TMC में बगावत के भीतर बगावत सुर! ममता को 'सलाहकार' बताने पर बागी खेमे में ही घिरे ऋतब्रत बनर्जी

TMC Rebellion West Bengal 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों मिली करारी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में शुरू हुआ सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है।

तृणमूल कांग्रेस के 58 विधायकों द्वारा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोलने और खुद को अलग गुट घोषित करने के ठीक एक दिन बाद ही, अब इस बागी खेमे के भीतर भी दरारें और असंतोष के सुर उभरने लगे हैं।

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बगावती गुट के मुखिया और विधानसभा में नए नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता पाने वाले ऋतब्रत बनर्जी द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर दिए गए एक प्रस्ताव ने इस नए गुट के भीतर ही खलबली मचा दी है। कई बागी विधायकों ने साफ कर दिया है कि अगर ममता बनर्जी के कद को छोटा करने की कोशिश की गई, तो वे इस गुट में रहने पर दोबारा विचार करेंगे।

विवाद की वजह क्या? ममता बनर्जी को 'मुख्य सलाहकार' बनाने का प्रस्ताव

दरअसल, इस पूरे आंतरिक संकट और असंतोष की शुरुआत गुरुवार को हुई, जब बागी विधायक दल की बैठक में ऋतब्रत बनर्जी ने एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव में सुझाव दिया गया था कि ममता बनर्जी को पुनर्गठित विधायक दल का मुख्य सलाहकार (Chief Adviser) बना दिया जाए।

ऋतब्रत बनर्जी का यह प्रस्ताव कई बागी विधायकों को नागवार गुजरा। उनके लिए ममता बनर्जी को केवल एक 'सलाहकार' के रूप में देखना उनके राजनीतिक अस्तित्व और पहचान के खिलाफ है। विधायकों का मानना है कि 'सलाहकार' शब्द ममता बनर्जी के उस विशाल राजनीतिक कद और सम्मान के साथ न्याय नहीं करता, जो उन्होंने पिछले तीन दशकों में कमाया है।

'ममता नहीं मानी गईं सुप्रीम लीडर, तो छोड़ देंगे गुट': विधायकों की चेतावनी

बैठक खत्म होने के बाद मीडिया से बात करते हुए कई विधायकों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की। हावड़ा की पांचला सीट से बागी टीएमसी विधायक गुलशन मल्लिक ने समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) से कहा-"हमें शुरुआत में यह बताया गया था कि यह नया मोर्चा भी ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही काम करेगा। वह केवल एक सलाहकार नहीं हैं। हम चाहते हैं कि पूरी पार्टी और यह गुट उनके सीधे नेतृत्व में ही चले। अगर ममता बनर्जी को हमारी 'सुप्रीम लीडर' (सर्वोच्च नेता) के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है, तो हमें गंभीरता से सोचना होगा कि हम इस बागी गुट में बने रहें या नहीं।"

सिताई विधानसभा सीट से एक और बागी विधायक संगीता रॉय बसुनिया ने भी गुलशन मल्लिक के सुर में सुर मिलाया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, ममता बनर्जी हमारी सर्वोच्च नेता हैं और हमेशा रहेंगी। उन्हें किसी सलाहकार की भूमिका में सीमित नहीं किया जा सकता। वह हमारी लीडर हैं और फैसला वही लेंगी।

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ममता से वफादारी, अभिषेक से तकरार: बागियों की दोहरी रणनीति

टीएमसी के भीतर इस पूरी बगावत के दौरान एक दिलचस्प राजनीतिक रणनीति देखने को मिल रही है। बागी विधायक लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उनकी लड़ाई टीएमसी की संस्थापक ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके भतीजे और पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ है।

बागी विधायकों का आरोप है कि पिछले कुछ समय से विधायक दल और पार्टी के कामकाज में अभिषेक बनर्जी का दखल और तानाशाही बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। वे जनता के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि वे ममता बनर्जी के प्रति पूरी तरह वफादार हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी की बढ़ती ताकत और उनके फैसलों का विरोध करते हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को पत्र लिखकर खुद को अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग की थी।

28 साल के इतिहास के सबसे बड़े संकट में फंसी TMC

पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने 28 साल के इतिहास के सबसे गंभीर और अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। गुरुवार को टीएमसी के 58 विधायकों ने आधिकारिक तौर पर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को खारिज कर दिया था। इन बागियों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना, जिन्हें विधानसभा अध्यक्ष ने रिकॉर्ड समय में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता भी दे दी।

इस टकराव ने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। हालांकि, चौबीस घंटे के भीतर ही बागी खेमे में ममता बनर्जी के पद और कद को लेकर शुरू हुई इस रार ने यह साफ कर दिया है कि ऋतब्रत बनर्जी के लिए इस 58 विधायकों के कुनबे को एक साथ बांधकर रखना आसान नहीं होने वाला है।

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