कश्मीरी सियासत पर चढ़ रहा अलगाव का रंग

जम्मू कश्मीर जैसे जैसे चुनावों की तरफ बढ़ रहा है, देश के दूसरे हिस्सों की तरह वहां की फिजाओं पर भी सियासत का रंग तेजी से चढऩे लगा है। कथित मुख्2यधारा की कश्मीरी पार्टियों में खुद को ज्यादा पक्का कश्मीरी साबित करने की होड़ चल निकली है। इसके लिए इनके बीच प्रतिस्पर्धा इस बात की भी चलेगी कि दिल्ली को कौन कितना ज्यादा कोस सकता है। मानों कश्मीरियत का हिमायती होने का पैमाना सिर्फ यही हो। इस नापाक कंपीटिशन का मकसद कट्टरपंथियों के बीच अपनी पकड़ बनाना है। औरों की छोडि़ए खुद उमर अ4दुल्ला इस होड़ में शामिल हैं।

दिल्ली की तरफ रोज उलाहने उछालना और बारंबार यह कहना कि कश्मीर समस्या का राजनीतिक समाधान चाहिए दर्शाता है कि वे अलगाववादियों के मनों में अपने लिए कोई सुरक्षित कोना आरक्षित करने के लिए प्रयासरत हैं। खैर इसी प्रक्रिया में एक बार फिर सुरक्षा बलों के खिलाफ तमाम तरह की साजिशें जारी हैं। आर्मड फोर्सिज स्पेशल पॉवर्स ए1ट को हटाने के लिए मिथ्या क्रंदन यथावत जारी है। पीड़ादायक बात यह कि इस कानून और सुरक्षाबलों के खिलाफ हो-हल्ला करने वाले बखूबी जानते हैं कि घाटी में जमीनी स्थिति आज भी खासी नाजुक बनी हुई है।

Kashmir

हालिया मीडिया रिपोर्ट इंगित करतीं हैं कि सूबे के नौजवानों का एक तबका फिर अलगावादियों की दिखाई-बनाई राह पकडऩे लगा है। उधर, सीमा पार बैठे आतंक के कारोबारी अपने पाकिस्तानी आकाओं के इशारे पर अपनी गतिविधियों को तेज कर रहे हैं। पाकिस्तान सरहद पर गोलीबारी कर हमारे बाहरी और भीतरी दुश्मनों के देशविरोधी गान को संगीत दे रहा है।

यह सर्वज्ञात है कि राज्य में सक्रिय और छिपे हुए पाक प्रशिक्षित आतंकियों की संख्2या का आंकड़ा सैंकड़ों में है जो अवसर मिलते ही वारदात करने से नहीं चूकते। कुल मिलाकर स्थिति नितांत चिंताजनक बनी हुई है। मगर उससे से भी ज्यादा चिंता में डालने वाली बात यह है कि दिल्ली और श्रीनगर के हु1मरानों की ओर से आतंक और उसकी विचारधारा को नाथने के लिए

कड़े उपायों के कोई संकेत नहीं दिए जा रहे। भारत विरोधियों के साथ कड़ाई से पेश आने के बजाय सरकारी तंत्र कश्मीर के विमर्श को रह रह कर उसी ओर धकेलता महसूस होता है जहां देशविरोधी और पाकिस्तान परस्त लोग उसे एक अरसे से जमाए हुए हैं।

कहना न होगा कि विशुद्ध सांप्रदायिक कारणों से ऐसा हो रहा है। आने वाले दिनों में ऐसा होता रहेगा, यह सियासत के जानकार समझते हैं। ऐसा नहीं होता तो श्रीनगर के एक होटल में संसद के हमलावर अफजल गुरू की जेल डायरी पर आधारित देश-विरोधी विष-वमन करने वाली किताब का लोकार्पण समारोह उमर सरकार ने रोक दिया होता। ज्ञात रहे कि अफजल की डायरी के पन्नों को घनघोर भारत विरोधी और कट्टर सांप्रदायिक संगठन नेशनल फ्रंट ने एक किताब की शक्‍ल में प्रकाशित किया है।

