Swami Vivekananda: जीवन भर कष्ट सहते हुए भी स्वामी विवेकानंद ने विश्व में बजाया भारत का डंका

Swami Vivekananda: अमरीका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म सभा में भारत का एक संत भाषण देने के लिए तैयार था। भाषण की शुरुआत में जब उस संत ने कहा, अमरीकी भाइयों और बहनों... तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा ऑडिटोरियम गुंजायमान हो उठा। इसके बाद अपने भाषण से पूरी दुनिया में मशहूर हुए वह संत जिन्हें हम स्वामी विवेकानंद के नाम से जानते है। आज उस महान आत्मा की पुण्यतिथि है। आपको बता दें कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित फ्रांसीसी लेखक रोमां रोलां ने अपनी किताब 'लाइफ ऑफ विवेकानंद' में स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था कि स्वामी जी का शरीर एक पहलवान की तरह मजबूत और शक्तिशाली था। चौड़ा सीना और गजब की आवाज थी।

शुरुआती जीवन और गुरु-शिष्य का मिलन

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। उनका नाम नरेंद्र दत्त था, जो सन्यास लेने के बाद विवेकानंद हुआ। 1884 में पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गयी तो घर का सारा भार नरेंद्र यानी स्वामी विवेकानंद पर पड़ गया। घर की दशा बहुत खराब हो गई थी। गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि सत्कार वाले व्यक्ति थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते और खुद बाहर सोते व अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

Remembering Swami Vivekananda played Indias sting in the world

अब उनके जीवन की बात हो और गुरु रामकृष्ण परमहंस का जिक्र न हो ऐसा हो नहीं सकता। तो सबसे पहले हम आपको बताते हैं गुरु और शिष्य की पहली मुलाकात का किस्सा। हुआ यूं कि एक दिन उनके चचेरे भाई रामचंद्र दत्ता ने उनसे कहा कि उनके साथ दक्षिणेश्वर मंदिर चलो। वहां रामकृष्ण परमहंस हर आने वाले को 'रौशोगुल्ल' (रसगुल्ला) खिलाते हैं।

नरेंद्र वहां चले गये। साल 1981 में यह पहला अवसर था जब गुरु शिष्य का मिलन होने जा रहा था। रामकृष्ण परमहंस से पहली मुलाकात में ही उन्होंने पूछा कि महाराज क्या आपने ईश्वर को देखा है? तो परमहंस ने कहा कि हां मैंने ईश्वर के दर्शन किये हैं, जैसे तुम्हें देख रहा हूं ठीक वैसे ही। और यदि कोई उन्हें हृदय से पुकारे तो ईश्वर अवश्य ही दर्शन देते हैं।

25 वर्ष की आयु में बने सन्यासी

परमहंस जी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ। फलस्वरूप नरेंद्र, परमहंस जी के शिष्य हो गये। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ। 25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिये। अंतिम समय में अपने सारे शिष्यों को बुलाकर परमहंस ने कहा था कि विवेकानंद उनके उत्तराधिकारी होंगे। इसके बाद 16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण महासमाधि में चले गये। उसके बाद विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

इसके बाद स्वामी विवेकानंद ने भारत सहित विदेश में भ्रमण किया। अमेरिका में हुए उनके भाषण पर गौतम घोष ने अपनी किताब 'द प्रॉफेट ऑफ मॉडर्न इंडिया, स्वामी विवेकानंद' में लिखा कि धर्म संसद में बोलने वालों के क्रम में विवेकानंद का नंबर 31वां था। लेकिन उन्होंने आयोजकों से अनुरोध किया कि उन्हें सबसे अंत में बोलने दिया जाये। उनके पास पहले से तैयार भाषण भी नहीं था। लेकिन उन्होंने मां सरस्वती का स्मरण किया और जैसे ही डॉक्टर बैरोज (मंच संचालक) ने उनका नाम पुकारा वह मंच पर जा पहुंचे। इसके बाद जैसे ही उन्होंने अपने पहले शब्द 'सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका' कहा तो सारे लोग खड़े हो गये और लगातार दो मिनट तक ताली बजाते रहे।

छोटी उम्र में बड़ी बीमारियां

स्वामी विवेकानंद का जीवन बहुत संघर्षों से भरा रहा। कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद दमा और मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रसित थे। मशहूर बांग्ला लेखक मणिशंकर मुखर्जी का कहना था कि स्वामी विवेकानंद एक नहीं बल्कि 31 बीमारियों के शिकार थे। अपनी किताब 'द मॉन्क ऐज मैन' में उन्होंने लिखा कि स्वामी विवेकानंद अनिद्रा, मलेरिया, माइग्रेन, यकृत, मधुमेह, किडनी, लिवर और दिल समेत पूरी 31 बीमारियों से पीड़ित थे। स्वामी विवेकानंद की कम उम्र में मृत्यु का कारण उनकी बीमारियां ही थी।

साथ ही उन्होंने किताब में लिखा कि 29 मई 1897 में विवेकानंद ने शशि भूषण घोष को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि मैं अपनी जिंदगी में कभी भी बिस्तर पर लेटते ही नहीं सो पाया। पर इतनी बीमारियों से परेशान होने के बावजूद भी विवेकानंद ने अपने शरीर को मजबूत बनाये रखने पर पूरा जोर दिया था। स्वामी विवेकानंद को शायद अपनी मृत्यु का आभास पहले ही हो गया था।

इसलिए इस बात को कई बार कह चुके थे कि वह 40 बरस से अधिक आयु तक जीवित नहीं रह सकेंगे। स्वामी विवेकानंद ने अपनी बीमारी को लेकर कहा था कि ये बीमारियां मुझे 40 साल भी पार नहीं करने देंगी। अपनी मृत्यु को लेकर की गई स्वामी विवेकानंद की भविष्यवाणी सच निकली। उनकी मृत्यु 4 जुलाई 1902 में हुई तब वह केवल 39 साल के थे।

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