Ramanujacharya : पिछड़ों को पुजारी बनाकर रामानुजाचार्य ने दिया था समता का संदेश
भक्ति आंदोलन के जन्मदाता के रुप में रामानुजाचार्य जी को सनातन धर्म में विशेष आदर प्राप्त है। जातिगत विषमता को खत्म करने के लिए रामानुजाचार्य जी ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी।

Ramanujacharya: भारत संतों की धरती है। यहां अनेक ऐसे संत हुए जिनको आज भी लोग याद करते हैं और उनके दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करते हैं। ऐसे ही एक संत हुए जिनका नाम था श्री रामानुजाचार्य। श्री रामानुजाचार्य का जन्म 1017 ई. में दक्षिण भारत के तिरुकुदूर क्षेत्र में हुआ था। हैदराबाद के मुचिन्तल गांव में रामानुजाचार्य की मूर्ति बनाई गई है। यह भारत की दूसरी और विश्व की 26वीं सबसे ऊंची मूर्ति है। इस मूर्ति का नाम समता मूर्ति (Statue of Equality) रखा गया है।
रामानुजाचार्य वरदराज स्वामी के भक्त थे। श्रीरंगम उनकी कर्मभूमि रही। श्रीरंगम में उनकी समाधि अभी भी श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में है। उन्होंने विशिष्टाद्वैत सिद्धांत दिया था। इस सिद्धांत के अनुयायी श्री वैष्णव के नाम से जाने जाते हैं। इस संप्रदाय के जो लोग संन्यास लेते हैं उन्हें जीयर कहा जाता है। उनके कई नाम होते हैं जैसे इलाया पेरूमल, एमबेरूमनार, यथीराज भाष्यकरा प्रमुख हैं।
सामाजिक समता के प्रतीक
श्री रामानुजाचार्य ने कहा था कि अगर सभी पर कृपा होती है तो वह शाप लेने के लिए तैयार हैं। उन्होंने मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर भी काम किया। उन्होंने इन जातियों से कुछ पुजारी भी बनाए। साथ ही समाज में ऊंच-नीच और झोपड़ी-महल के बीच समानता के सेतु बनाए। इसके अलावा, कठोर धार्मिक क्रियाओं को लोगों के लिए सरल और सहज बनाया। इसके साथ ही भक्त चरित्र के सर्वश्रेष्ठ गायक रहे नाभादास ने रामानुजाचार्य के लोकोत्तर व्यक्तित्व और अदम्य कृतित्व को सूत्रात्मक रूप से प्रकट करते हुए लिखा, "कृपणपाल करुणा समुद्र रामानुज सम नहीं बियो।"
उस वक्त तक केवल ब्राह्मण ही नारायण मंत्र का जाप कर सकते थे। उन्होंने अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों के लिए भक्ति का मार्ग खोल दिया। इससे सारे समाज में भक्ति की धारा उमड़ पड़ी। उन्होंने तिरुपति में अन्नक्षेत्र चलाया जहां आज भी लोग बिना जाति भेदभाव के भोजन करते हैं। उन्होंने घोषणा की थी कि भगवान की नजर में सभी समान है। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में अपने दिए गए भाषण में भी रामानुजाचार्य का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि रामानुज ने उच्च और निम्न जाति के लोगों के बीच बराबरी की भावना जगाई। इसके साथ ही रामानुजाचार्य महात्मा गांधी के वंचितों को मंदिर में प्रवेश कराने के आंदोलन के भी प्रेरणा स्त्रोत थे।
चोल काल और रामानुजाचार्य
चोल काल में वैष्णव मत के प्रसिद्ध आचार्य रामानुजाचार्य थे। रामानुजाचार्य ने कुलोत्तुंग द्वितीय द्वारा चिदम्बरम मंदिर से गोविन्दराज विष्णु की मूर्ति को समुद्र में फेंक देने के बाद उसे तिम्पति के विशाल वैष्णव मंदिर में स्थापित करवाया था। कुछ इतिहासकारों का मत है कि चोल काल दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' था। इनके समय मन्दिर स्थापत्य में एक नयी शैली का विकास हुआ। इस शैली को 'द्रविड़' कहते हैं। चोल शासकों ने श्रीलंका पर भी विजय प्राप्त कर ली थी और मालदीव द्वीपों पर भी इनका अधिकार था। कुछ समय तक इनका प्रभाव कलिंग और तुंगभद्र दोआब पर भी छाया था। इनके पास शक्तिशाली नौसेना थी। 1070 ईस्वी में अधिराजेन्द्र चोल की गद्दी पर बैठा। अधिराजेन्द्र शैव धर्म का अनुयायी था और प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य रामानुज से इतना द्वेष करता था कि रामानुज को उसके राज्य काल में श्रीरंगम छोड़कर अन्यत्र चले जाना पड़ा। उसके शासन काल में सर्वत्र विद्रोह शुरू हो गए। इन्हीं के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने शासन के पहले साल में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के साथ ही चोल वंश समाप्त हो गया।
भक्ति आंदोलन की नींव
भक्ति आंदोलन के जन्मदाता के रुप में हमेशा रामानुजाचार्य जी को सनातन धर्म में विशेष आदर प्राप्त है। जातिगत विषमता को खत्म करने के लिए रामानुजाचार्य जी ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी। सबसे पहले उन्होंने जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के सिद्धांतों का खंडन किया कि ईश्वर का स्वरुप सिर्फ निराकार है। रामानुजाचार्य ने सगुण परंपरा का प्रचार किया और ईश्वर की मूर्ति की पूजा का प्रचार किया। रामानुजाचार्य के अनुसार भगवान की पूजा किसी भी स्वरुप या मूर्ति के रुप में की जा सकती है।
दक्षिण भारत के अलावार और नयनार संतों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ईश्वर के सगुण रुप की पूजा को प्रचारित किया। रामानुजाचार्य ने सगुण स्वरुप भक्ति को मोक्ष के लिए आवश्यक और सहज माना। रामानुज ने भावना रहित निर्गुण परंपरा का विरोध कर एक ऐसी नयी भक्ति परंपरा को चलाया जिनसे कबीर,नानक, तुलसी, रैदास, मीरा जैसे भक्त निकले। रामनुजाचार्य के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य 'श्रीभाष्य' एवं 'वेदार्थ संग्रह' मूल ग्रंथ है और वह 1137 ई. में ब्रह्मलीन हो गए।












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