टल चुका था। हालांकि कहा ये भी गया कि द्वितीय विश्वयुद्ध में गलत निर्णय के कारण सुभाष बाबू पछताने लगे और संभवत: इसलिए सार्वजनिक जीवन से दूर चले गये। सच्चाई जो हो, लेकिन आगे भी आज़ाद हिन्द फौज से जुड़े लोगों के साथ कांग्रेस और उसकी नेहरू सरकार ने अच्छा बर्ताव नहीं किया। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा तक नहीं दिया गया। जो जिस हाल में थे, उन्हें उसी हाल में छोड़ दिया गया। इसलिए अगर सुभाष को जिन्दा पकड़ लिया गया हो, रूस के साइबेरिया में उन्हें कैद रखने की कहानी सच हो, तो भी उन परिस्थितियों में उनका मददगार कोई नहीं रह गया था। सुभाषचंद्र बोस से जुड़े रहस्य अगर नहीं सुलझ सके हैं, तो ये साफ है कि आज़ाद हिन्दुस्तान की सरकार ने इस गुत्थी को सुलझाने में कभी रुचि नहीं ली।
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