MS Golwalkar: बीएचयू के विद्यार्थियों ने रखा था अपने प्रतिभाशाली शिक्षक माधवराव गोलवलकर का नाम 'गुरुजी'

एमएससी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद गोलवलकर प्राणि-शास्त्र विषय में मत्स्य जीवन पर शोध कार्य हेतु मद्रास (चेन्नई) के मत्स्यालय से जुड़ गये। परंतु इसके एक वर्ष के दौरान ही इनके पिता सेवानिवृत्त हो गये।

माधवराव गोलवलकर

MS Golwalkar: माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर 'श्री गुरूजी' का जन्म 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। माधवराव के पिता का नाम सदाशिवराव भाऊ एवं माता का लक्ष्मीबाई ताई था। माधवराव ने 1924 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। दो साल बाद यानि 1926 में बीएससी और 1928 में एमएससी की परीक्षाएं प्राणि-शास्त्र विषय में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण की।

एमएससी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद गोलवलकर प्राणि-शास्त्र विषय में मत्स्य जीवन पर शोध कार्य हेतु मद्रास (चेन्नई) के मत्स्यालय से जुड़ गये। परंतु इसके एक वर्ष के दौरान ही इनके पिता सेवानिवृत्त हो गये, जिसके कारण वह माधवराव को पैसा भेजने में असमर्थ हो गए। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़कर अप्रैल 1929 में वापस लौटना पड़ा।

ऐसे पड़ा गुरुजी उपनाम
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से माधवराव गोलवलकर को निदर्शक पद पर सेवा करने का प्रस्ताव मिला। 16 अगस्त 1931 को माधवराव ने विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में निदर्शक का पद संभाल लिया। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें बीए की कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का अवसर दिया। शिक्षक के रूप में माधवराव गोलवलकर अपनी प्रतिभा और योग्यता से छात्रों में इतने अधिक लोकप्रिय हो गये कि उनके छात्र उनको 'गुरुजी' के नाम से ही सम्बोधित करने लगे।

संघ में ऐसे हुआ प्रवेश माधवराव गोलवलकर का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संपर्क बनारस में हुआ। उस दौरान भैयाजी दाणी तथा नानाजी व्यास ने बनारस में संघ की शाखा प्रारंभ की थी। जब 1931 में माधवराव ने विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया तो उनकी लोकप्रियता के कारण भैयाजी दाणी ने संघ-कार्य एवं संगठन के लिए उनसे संपर्क किया। संघ के स्वयंसेवक अध्ययन में माधवराव की मदद लेते और उनके भाषणों का आयोजन भी करते थे। संघ के विस्तार हेतु करीब 30 स्वयंसेवक शिक्षा प्राप्ति हेतु वाराणसी पहुंचे। इन सब विद्यार्थियों का माधवराव से सम्पर्क था।

माधवराव गोलवलकर ने 1942 में पूना में प्रांतीय बैठक में संघ में अपने प्रवेश पर कहा था कि, "मैं तो रहा यहां-वहां घूमने वाला। फिर भी पता नहीं मुझ पर कैसे संस्कार हो गया। इस तथ्य को या तो भगवान ही जानता है या संस्कार डालने वाला। एक बार भूल से डाक्टर जी का भाषण सुनने बैठ गया। मुझे अपनी बुद्धि पर बड़ा घमण्ड था, उस भाषण में न तो कोई तर्क था, न कोई इतिहास का हवाला।

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    न दर्शन था, न कोई बड़ा सिद्धांत। परन्तु डाक्टर जी के भाषण में हार्दिकता थी। मैं नहीं कह सकता कि कैसे उनका भाषण मेरे अन्त:करण में उतरता चला गया। बीच-बीच में उनसे भेंट-मुलाकात होती रही। डाक्टर जी ने मेरे अभिमान को झकझोर दिया।"

    जब संघ का दायित्व संभालने को बोल गए डॉ. हेडगेवार
    20 जून 1940 को सुभाष चन्द्र बोस नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार से मिलने आये थे। तब डॉक्टर साहब के जीवन की आशा लगभग समाप्त हो चुकी थी। उसी दिन डॉक्टर हेडगेवार चिकित्सकों से थोड़ा समय मांगकर विचारमग्न हो गए। फिर माधवराव गोलवलकर को बुलाकर संघ के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के सामने बोले, आगे संघ का सम्पूर्ण कार्य आप संभालिये। 21 जून, 1940 को डॉक्टर हेडगेवार के निधन के तेरहवें दिन रेशिम बाग, नागपुर में उन्हें श्रद्धांजलि समर्पित की गई। नागपुर प्रान्त संघचालक ने नए सरसंघचालक की घोषणा की। उन्होंने कहा, "डॉक्टर हेडगेवार की इच्छा के अनुसार श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर 'श्री गुरूजी' अब अपने सरसंघचालक हो गए हैं।