छापने वाले कहते हैं कि इसकी पांच हजार प्रतियां वे बंटवा चुके हैं। दूसरी तरफ हाल ही में विश्वविख्2यात संगीतकार जुबिन मेहता के शो के समांतर हुए हकीकत-ए-कश्मीर कार्यक्रम में हुई अलगाव और विघटन की जुगलबंदियों को भी एक सीडी के रूप में बांटने की तैयारी है। सीडी के कवर पर मकबूल बट्ट से लेकर अफजल गुरू तक की तस्वीरें होंगी। इस काम को सैयद अली शाह गिलानी व यासीन मलिक समेत तमाम चरमपंथियों का समर्थन हासिल है। वे इसे कश्मीरियों के कथित स्वतंत्रता संग्राम का एक नया आयाम करार दे रहे हैं।

पाकिस्तान पालित चरमपंथी तत्व तो ऐसा कहेंगे ही। मगर वे जो खुद को सार्वजनिक मंचों से भारतपक्षीय राजनीति के कश्मीरी ठेकेदार करार देते हैं, उनका इस बारे में रवैया देख्ख्खना और समझना आवश्यक है। राज्य सरकार ने न जुबिन मेहता के एहसास-ए-कश्मीर के समांतर हुए भारत विरोधी कार्यक्रम को रोका था और न ही उसकी ओर से उस आयोजन की सीडी की लांचिंग पर आंखे तरेरने की कोई भाव-भंगिमाएं प्रदर्शित की गई। अफजल की किताब को प्रतिबंधित करने का भी राज्य सरकार का कोई मूड नहीं।

कुल मिलाकर उमर अ4दुल्ला और उनकी टीम इस देश विरोधी प्रचार अभ्भ्भियान पर मौन साध कर तमाशा देख रही है। देश विरोधी विचारधारा के प्रसारकों को इतनी ढ़ील देकर जूनियर और सीनियर अ4दुल्ला या हासिल करना चाहते हैं, यह शीशे की तरह साफ है। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के श4दों में कहना हो तो कहीं न कहीं उमर खुद को अलागववादियों का नेता साबित करने के प्रयास में हैं।

यहां यह जान लेना महत्वपूर्ण है कि -अहले ईमान ने नाम शहीद मोह6मद अफजल गुरू का आखिरी पैगाम- भ् नामक भारतद्रोही गुरू की डायरी पर आधारित किताब में खुल्लमखुल्ला भारत के ख्खिलाफ दीन के नाम पर जेहाद-ए-कश्मीर का आवाहन किया गया है। सात महीने पहले संसद भवन पर हमले के आरोप में तिहाड़ में सूली पर लटकाया गया इस हमले के मुख्य साजिशकर्ता गाजी बाबा की जम कर तारीफ करता है। इतना ही नहीं वह अफगानिस्तानी तालिबान सरगना मुल्ला उमर को अमीर-उल-मोमिनीन यानि मोमिनों का नेता भी करार देता है।

यह सच नहीं कि मीडिया में अफजल की डायरी के जो अंश आए हैं वे राज्य में आतंकवाद और अलगाववाद के धार्मिक चेहरे को और पुख्2ता ढंग से बेनकाब करते हैं। जिस कश्मीरी आतंकवाद और अलगाववाद को इस्लाम से विलग कर उसके दूसरे कारण गिनवाने में छद्म बुद्धिवादियों की टोलियां थकती नहीं उसका सबसे बड़ा अवलंब बकौल अफजल गुरू उनका दीन ही है।

किताब का विषय वस्तु घाटी के जहरीले माहौल में कितना विष और घोलेगा, यह तो समय बताएगा मगर इससे दिल्ली दरबार के आसपास मंडराने वाले उन कुत्सित बुद्धिजीवियों की आंखे तो खुलनी ही चाहिएं जो अफजल के पक्ष में बरसों से रूदन करते आ रहे हैं। आंख्खे खुले या न खुलें उन्हें कुछ रोज तक तो मारे शर्म के अपना मुंह छिपाना ही होगा।

लेखक परिचय- वीरेंद्र सिंह चौहान, जम्मू कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।

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