Same Sex Marriage: क्या राय है देश के सामाजिक - धार्मिक संगठनों की समलैंगिक विवाह पर
अगले महीने पांच जजों की एक बेंच समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने अथवा न देने पर अपना फैसला देगी। इस बीच समलैंगिक विवाह को लेकर देश के राजनैतिक दल खुलकर बोलने से बच रहे हैं।

Same Sex Marriage: समलैंगिक विवाह (same sex marriage) को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली 15 याचिकाओं पर सुनवाई अब 18 अप्रैल 2023 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच करेगी। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इस मामले को 5 जजों की संवैधानिक बेंच को भेज दिया था।
चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ सहित जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने तब कहा था कि यह एक मौलिक मुद्दा है। हमारे विचार से यह उचित होगा कि मामले को 5 जजों की बेंच के सामने संविधान के अनुच्छेद 145 (3) के आधार पर फैसले के लिए भेजा जाये। अतः हम मामले को संवैधानिक बेंच के सामने रखने का निर्देश देते हैं।
इससे पहले 12 मार्च 2023 को केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग पर आपत्ति जताई थी। केंद्र ने 56 पन्नों के एक हलफनामे में कहा कि समलैंगिक विवाह भारतीय परंपरा के मुताबिक नहीं है। यह पति-पत्नी और उनसे पैदा हुए बच्चों के कॉन्सेप्ट से मेल नहीं रखता। इसलिए इसे कानूनी रूप देना ठीक नहीं होगा।
हालांकि, यहां सबसे बड़ी बात है कि 'समलैंगिक विवाह' को लेकर देश की सभी राजनैतिक पार्टियां अधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं देना चाहती। आज तक किसी पार्टी द्वारा इस सन्दर्भ में कोई भी बयान अथवा प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है। हालांकि, कुछ बयान नेताओं ने निजी तौर पर दिये हैं लेकिन उनका पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। वैसे राजनेताओं के अलावा कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने इस मुद्दे पर खुलकर बोलना शुरू कर दिया है।
समलैंगिकता पर अभी तक की कानूनी लड़ाई
साल 2018 से पहले तक समलैंगिक संबंधों को भारत में गैर-कानूनी माना जाता था। दरअसल, भारत में समलैंगिक संबंधों को लेकर धारा 377 जैसा एक कानूनी प्रावधान था। जिसके अंतर्गत भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तहत किसी भी अप्राकृतिक शारीरिक संबंध को गैरकानूनी और दंडनीय माना गया था। फिर साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों की मान्यता दे दी थी। मगर अब समलैंगिक विवाह को मान्यता देने पर पेंच फंसा हुआ है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किया विरोध
देश में समलैंगिक विवाह पर उठे कानूनी विवाद के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा था कि संघ समलैंगिक विवाह पर केंद्र सरकार के नजरिए से सहमत है। शादी दो अलग-अलग जेंडर के लोगों के बीच ही हो सकती है। हिंदू दर्शन में विवाह संस्कार है। इसको कॉन्ट्रैक्ट नहीं कर सकते है। यह शारीरिक इच्छापूर्ति के लिए नहीं होता। शादी से गृहस्थ जीवन के आदर्श मिलते हैं।
अन्य धार्मिक-सामाजिक संगठनों का क्या कहना है
हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि के अनुसार समलैंगिक विवाह एक अवगुण है जोकि देवताओं और असुरों दोनों में नहीं होता था। हिन्दू महासभा के अनुसार यह मानसिक विकृति है। जबकि देश में मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था जमीयत-उलेमा-ए-हिंद समलैंगिक संबंधों का शुरू से विरोध कर रही है। ऐसे में समलैंगिक विवाह पर भी उनका मत नकारात्मक होना तय है।
साल 2018 में जब समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था तब जमीयत के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने कहा था कि कोर्ट का यह फैसला देश में यौन अपराध को और बढ़ाएगा। उन्होंने आगे कहा कि समलैंगिक संबंध प्रकृति के नियमों के खिलाफ है। इससे लोगों का नैतिक पतन होगा और समाज में यौन अपराध बढ़ेगा। साथ ही हर रोज हिंसा की वारदात में भी इजाफा होगा। यह शर्मनाक कानून परिवार और समाज को पीछे ले जाएगा।