    33 वर्षों तक संभाला कार्यभार
    गुरु गोलवलकर ने सरसंघचालक का दायित्व 5 जून 1973 तक अर्थात लगभग 33 वर्षों तक संभाला। संघ को देश भर में स्थापित करने के लिए गुरूजी का सम्पूर्ण देश में प्रवास होता था। वे साल 1943 में - अप्रैल में अहमदाबाद, मई में अमरावती एवं पुणे, जून में नासिक एवं बनारस, अगस्त में चंद्रपुर, सितम्बर में फिर से पुणे, अक्तूबर में मद्रास एवं मध्य प्रान्त और नवम्बर में लाहौर एवं रावलपिंडी के प्रवास पर थे। अप्रैल 1943 में पुणे में 2,000 स्वयंसेवकों ने संघ शिक्षा वर्ग के माध्यम से प्रशिक्षण लिया था। इस वर्ग के अन्तिम सत्र में वीर सावरकर को आमंत्रित किया गया था, इस दिन लगभग 6,000 लोगों की संख्या मौजूद थी।

    पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों पर गुरु गोलवलकर की राय
    पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की सेवा करने हेतु संघ स्वयंसेवकों का आव्हान करते हुए गुरु गोलवलकर ने एक वक्तव्य में कहा था कि "विभाजन के पश्चात पूर्वी पाकिस्तान के निवासी लाखों हिंदू बन्धुओं को अकथनीय विपत्ति झेलनी पड़ रही है। विगत कुछ महीनों में वहां पर अत्याचारों का तांता और भी तीव्र हो गया है। पूर्वी बंगाल के सभी भागों में लूट, अग्निकांड, अपहरण और बलात् धर्मान्तरण तो सामान्य बात हो गयी है, जिसने वहाँ के हिन्दुओं के लिए सम्मानपूर्वक जीना दूभर बना दिया है। इतना ही नहीं, परिवहन की असुरक्षा पूर्ण अवस्था के कारण पाकिस्तान की सीमा पार करके हमारी सरकार की शरण में आना भी कठिन हो गया है। फिर भी वहाँ की नारकीय यातनाओं से बचने के लिए हजारों हिन्दु अनेक विपत्तियाँ झेलते हुए भारत की ओर आ रहे हैं। निश्चय ही हमारा यह कर्तव्य है कि हम पाकिस्तान में हिन्दुओं को पूर्ण सुरक्षा देने के अपने दायित्व को पूरा करने के लिए भारत सरकार से प्रभावी निवेदन करें और यह भी हमारा कर्तव्य है कि इस सम्बन्ध में तुरन्त अपेक्षित पग उठाने के कार्य में हम सरकार को पूर्ण सहयोग दें। परन्तु उन लाखों सताये हुए और बेघर भाई-बहिनों को, जो यहां आ रहे हैं, प्रेम और आत्मीयता से अपनाना अत्यन्त आवश्यक है।"

    महात्मा गांधी की हत्या पर गुरु गोलवलकर ने कही थी ये बात
    गुरु गोलवलकर ने गांधीजी की हत्या होने पर अपने बयान में कहा कि, "यह एक ऐसा अपवादजनक बर्बरतापूर्ण कार्य हुआ है, जिसके फलस्वरूप आज के युग का सबसे अधिक श्रद्धास्पद और प्रिय व्यक्तित्व संसार से विदा हो गया है। इसलिये मैं सार्वजनिक वक्तव्य न देने के अपने संयम को तोड़ना अपना कर्त्तव्य समझता हूं, और उन संत्रास और संताप के विचारों को प्रकाशित करता हूँ, जिनकी मेरे मस्तिष्क में उत्पत्ति इस समाचार ने की है। यह अतुलनीय परिमाण वाली एक दारुण विपत्ति है। इस कठिन काल में देश को एक महान संगठन एवं शान्तिदूत की आवश्यकता थी। महात्मा जी के रूप में वह आत्मा देश को उपलब्ध थी। उनकी मृत्यु एक अक्षम्य राष्ट्रीय अपराध है। रोष की भावना से हम क्षति का शोक मनाते हैं और भविष्य की ओर देखते हैं।"

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