राहुल गांधी की कहानी से सीख लें भारतीय माता-पिता

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के चेहरे की मुस्कुराहट अलग ही दिख रही थी, जब उनके बेटे राहुल गांधी एलपीजी सिलेंडरों की संख्या बढ़ाने की घोषणा कर रहे थे। इस शानदार पल में मां मुस्कुरा रही थी और चाटुकार तालियां पीट रहे थे। उसके बाद राहुल का टाइम्स नाउ पर इंटरव्यू एक बड़ी आपदा के रूप में कांग्रेस के सामने आया और पूरे देश ने कहा कि यह एक गलत आदमी है, जिसे गलत जगह बिठा दिया गया है।
जॉन एफ केनेडी ने कहा है कि सभी बेटों की माएं चाहती हैं कि उनका बेटा बड़ा होकर राष्ट्रपति बने, यह कभी नहीं चाहतीं कि वो एक नेता बने।
राहुल गांधी भी उस स्तर पर सक्षम नहीं हैं, जिस स्तर पर उन्हें देखा जाता है। यूपीए 2 की परफॉरमेंस की बात करें तो घोटाले, गठबंधन और दंगे सामने आते हैं, लेकिन इनसे जुड़े एक भी सवाल का जवाब राहुल नहीं दे पाते हैं और यह हम देश की सवा सौ करोड़ की आबादी वाली जनता के प्रधानमंत्री से उम्मीद नहीं कर सकते।
तमाम भारतीय अपने पूर्वजों की विरासत आंख मूंद कर बेटों के हवाले कर देते हैं
सच पूछिए तो इसके लिये राहुल को नहीं बल्कि सोनिया गांधी को जिम्मेदार माना जाना चाहिये। राहुल जिस पद पर विराजमान हैं, उस पद के लिये एक प्रकार की क्षमता व दक्षता चाहिये और वो दोनों ही राहुल के पास नहीं हैं। सोनिया जैसे तमाम भारतीय हैं जो अपने पूर्वजों की विरासत, जयदाद या व्यापार उन बेटों के हवाले कर देते हैं जो उसके काबिल नहीं होते और आगे चलकर जायदाद नष्ट हो जाती है और बिजनेस ठप हो जाता है। ऐसा सिर्फ राजनीति में नहीं होता, बल्कि हर क्षेत्र में वंशवाद चलता है। कॉर्पोरेट सेक्टर की तमाम बड़ी कंपनियां हैं, उद्योग घराने हैं, जिनके वारिस ही गद्दी संभालते आये हैं, लेकिन फर्क इतना रहा है कि वहां पर बेटे को कमान सौंपने से पहले उसे उस काबिल बनाया जाता है।
अफसोस राहुल गांधी को उस स्तर की ट्रेनिंग दिये बगैर ही कांग्रेस की बागडोर सौंप दी गई। यहां पर एक मां का सपना तो पूरा हो गया, लेकिन एक संगठन का सपना चकनाचूर होता नजर आ रहा है। कांग्रेस ने उस नेता को प्रक्षेपित कर दिया जो पावरफुल है लेकिन उन पर गर्व नहीं कर सकते, वो प्रभावशाली हैं, लेकिन उनके अंदर स्वाभिमान की कमी है, एक दर्शनशास्त्री की तरह बात करते हैं लेकिन सोचते नहीं। कहीं न कहीं उनके अंदर एक अक्खड़पन दिखाई देता है।
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इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी वंशवाद द्वारा निर्मित वो उत्पाद हैं, जिसे कांग्रेस ने चुनाव की बागडोर सौंपी है और कांग्रेस का समर्थन करने वाली जनता उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रही है। यहां पर यह कहना गलत नहीं होगा कि सोनिया गांधी ने अपनी महत्वकांक्षाओं के लिये राहुल के करियर की बलि चढ़ा दी है। सोनिया ने जो किया सो किया, लेकिन अपने बेटे या बेटी को वंशवाद की डोर में बांधने से पहले आप जरूर एक बार सोच लीजियेगा।
यह लेख महेश पेरी के अंग्रेजी में लेख का हिन्दी रूपांतरण है।












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