Maulana Azad: मौलाना आजाद ने 1946 में ही कर दी थी पाकिस्तान की बर्बादी की भविष्यवाणी
मौलाना अबुल कलाम, आजादी के बाद देश के पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री थे। मौलाना आजाद कवि, लेखक, पत्रकार और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे।

Maulana Azad: मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का में हुआ था। उनके पूर्वज मुगल बादशाह बाबर के जमाने में अफगानिस्तान के हेरात से भारत आ गए थे। मौलाना आजाद की मां अरब के एक शेख मोहम्मद वत्री की बेटी थी और पिता मौलाना खैरुद्दीन अफगान मूल के एक मुसलमान थे, जो बंगाल में बस गए थे। मौलाना आजाद के पिता खैरुद्दीन ने 1857 के महासंग्राम के दौरान भारत छोड़ दिया था और मक्का में जाकर बस गए। हालांकि, 1890 में वे अपने परिवार के साथ कलकत्ता वापस आ गए। मौलाना अबुल कलाम आजाद का असली नाम अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन था।
मौलाना आजाद ने पहले अरबी और फारसी सीखी और उसके बाद दर्शनशास्त्र और गणित की पढ़ाई की। मौलाना आजाद बड़े प्रभावशाली वक्ता और उर्दू भाषा के उच्च कोटि के लेखक थे। उनकी पुस्तकें उर्दू गद्य में आदर्श मानी जाती हैं। 22 फरवरी 1958 को मौलना आजाद का निधन हो गया।
पाकिस्तान की बर्बादी की भविष्यवाणी
मौलाना आजाद भारत के बंटवारे के खिलाफ थे। 1946 में जब बंटवारे की तस्वीर काफी हद तक साफ होने लगी और बंटवारे पर सहमति बन गयी, तब उन्होंने कहा था कि नफरत की नींव पर तैयार हो रहा यह नया देश तभी तक जिंदा रहेगा जब तक यह नफरत जिंदा रहेगी। जब बंटवारे की यह आग ठंडी पड़ने लगेगी तो यह नया देश भी अलग-अलग टुकड़ों में बंटने लगेगा। मौलाना आजाद जो दृश्य 1946 में देख लिया था, वह पाकिस्तान बनने के कुछ सालों बाद ही 1971 में सच साबित हो गया। तब एक नया देश बांग्लादेश बना। मौलाना आजाद ने पाकिस्तान बनने से पहले ही कह दिया था कि यह देश एकजुट होकर नहीं रह पाएगा। यहां राजनीतिक नेतृत्व की जगह सेना का शासन चलेगा, यह देश भारी कर्ज़ के बोझ तले दबा रहेगा। पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के हालातों का सामना करेगा।
नेहरू ने अपनी किताब में की थी तारीफ
जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में मौलाना अबुल कलाम आजाद के बारे में काफी विस्तार से लिखा है। इस किताब को लिखने के दौरान मौलाना आजाद भी नेहरू के ही साथ अहमदनगर किले में कैद थे। नेहरू ने मौलाना आजाद के बारे में लिखा था कि 'हिंदुस्तान के मुसलमानी दिमाग की तरक्की में साल 1912 भी एक खास साल है क्योंकि उसमें दो नए साप्ताहिक निकलने शुरू हुए थे। उनमें से एक तो 'अल-हिलाल' था, जो उर्दू में था और दूसरा अंग्रेज़ी में 'दि कॉमरेड' था।
'अल-हिलाल' को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने चलाया था। नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में आगे लिखा कि 'मौलाना आजाद का नजरिया बुद्धिवादी था और साथ ही इस्लामी साहित्य और इतिहास की उन्हें पूरी जानकारी थी।
दो बार रहे कांग्रेस के अध्यक्ष
मौलाना आजाद ने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से राजनैतिक यात्रा शुरू की। उन्हें दिल्ली में कांग्रेस के विशेष सत्र (1923) के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। 35 वर्ष की आयु में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुने गए सबसे कम उम्र के व्यक्ति बन गए। मौलाना आजाद को महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के हिस्से के रूप में नमक कानूनों के उल्लंघन के लिए 1930 में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें डेढ़ साल तक मेरठ जेल में रखा गया था। अपनी रिहाई के बाद, वे 1940 (रामगढ़) में फिर से कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1946 तक इस पद पर बने रहे।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
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भारत के पहले शिक्षा मंत्री के नाते उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना जैसे कार्य किये। केन्द्रीय सलाहकार शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष होने के नाते मौलाना आजाद ने सरकार से केन्द्र और राज्यों दोनों के अतिरिक्त विश्वविद्यालयों में सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा, 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, कन्याओं की शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, कृषि शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसे सुधारों की वकालत की। 1956 में उन्होंने अनुदानों के वितरण और भारतीय विश्वविद्यालयों में मानकों के अनुरक्षण के लिए संसद के एक अधिनियम के द्वारा 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' (यूजीसी) की स्थापना की। मौलाना आजाद को ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की स्थापना का श्रेय जाता है।
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