इतिहास के पन्नों से- यादें इलाहाबाद के काफी हाउस की
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) यूं तो सभी पुराने शहरों में काफी हाऊस की संस्कति रही है, पर इलाहाबाद की बात निराली है। कहते हैं कि अगर आपने यहां के "काफी हाउस" की काफी नहीं पी तो समझिए कि आप देश की राजनीति के चश्मदीद गवाह बनने से रह गए।
1940 से चालू
पूरे देश में 1940 से काफी हाउस कि शुरुआत हुई और लगभग सभी काफी हाउस राजनैतिक धुरंधरों का अड्डा रहे । ऐसे ही जनेश्वर मिश्र, वी.पी. सिंह जैसे लोगों कि पसंदीदा जगह इलाहाबाद का सिविल लाइंस का काफी हाऊस रहा है, प्रदेश स्तर के तमाम जाने पहचाने चेहरे यहां काफी के साथ राजनीति करते मिल जाएंगे। [इतिहास के पन्नों से-देश के नेता अब नहीं करते कॉफी पे चर्चा]
राजनीतिक बहसें
खाटी इलाहाबादी मोहम्मद जाहिद कहते हैं कि कभी देश की राजनीति यहीं काफी के टेबल पर तय होती थी और तब तक जबतक कि इलाहाबाद देश की राजनीति को संचालित करता था तब के सभी बड़े नेता यहीं बैठे मिल जाते थे।
लगभग 80 साल के वयोवृद्ध राजेन्द्र गोयल जी इस काफी हाऊस में अक्सर आकर बैठ जाते हैं और बुढ़ापे का कुछ समय यहाँ काटते हैं।वे संघ के स्वयंसेवक हैं और लगभग 40 वर्ष से संघ की शाखाओं में बिना किसी अनुपस्थिति के जाते रहे हैं।
साहित्यकारों का भी अड्डा
अब राजधानी दिल्ली में बस गए पर दिल से इलाहाबादी राजेश डंग कहते हैं कि उन्होंने इलाहाबाद के काफी हाउस में कई बड़े साहित्यकारों से लेकर नेताओं तक को काफी की चुस्की लेते हुए देश दुनिया पर मंथन करते देखा-सुना है। हालांकि उन्हें भी इस बात का अफसोस है कि इलाहाबाद में काफी कल्चर अब पहले की तरह से तो नहीं रहा।
नहीं भूलते
लगता है कि इलाहाबाद को छोड़ने के बाद भी इस शहर से जुड़े रहे लोग यहां के काफी हाउस को भूल नहीं पाते हैं। वरिष्ठ उपन्यासकार और पत्रकार प्रदीप सौरभ भी उन्हीं इलाहाबाद वालों में हैं। वे भी उन दिनों को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं जब वे इस शहर में रहते हुए काफी हाउस में जाया करते थे।













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