अमेरिका की एसोसिएट प्रेस (AP) न्यूज एजेंसी को दिये एक इंटरव्यू में पोप फ्रांसिस ने कहा था कि समलैंगिक होना कोई जुर्म नहीं है। उन्होंने कहा था कि ईश्वर अपने सभी बच्चों को उसी तरह प्यार करता है, जैसे वे हैं। पोप ने कानूनों का समर्थन करने वाले सभी कैथोलिक पादरियों का आह्वान किया कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों का गिरजाघरों में स्वागत किया जाए। जबकि समलैंगिक विवाह को लेकर पोप ने कहा कि विवाह एक संस्कार है। चर्च के पास संस्कारों को बदलने की शक्ति नहीं है। यह हमारे भगवान द्वारा स्थापित की गई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम समलैंगिक लोगों की निंदा करें।
'समलैंगिक विवाह' बनेगा विनाश का कारण
19 दिसंबर 2022 को बीजेपी के सांसद सुशील मोदी ने राज्यसभा में कहा था कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। यह देश के सांस्कृतिक लोकाचार और मूल्यों के खिलाफ है। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे असंहिताबद्ध या किसी भी संहिताबद्ध वैधानिक कानूनों में समलैंगिक विवाह को न तो मान्यता दी जाती है और न ही स्वीकार किया जाता है। यह भारत में व्यक्तिगत कानूनों के नाजुक संतुलन को देखते हुए पूर्ण विनाश का कारण बनेगा।
'शादी का मुद्दा नीतिगत विषय है'
सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह पर केंद्र सरकार के रुख से जुड़े सवाल पर कानून मंत्री किरेन रिजीजू का कहना है कि सरकार किसी व्यक्ति के निजी जीवन और उसकी गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं कर रही है। इसलिए कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। जब शादी की संस्था से जुड़ा कोई मुद्दा आता है तो यह नीतिगत विषय है। नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गतिविधियों को सरकार कभी बाधित या विनियमित नहीं करती है।
वृंदा करात ने किया समर्थन
समलैंगिक विवाह को लेकर सीपीआई (एम) इकलौती पार्टी है जो खुले तौर पर इसका समर्थन करती है। सीपीआई (एम) की वरिष्ठ नेता वृंदा करात का कहना है कि हम समलैंगिक जोड़ो के विवाह के रुप में रिश्ते की कानूनी मान्यता प्राप्त करने के अधिकारों का समर्थन करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए क्योंकि केंद्र सरकार ने तो स्पष्ट कर दिया कि वह इसका समर्थन नहीं करेंगे।
कांग्रेस नेता की 'हां', पार्टी की 'न'
कांग्रेस ने साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया था, जिसमें समलैंगिक संबंध को कानूनी मान्यता दी गयी थी। समलैंगिक विवाह के मसले पर कांग्रेस के लोकसभा सांसद मनीष तिवारी निजी तौर समलैंगिक विवाह का समर्थन करते है। उन्होंने यह बात इंडियन एक्सप्रेस को एक इंटरव्यू के दौरान कही थी। मगर उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि पार्टी की तरफ से वह यह बात नहीं कह रहे है। उनका यह विचार एक सांसद के रुप में व्यक्तिगत विचार है। इसी तरह समलैंगिक विवाह को लेकर कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर का भी कहना है कि वह अपनी पार्टी की तरफ से कुछ नहीं बोल सकते। हालांकि, वह व्यक्तिगत रूप से समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का समर्थन करते हैं।
समलैंगिक संबंध पर इन देशों में मिलता है 'मृत्युदंड'?
2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर के 72 देशों में समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। समान लिंग संबंधों को इन देशों में 'प्रकृति के खिलाफ' माना जाता है। वहीं इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन (आईएलजीए) के मुताबिक आठ ऐसे देश हैं जहां समलैंगिकता पर मौत की सजा होती है। इन देशों में ईरान, सूडान, सऊदी अरब, यमन, सोमालिया, नाइजीरिया, इराक और सीरिया शामिल हैं।
32 देशों में मिली समलैंगिक विवाह को मान्यता
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समलैंगिक विवाह को लेकर दुनिया में तकरीबन 32 ऐसे देश ऐसे हैं, जहां इसे कानूनी रूप से मान्यता मिल चुकी है। इन देशों में नीदरलैंड्स (2001), बेल्जियम (2003), कनाडा (2005), स्पेन (2005), दक्षिण अफ्रीका (2006), नॉर्वे (2009), स्वीडन (2009), आइसलैंड (2010), फिनलैंड (2010), अर्जेंटीना (2010), मेक्सिको (2010), पुर्तगाल (2010), डेनमार्क (2012), ब्राजील (2013), फ्रांस (2013), न्यूज़ीलैंड (2013), उरुग्वे (2013), आयरलैंड (2015), लक्समबर्ग (2015), कोलंबिया (2016), जर्मनी (2017), माल्टा (2017), ऑस्ट्रेलिया (2017), ऑस्ट्रिया (2019), ताइवान (2019), इक्वाडोर (2019), कोस्टा रिका (2020), यूनाइटेड किंगडम (2020), चिली (2022), स्लोवेनिया (2022), स्विट्ज़रलैंड (2022), संयुक्त राज्य अमेरिका (2022) शामिल हैं।
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