मथुरा हिंसा: राजनीति की 'शह' में व्यवस्थाओं की 'मात'
जनता का मानना है सूबे की सरकार से जुड़े हुए झंडाधारी नुमाइंदों के जहन से उठ चुके डर की तस्वीरें आप-हम आमतौर पर देखते हैं। ये काफी हद तक सही भी नजर आया। चलिए कुछ उदाहरण ही गिन लेते हैं। हालांकि इसमें पहला दूसरा स्थान किसी के लिए निर्धारित नहीं है। जिसकी वाजिब वजह भी है।
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झंडाबरदारों के गुनाहों की फेहरिस्त कुछ इतनी लंंबी है कि मूल्यांकन करना संभव नहीं है। जाति बनाम व्यवस्था का सवाल इसलिए भी क्योंकि मथुरा हिंसा में मारे गए एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी के जब लोग समर्थन में उतरे, तरह-तरह से मूल्यांकन करना शुरू किया तो सरकार को मजबूरन कीमत बदलनी पड़ी।
राजनीति कीजिए साहब, बंटवारा नहीं
गाजीपुर के दुल्लहपुर क्षेत्र में वर्ष 2013 में सपा का झंडा लगाकर लग्जरी गाड़ी से आये कुछ युवकों ने सरेराह युवती की पिटाई की थी। हालांकि जब कुछ लोग मदद की खातिर घेराबंदी करने लगे तो युवक गाड़ी छोड़कर भाग निकले। ऐसे ही कई अन्य मामले भी हैं। जिसमें प्रमुखतया सूबे में वोटों की राजनीति में ज्यादातर समाजवादी पार्टी के हिस्सेदार रहे या कहें बड़ा प्रतिशत माने जाने वाले लोगों को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया गया।
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दरअसल ये जनता का मानना है। सवर्ण हो या फिर दलित दोनों का ही कहना है कि सूबे में सपा सरकार आने के साथ यादवों एवं अल्पसंख्यकों का बोलबाला हो जाता है जबकि अन्य जातियों को दबाने की कोशिश की जाती है। इस बात की पुष्टि के लिए तमाम सबूत हैं।
उदाहरण के तौर पर समाजवादी सरकार में नगर विकास मंत्री आजम खान के तीखे बयानों पर ही गौर कर लीजिए। फिर वो चाहे कारगिल युद्ध को जाति विशेष का जामा पहनाकर सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई या फिर अन्य उदाहरण के तौर पर मुसलमानों की कथित फिक्र का राग अलापने वाले आजम का कोई दूसरा बयान भी सुन लीजिए।
उठने लगे सवाल
सोशल मीडिया पर प्रतापगढ़ में मारे गए डीएसपी जियाउल हक और उनको दिया गया मुआवजा, दादरी में मारे गए अखलाक के परिवार को दिए गए मुआवजे और फ्लैट आदि एवं हाल ही में मथुरा में हुई हिंसा में मारे गए एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी को दिए जा रहे मुआवजे के अंतर को देख कयास लगाना शुरू कर दिया गया। फलस्वरूप ऐलान बदला, और नई दिशा में नई राजनीति शुरू की गई।
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हां यह कहना भी गलत नहीं है कि सूबे की सरकार में व्यव्स्थाओं पर रूतबा भारी दिखता है। काम-काज पहचान के आधार पर होती है। जबकि यह दशा बसपा के साथ भी है। तब माना जाता है दलितों के लिए हरिजन एक्ट जीवित हो उठता है, फिर तो जी भर के डराओ। इस पूरी श्रंखला में सवर्ण के लिए कोई विकल्प नहीं रखा गया है।
इतना मैं जरूर कहूंगा कि मेरे कहने का आशय ये बिलकुल भी नहीं कि विवाद उत्तपन्न हो और सवर्ण भी कानून का दुरूपयोग करें। महज इतना कहना चाहता हूं कि कानून एक हो। सभी मजहबों के लिए। जहां पर कम ज्यादा किया जाएगा वहां टकराव की स्थिति उत्तपन्न होना तो लाजमी है।
हिमायत किसी खास तक क्यों?
बहरहाल यदि जिक्र किया जा रहा है जवाहर बाग का तो मथुरा के सबसे बड़े बाग के तौर पर यह जाना जाता है। इसके आखिरी हिस्से में मथुरा कलेक्ट्रेट परिसर के करीब तहसील भवन से शुरू होती है। आपको बताते चलें कि इस बाग का नाम भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम पर है।
बाग के बाहर जवाहर लाल नेहरू की एक मूर्ति भी लगी है। स्थानीय बाशिंदों का तो ये भी कहना है कि यह बाग अंग्रेजी हुकूमत के दौरान का है। यहां पर ढेर सारे पेड़ थे। जिसमें से कई सूखकर खत्म हो गए। तो कुछ काट दिए गए। रामवृक्ष यादव को तत्कालीन जिलाधिकारी ने 2014 में भीड़ कम हो आदि बातों को संज्ञान में लेते हुए धरना प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी थी। लेकिन वो मौका था उस जमीन के विवाद के शुरू होने का।
कब्जा कर लिया गया, ट्यूबवेल पर भी हक जमा लिया गया। और पेड़ों को जमकर काटा गया। लेकिन हाल ही में हुई हिंसा के बाद जवाहर बाग कब्रिस्तान सरीखे हो गया। एकदम शांत सा। खत्म सा। और इस बार भी जो नाम सामने खुलकर आ रहा है उसे भी लोग जाति की वजह से हिंसा का कारण मानने लगे हैं।
जरूरत है इस तरह की बातों को मिटाने के लिए, न्याय को एक समान रखने के लिए एक बेहतर पहल करने की। लोगों के मन में विश्वास जगाने की। अन्यथा कभी भी किसी को भी कोई भी विलेन का किरदार थमा सकता है।











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