Sri Lankan Tamils: श्रीलंका के तमिल समाज की मांग, भारत करे जान माल की रक्षा
Sri Lankan Tamils: इन दिनों श्रीलंका के तमिल नेता भारत आए हुए हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आकर वे भारत सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह श्रीलंका के तमिलों की जान माल की सुरक्षा सुनिश्चित करे। उनका कहना है कि श्रीलंका के तमिलों यानी इलम तमिलों के साथ श्रीलंका को 1948 में मिली आजादी के समय से ही भेदभाव हो रहा है। पर 2009 में जब से एलटीटीआई का खात्मा हुआ तब से तो श्रीलंका के उत्तर पूर्व राज्य में रह रहे तमिलों और उनके धर्म स्थलों के साथ लगातार श्रीलंका की आर्मी बर्बरता दिखा रही है। श्रीलंका के तमिल प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली से आग्रह किया है कि वह 1987 की भारत श्रीलंका संधि को लागू करवाए।
तमिलों के साथ ऐतिहासिक त्रासदी
श्रीलंकाई तमिल मुख्य रूप से द्वीप के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों के सीलोन या जाफना इलाके में रहते हैं। इनका दक्षिण भारत से खास जुड़ाव है। वर्ष 2012 की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या लगभग 23 लाख है। 1948 -49 में मिली श्रीलंका की आज़ादी की शुरुआत में ही तमिलों को नागरिकता अधिनियमों के माध्यम से राज्यविहीन बना दिया गया और उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

1970 के दशक में भारत और श्रीलंका ने एक समझौता किया, जिसके तहत भारत 600,000 तमिलों को नागरिकता देने पर सहमत हुआ जो भारत लौटना चाहते थे; जबकि श्रीलंका उन तमिलों को नागरिकता देने पर सहमत हो गया जिन्होंने वहीं रहने का फैसला किया। लेकिन वर्ष 2000 तक लगभग 300,000 तमिल राज्यविहीन थे और श्रीलंका में रह रहे थे। 2003 में एक नए अधिनियम ने भारतीय मूल के सभी व्यक्तियों को नागरिकता देने का अधिकार दिया। सिंहली राष्ट्रवाद में वृद्धि और सिंहली को श्रीलंका की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने से तमिलों के साथ अत्याचार बढ़ गया और अल्पसंख्यक तमिलों के साथ अधिक भेदभाव और अलगाव हुआ।
1987 की संधि लागू नहीं कर रहा श्रीलंका
उल्लेखनीय है कि 29 जुलाई, 1987 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे. आर. जयवर्धने के बीच एक शांति समझौता हुआ था, जिसे श्रीलंका संविधान के 13वें संशोधन के रूप में जाना जाता है और जिसके तहत श्रीलंका में रह रहे तमिल हिंदुओं को शांति और सम्मान के साथ रहने के सभी जरूरी उपाय करने की गारंटी श्रीलंका सरकार ने दी थी। अब भारत आए श्रीलंका के प्रतिनिधि का कहना है कि अभी तक किसी भी श्रीलंका सरकार ने 1987 की संधि को लागू नहीं किया है। हर बार कुछ ऐसी शर्तें लाद कर तमिलों के सामने यह प्रस्ताव लाया जाता है जिसके कारण तमिलों के अधिकार सीमित किए जा सकते हैं और फिर उसका विरोध किए जाने के बाद श्रीलंका सरकार फिर से मामले को बट्टे खाते में डाल देती है।

राज्य प्रायोजित दमन
श्रीलंका प्रतिनिधिमंडल, जिसमें कई वर्तमान और पूर्व सांसद, श्रीलंका सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश और श्रीलंका सिविल सोसायटी के पदाधिकारी शामिल हैं, का कहना है कि श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ राज्य प्रायोजित दमन कार्य हो रहा है। तमिल क्षेत्र में पुलिस नहीं बल्कि पूरी तरह सेना का कब्जा है। हालात इतने खराब हैं कि हर चार तमिल नागरिकों पर एक सेना का जवान तैनात है। अभी तक लगभग 1800 मंदिर ध्वस्त कर दिए गए हैं।
श्रीलंका सरकार तमिलों के धार्मिक स्थल बौद्धों को सौंपती जा रही है। श्रीलंका के बौद्ध स्थानीय हिंदुओं के एक दम खिलाफ हैं। वे धीरे धीरे हिंदुओं की जमीन पर कब्जा करते जा रहे हैं। हर समय खूनी झड़प करते रहते हैं। तमिलों को देश निकाला किया जा रहा है और उनकी जरह सिंहली और मुसलमानों को योजनापूर्वक बसाया जा रहा है। खासकर श्रीलंका के पूर्वी क्षेत्र में मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ रही है।
अब भारत ही सहारा
श्रीलंका तमिल प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि उनके लिए भारत ही एक मात्र सहारा है और यह भारत के भी हक में है कि श्रीलंका के तमिल हिंदू सुरक्षित रहें। क्योंकि वहीं एक भारतीय तट की सुरक्षा की गारंटी कर सकते हैं। वरना पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह श्रीलंका से भी भारत विरोधी ताकतों का घुसपैठ हो सकता है।
इसलिए उनकी मांग है कि भारत सरकार अपना प्रभाव डालकर श्रीलंका सरकार से तमिलों की मातृभूमि पर उनके अधिकार सुनिश्चित करे। उनकी सुरक्षा के लिए स्थानीय पुलिस व्यवस्था लागू करे। उनकी जिंदगी और उनकी संपत्ति को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करे, श्रीलंका की शिव भूमि पर हिंदुओं की पूजा अर्चना में कोई विध्न या बाधा उत्पन्न ना करें। उनके विकास के लिए तमिल विकास परिषद का गठन करे और सबसे जरूरी कि भारत के साथ 1987 के शांति समझौते को पूरी तरह से लागू करे।
श्रीलंका के तमिल नेताओं की कश्मीरी हिंदुओं से मुलाकात
श्रीलंका तमिल प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में कश्मीरी हिंदू नेताओं से मुलाकात की और उनसे सहयोग मांगा कि वे तमिल हिंदुओं के अधिकार के लिए लड़ाई में सहयोग दें। श्रीलंका प्रतिनिधिमंडल में शामिल आस्ट्रेलियन तमिल कांग्रेस के अध्यक्ष कृष्णापिल्लई, तमिल-अमेरिकन यूनाइटेड पोलिटिकल एक्शन कमिटी के सचिव डॉ शिवराज, यूनाइटेड स्टेट्स तमिल एक्शन ग्रुप के सचिव सुंदर कुप्पुस्वामी, श्रीलंका संसद के पूर्व सदस्य गन्नामुत्थुू श्रीनेशन एवं शिवराजलिंगम, मौजूदा सांसद श्रीथरन शिवगनम और श्रीलंका सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश विश्वलिंगम विघ्नेश्वरम ने दिल्ली में कश्मीरी पंडितों के नेता सुशील पंडित, काशी अखून, अमित रैना और रवींद्र पंडित से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने हिंदू धर्म और संस्कृति का एक दूसरे से ऐतिहासिक जुड़ाव पर चर्चा की और यह तय किया कि कश्मीरी नेता तमिलों के अधिकारों की लड़़ाई में सहयोग करेंगे और अपने अनुभवों का उन्हें लाभ देंगे।












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