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Sinking Coastal Areas: साल 2100 तक समुद्र में समा जायेंगे दुनिया के कई शहर, एक देश की राजधानी भी है शामिल

एक तरफ ग्लेशियर पिघल रहे है और समुद्रों का जलस्तर बढ़ रहा है। वहीं स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक शोध में दावा किया गया है कि दुनिया के कई डेल्टाओं की जमीन धंस रही हैं, जिससे वे सदी के अंत तक डूब जायेंगे।

Sinking Coastal Areas many cities of the world will be immersed in the sea By 2100 year

Sinking Coastal Areas: हाल ही में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन से पता चला है कि दुनिया के कुछ मुख्य डेल्टा 21वीं सदी से पहले समुद्र में डूब जायेंगे। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एवं लेखक राफेल श्मिट के अनुसार, डेल्टाओं के डूबने का यह कारण नहीं है कि समुद्री जल के स्तर में वृद्धि हो रही है, बल्कि उनके डूबने का कारण यह है कि वैश्विक डेल्टाओं की जमीन धंस रही है।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार भूजल के अत्यधिक दोहन और विभिन्न हाइड्रोकार्बन गतिविधियों से मिट्टी की जैविक विविधता खत्म हो रही है। नतीजतन हर दिन मिट्टी अंदर की तरफ बैठती चली जा रही है।

दूसरी ओर, ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनियाभर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्रों का जलस्तर भी बढ़ रहा है। जिससे तटीय इलाकों के किनारे बसे कई शहरों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो रहा है। इस प्रकार खतरा अब दोनों तरफ से है।

तेजी से डूब रहा है जकार्ता

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता अब तेजी से डूबने लगी है। गौरतलब है कि जकार्ता के डूबने का मुख्य कारण अत्यधिक भूजल का दोहन है। इस सन्दर्भ मेंम डेलेफ्ट यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों और बांडुंग इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने मिलकर एक अध्ययन किया था। अध्ययन में 2015 से 2018 के बीच जकार्ता की भूमि धंसने को जीपीएस, सैटेलाइट और कई अन्य तकनीकों के माध्यम से समझा गया।

इस शोध में पता चला कि जकार्ता के उत्तरी और पूर्वी हिस्से हर साल 25 सेंटीमीटर तक डूब रहे हैं। इसलिये इंडोनेशिया की सरकार ने जकार्ता की जगह एक नयी राजधानी बनाने की घोषणा कर दी है। जल्दी ही इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता की जगह नुसंतरा हो जायेगी।

भारत पर भी है प्रभाव

7,500 किलोमीटर से भी अधिक लंबी तटीय रेखा वाले भारत को समुद्र के बढ़ते स्तर से बहुत भारी नुकसान हो सकता है। गौरतलब है भारत के तटीय क्षेत्रों में 17 करोड़ से अधिक लोगों के घर हैं। आईआईटी बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने 2022 में एक अध्ययन किया था जिसमें पता चला कि मुंबई के कई हिस्से हर साल 2 मिलीमीटर तक धस रहे हैं। नवंबर 2021 में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया कि आने वाले समय में मुंबई का 65 प्रतिशत क्षेत्र पानी में डूबा हुआ होगा।

नासा ने 2021 में एक रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें बताया गया था कि भारत के कुछ तटीय शहरों के हिस्से 21वीं सदी के अंत तक पानी के अन्दर समा जायेंगे। इसमें कर्नाटक के मंगलुरु में 1.87 फीट, गुजरात के कांडला में 1.87 फीट, गोवा के मोरमुगाओ में 2.06 फीट, ओडिशा के पारादीप में 1.93 फीट, महाराष्ट्र के मुंबई में 1.90 फीट, केरल के कोच्चि में 2.32 फीट, गुजरात के भावनगर में 2.70 फीट पानी होगा।

दुनिया के कई शहरों के लिए संकट

समुद्र के स्तर में वृद्धि और जमीन का धंसना दुनिया के सभी तटीय क्षेत्रों को कभी न कभी प्रभावित जरूर करेगा। हालांकि, आज के समय भी ऐसे कई क्षेत्र हैं जो जमीन के धंसने से प्रभावित हैं। साइंटिफिक अमेरिकन के अध्ययन के अनुसार साल 2100 तक न्यूयॉर्क लगभग 5 फीट तक डूब सकता है। अध्ययन में यह भी बताया गया कि सालाना शंघाई की जमीन 1 सेंटीमीटर, बैंकॉक की जमीन 2 सेंटीमीटर, वेनिस की जमीन 1 मिलीमीटर से 2 मिलीमीटर, लंदन की जमीन एक मिलीमीटर और ढाका की जमीन 1.5 सेंटीमीटर धंस रही है।

समुद्रों के जल स्तर में वृद्धि

समुद्री जलस्तर में वृद्धि एक ऐसी घटना है जो समय के साथ दुनिया के महासागरों और समुद्रों के औसत स्तर में वृद्धि को बताती है। यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने और समुद्र के पानी के थर्मल विस्तार के कारण होती है। दरअसल, ग्लेशियर और बर्फ वातावरण से गर्मी को अपनी ओर खींच लेती हैं। समुद्रों के बढ़ते स्तर के परिणाम महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जिसमें तटीय शहरों और निचले इलाकों में बाढ़ आ सकती है।

ग्लेशियर के पिघलने से बढ़ा समुद्री जलस्तर

पिछली शताब्दी से समुद्रों का जलस्तर बढ़ रहा है। इसमें सबसे बड़ा योगदान ग्लेशियर्स के पिगलने का हैं। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक की बर्फ की चादरों के पिघलने के साथ-साथ अन्य छोटे ग्लेशियर भी बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार 1901 और 2010 के बीच वैश्विक समुद्र स्तर में औसतन 15 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है।

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