Same Sex Marriage: क्या समलैंगिक विवाह से स्वास्थ्य से लेकर समाज तक बुरा असर पड़ेगा?
समलैंगिक विवाह को लेकर क्या हमें सिर्फ दैहिक सुख के पश्चिमी नजरिए से सोचना या देखना चाहिए या भारतीय समाज और परंपरा के हिसाब से भी विचार करना चाहिए?

Same Sex Marriage: समलैंगिक विवाह को लेकर आज यानि 18 अप्रैल 2023 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक बेंच सुनवाई करेगी। वहीं इस सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह का विरोध किया है। केंद्र ने हलफनामा दायर कर सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है। साथ ही केंद्र ने कहा कि शादियों पर फैसला लेने का अधिकार संसद का है, सुप्रीम कोर्ट का नहीं।
बता दें कि इससे पहले 13 मार्च 2023 को चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने शादी के मामले को पांच जजों की संवैधानिक बेंच को ट्रांसफर कर दिया था। अब सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस रविंद्र भट, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच इस मामले पर सुनवाई करेगी।
दुनियाभर के देशों में है विवाद?
यहां गौर करने वाली बात यह है कि समलैंगिक विवाह को लेकर देश ही नहीं दुनियाभर के कई देशों में विवाद है। इसके कई कारण भी हैं। भारत में समलैंगिक जोड़े चाहते हैं कि उनके विवाह को मौलिक अधिकार के रूप में कानूनी मान्यता प्रदान की जाये और इसके लिए हिन्दू विवाह कानून, मुस्लिम विवाह अधिनियम, विशेष विवाह कानून और विदेशी विवाह कानून में संशोधन के लिए उचित निर्देश दिये जायें ताकि उनकी शादी का पंजीकरण हो सके।
समलैंगिक विवाह को लेकर हैं कई समस्याएं?
समलैंगिक जीवन गुजार रहे जोड़ों की शादियां सहित उनके द्वारा बच्चे गोद लेने की प्रक्रिया, उत्तराधिकारी का मुद्दा, घरेलू हिंसा और संबंध विच्छेद (तलाक) होने की स्थिति में गुजारा भत्ता जैसे कई जटिल मुद्दे शामिल हैं। जिसका निदान कानूनी रूप से बहुत ही मुश्किल है क्योंकि समलैंगिकों को लेकर इससे संबंधित कोई कानून है ही नहीं। साथ ही इनसे जुड़े अन्य कानूनों जैसे घरेलू हिंसा, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार और मैरिटल रेप आदि में भी बदलाव करना होगा लेकिन, इसमें भी कई सवाल और जटिलताएं सामने आएंगी।
जैसे अगर एक ही जेंडर के लोग शादी करेंगे तो गुजारा भत्ता कौन, किसको देगा? घरेलू हिंसा में अगर एक ही जेंडर के लोग हैं तो इसमें पीड़ित और अभियुक्त पक्ष कौन होगा? ससुराल-मायका, पितृधन और मातृधन क्या है, इस पर विचार करना पड़ेगा। वहीं इनके द्वारा बच्चे गोद लिए जाने पर कौन माता होगा और कौन पिता ये कैसे तय होगा? उसी तरीके से, मैरिटल रेप के भी प्रावधान हैं। इन सभी बातों का आपस में एक संबंध है। इसके लिए भारत को अपनी पूरी कानूनी संरचना बदलनी पड़ेगी क्योंकि विवाह के कानून की जड़ में स्त्री-पुरुष के संबंधों को ही निर्धारित किया गया है।
स्वास्थ्य पर पड़ता है बुरा असर?
