Places of Worship Act 1991: क्या है यह कानून और कैसे हुआ यह लोकसभा और राज्यसभा से पारित?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूजा स्थल अधिनियम 1991 पर जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2023 में होगी।

Places of Worship Act 1991: मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद के मामले में हिंदू सेना की याचिका पर मथुरा की अदालत ने ईदगाह का सर्वे कराने का आदेश दिया है। इस सर्वे की शुरुआत 2 जनवरी से होगी और 20 जनवरी को कोर्ट में रिपोर्ट प्रस्तुत की जायेगी। हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह में स्वास्तिक का चिन्ह है, जोकि इसके मंदिर होने का प्रमाण है। साथ ही मस्जिद के नीचे भगवान का गर्भगृह भी मौजूद है। इस मामले में मुस्लिम पक्ष का कहना है कि वह 20 जनवरी को कोर्ट में आपत्ति पत्र दाखिल करेगा।
गौरतलब है कि 8 दिसंबर को हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता और उपाध्यक्ष सुरजीत सिंह यादव ने सिविल जज सीनियर डिवीजन की न्यायाधीश सोनिका वर्मा की अदालत में एक याचिका दायर की थी। जिसमें कहा गया था कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि की 13.37 एकड़ जमीन पर बने मंदिर को तोड़कर औरंगजेब ने ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया था। उन्होंने 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगाह कमेटी के बीच हुए समझौते को भी चुनौती दी है।
ईदगाह का सर्वे कराने के अदालत के आदेश पर इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि यह पूजा स्थल अधिनियम 1991 का उल्लंघन है। इससे पूर्व मई महीने में मथुरा की अदालत ने कहा था कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद का विवाद पूजा स्थल अधिनियम 1991 के तहत नहीं आता। इसलिए यह मुद्दा सुनवाई योग्य है। अदालत ने कहा कि 1991 का कानून लागू होने से पहले ही इस मामले की डिक्री तैयार कर ली गई थी। अतः 1991 का पूजा स्थल अधिनियम इस पर लागू नहीं होता।
क्या है पूजा स्थल अधिनियम 1991 के प्रावधान
1990 में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। अयोध्या में मुलायम सिंह सरकार द्वारा कारसेवकों पर गोलियां चलाई गई थी, जिसमें कई कारसेवक मारे गये। पूरे देश में माहौल तनावपूर्ण था। इसी तनाव को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शासनकाल में 18 सितंबर 1991 को संसद से पूजा स्थल अधिनियम (विशेष प्रावधान) यानि Places of Worship (Special Provisions) Act 1991 पारित कराया गया।
इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 तक जो धार्मिक स्थान जिस स्थिति में था, वह उसी स्थिति में रहेगा। इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता और न ही इसे किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल में बदला जा सकता है। इस कानून की धारा 5 के तहत अयोध्या विवाद को इससे अलग रखा गया। क्योंकि, यह मामला स्वतंत्रता से पूर्व ही अदालत में था।
इस कानून की धारा तीन के तहत अगर कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल में बदलने का प्रयास करता है, तो उसे तीन वर्ष तक का कारावास और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
कैसे हुआ यह कानून लोकसभा और राज्यसभा से पारित
11 जुलाई 1991 को संसद के दोनों सदनों - लोकसभा और राज्यसभा को संबोधित करते हुए भारत के राष्ट्रपति, आर. वेंकटरमण ने Places of Worship Act नाम से एक विधेयक लाने का सुझाव पेश किया था। जिसके बाद, राज्यसभा में 31 जुलाई 1991 को एक प्रश्न के जवाब में संसदीय कार्यालय राज्यमंत्री एमए जैकब ने भी इस विधेयक को जल्दी सदन के समक्ष रखने का वादा किया। दरअसल, कांग्रेस ने लोकसभा के अपने चुनावी घोषणापत्र में भी ऐसा ही एक विधेयक पारित करवाने का वादा किया था।
कांग्रेस यह विधेयक पेश करती, उससे पहले सीपीआई-एम के लोकसभा सांसद जैनल आबेदीन ने 12 जुलाई 1991 को एक विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया, उसका नाम Maintaining Status Quo of Religious Shrines and Places of Worships था। इस निजी विधेयक को सीपीआई-एम, कांग्रेस आई, जनता दल, रेव्युलेश्नरी सोशलिस्ट पार्टी, मुस्लिम लीग ने समर्थन दिया।
जैनल आबेदीन ने अपने भाषण में इस विधेयक को पेश करने का उद्देश्य राजनैतिक बताया। उन्होंने कहा, लोकसभा में भाजपा दूसरा सबसे बड़ा दल बन गया है और उत्तर प्रदेश में सरकार भी बना ली है। इस प्रकार जैसे बहुसंख्यकों की भावनायें राम के मंदिर के लिये है उसी प्रकार अल्पसंख्यकों की 400 साल पुरानी बाबरी मस्जिद के साथ है। गौरतलब है कि दसवीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस आई को सर्वाधिक 252 और उसके बाद भाजपा को 121 सीटें प्राप्त हुई थी। उत्तर प्रदेश के 1991 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को सर्वाधिक 221 और दूसरे स्थानपर पर जनता दल को 92 सीटें मिली थीं।
इस विधेयक पर पांच दिनों तक लम्बी चर्चा हुई और अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर आबेदीन ने अपना निजी विधेयक वापस ले लिया। जिसके बाद कांग्रेस ने इस विधेयक को फिर से 23 अगस्त को पेश किया। इस बार केंद्रीय गृह मंत्री एसबी चव्हाण ने Places of Worship (Special Provision) Bill लोकसभा में पेश किया।
इस विधेयक का सर्वाधिक विरोध भाजपा की तरफ से लाल कृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, मदनलाल खुराना, उमा भारती और गिरधारीलाल भार्गव ने किया। भाजपा के सदस्य वोटिंग से पहले सदन का बहिष्कार करते हुये बाहर चले गये। जिसके बाद यह लोकसभा में पारित हो गया और बाद में 11 सितम्बर को राज्यसभा से भी इसे अनुमति मिल गयी।
कानून को रद्द करने के प्रयास
लोकसभा में 6 दिसंबर 1991 को शिव सेना के मोरेश्वर सावे ने एक प्रस्ताव - "That leave be granted to introduce a Bill to repeal the Places Worship (Special Provisions) Act, 1991।" इस कानून को रद्द करवाने का यह प्रस्ताव सदन ने स्वीकार तो किया लेकिन इस पर कभी चर्चा नही हुई।
इस कानून को रद्द करने के लिए कई बार सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब संविधान ने कानून व्यवस्था, कृषि और शिक्षा की तरह धार्मिक स्थलों के रखरखाव और कानून बनाने का अधिकार भी राज्यों को दिया है, तो केंद्र सरकार ने यह कानून कैसे बनाया? याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून असंवैधानिक है। लिहाजा इसे रद्द किया जाये।
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साल 2020 में वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इस कानून की धारा दो, तीन और चार को संविधान का उल्लंघन बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में पूजा स्थल अधिनियम 1991 की वैधता की परीक्षण की अनुमति दी। अदालत ने इस मामले में भारत सरकार को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा था। हालांकि, केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। अब इस मुद्दे पर अगली सुनवाई जनवरी 2023 में होनी है।
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