समलैंगिक पुरुषों या महिलाओं के बीच जब यौन संबंध बनते हैं तो उन्हें दूसरों (स्त्री, पुरुष) की तुलना में कई तरह की बीमारियां घेर लेती हैं। यू.एस. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के 2010 के नेशनल एसटीडी प्रिवेंशन कॉन्फ्रेंस में पेश किये गये आंकड़ों के मुताबिक एक पुरुष का दूसरे पुरुष से यौन संबंध बनाने पर एचआईवी या एड्स की दर अन्य पुरुषों की तुलना में 44 गुना बढ़ जाती है। जबकि महिलाओं की तुलना में 40 गुना चांसेस बढ़ जाते हैं।
वहीं समलैंगिक पुरुष और अन्य पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते हैं उनमें अवसाद (डिप्रेशन) बहुत ज्यादा होता है। वहीं एक हेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक समलैंगिक संबंधों के कारण इनमें एनोरेक्सिया और बुलिमिया की समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती हैं।
बच्चों पर पड़ता है बुरा असर?
समलैंगिक कपल (पुरुष-पुरुष या महिला-महिला) आपस में यौन संबंध बनाकर बच्चे पैदा नहीं कर सकते। इसके लिए या तो वे सेरोगेसी का रास्ता अपनाएंगे या फिर बच्चा गोद लेंगे। इसे लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने इसका विरोध किया है। उनका कहना है कि समान लिंग जोड़े को गोद लेने की अनुमति देना बच्चों को खतरे में डालने जैसा है।
समलैंगिक कपल द्वारा गोद लिए गए बच्चों का 'पारंपरिक लिंग भूमिकाओं' तक सीमित संपर्क होगा और यह 'लिंग भूमिकाओं और लिंग पहचान' की उनकी समझ को प्रभावित करेगा और यह उनके समग्र व्यक्तित्व विकास को सीमित करेगा।
वहीं The Atlanta Journal-Constitution की एक रिपोर्ट के अनुसार समलैंगिक माता-पिता की परवरिश में पलने वाले बच्चे का मानसिक विकास उतना नहीं हो पाता है और वे हिंसक भी हो सकते हैं। वहीं समाज में उन बच्चों की स्वीकारिता बहुत कम होती है। ऐसे बच्चों के साथ स्कूलों में दूसरे बच्चों द्वारा अक्सर दुर्व्यवहार किया जाता है।
समलैंगिक विवाह भारतीय परंपरा के विपरीत
समलैंगिक विवाह भारतीय समाज के परंपरा के विपरीत है क्योंकि हिंदू विवाह में एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला के बीच एक पवित्र संबंध माना गया है। जबकि मुस्लिम कानून में विवाह एक अनुबंध है, जहां महिला और पुरूष ही मान्य हैं। भारतीय समाज में विपरीत लिंगों के बीच ही विवाह को हमेशा स्वीकार्यता दी गई है।
बताते चलें कि हिंदू धर्म में विवाह सोलह संस्कारों में से एक है, और इस तरह, एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला न केवल शारीरिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी विवाह के बंधन में बंधे हैं। हिंदुओं में विवाह का उद्देश्य केवल शारीरिक सुख या संतानोत्पत्ति नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति है। वहीं यहां पर कन्यादान (दुल्हन के पिता द्वारा दूल्हे को शादी में बेटी को विदा करना) और सप्तपदी (दूल्हे और दुल्हन द्वारा पवित्र अग्नि की परिक्रमा) की रस्में हिन्दू विवाह में 'मूल' महत्व रखती हैं। कुछ इसी तरह मुस्लिम और अन्य धर्मों में भी शादी को लेकर कुछ-कुछ पांरपरिक मान्यताएं हैं।
समलैंगिक विवाह की मांग आखिर क्यों?
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दरअसल 6 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। समलैंगिकों के वही मूल अधिकार हैं, जो किसी सामान्य नागरिक के हैं। सबको सम्मान से जीने का अधिकार हैं। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया था, जिसके बाद आपसी सहमति से दो समलैंगिकों के बीच बने संबंधों को अपराध नहीं माना जाता। फैसला सुनाते समय तब के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इसी के बाद से भारत में समलैंगिक विवाह की मांग ने जोर पकड़ लिया है।
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