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Maritime Borders: बहुत मुश्किल है दो देशों की समुद्री सीमा को तय करना, परिणाम भुगतते है मछुआरें

जमीन पर दो देशों के बीच सीमाएं बनाना आसान है, जहां बाउंड्री वॉल, फेंसिंग इत्यादि की जा सकती है। मगर समुद्र में सीमाओं को कैसे तय किया जाता है? जहां न कोई वॉल बन सकती है और न ही फेंसिंग।

Maritime Borders in india fishermen trouble arrested by other countries

Maritime Borders: हाल ही में, गुजरात विधानसभा में राज्य सरकार ने बताया कि गुजरात के 560 मछुआरे पाकिस्तानी जेलों में कैद हैं। इन गिरफ्तार मछुआरों में लगभग 49 प्रतिशत को पिछले 2 सालों में गिरफ्तार किया गया है। वैसे सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि भारत की जिन देशों से समुद्री सीमा लगती है वहां रहने वाले कई मछुआरे दूसरे देशों की जेलों में कैद हैं।

दरअसल, वे हर सामान्य दिन की तरह अपने घरों से मछली पकड़ने बीच समुद्र में जाते हैं लेकिन एक छोटी से भूल उन्हें पाकिस्तान और श्रीलंका की जेलों में सड़ने के लिए मजबूर कर देती है। हालांकि अधिकतर मामलों में उनकी कोई गलती नहीं होती क्योंकि उन्हें अंदाजा ही नहीं रहता है कि वे कब भारत की समुद्री सीमा को पारकर दूसरे देश की समुद्री सीमा में दाखिल हो गए हैं।

किन देशों में कैद हैं भारतीय मछुआरे

भारत विदेश मंत्रालय के अनुसार एक जनवरी 2023 तक 654 भारतीय मछुआरों को पाकिस्तान ने हिरासत में लिया हुआ है। जबकि भारत की कस्टडी में 95 मछुआरें हैं। दोनों देश कई बार इन मछुआरों की रिहाई के लिए एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं लेकिन तबतक और मछुआरे जेलों में कैद हो जाते हैं। भारत सरकार का कहना है कि 2014 से अभी तक कुल 2,160 भारतीय मछुआरों और 57 भारतीय मछली पकड़ने वाली नौकाओं को पाकिस्तान से भारत वापस लाया जा चुका है।

दिसंबर 2022 के भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक पिछले पांच सालों में कुल 3,936 भारतीय मछुआरें विदेशों में कैद हैं। इन मछुआरों की कुल 468 नावें भी उन देशों ने जब्त की हुई हैं। विदेश मंत्रालय का कहना है कि 2017 से 2022 तक श्रीलंका ने तमिलनाडु के 1,223 मछुआरों को गिरफ्तार किया हुआ है।

मछुआरे कैसे पहुंच जाते है जेलों में

मछली पकड़ने के दौरान कई बार मछुआरे बीच समुद्र में रास्ता भटक जाते हैं। अधिकतर मछुआरों को नेविगेशन स्किल्स में योग्यता नहीं होती। यही एक बड़ा कारण है उनके रास्ता भटककर दूसरे देशों की समुद्री सीमा अथवा नो मैन्स लैंड में पहुंच जाने का। इसके अलावा, समुद्र में मौसम भी अचानक से खराब हो जाता है या तेजी से बदल सकता है। इसलिए अगर मछुआरे तूफान या अन्य खतरनाक मौसम की स्थिति का सामना करते हैं तो वे उस स्थिति में भी अपना रास्ता खो देते हैं। तीसरा, मछली पकड़ने वाली नौकाओं और उपकरण में खराबी भी मछुआरों को बीच समुद्र में फंसने और सीमा लांघने के लिए मजबूर करती है।

देशों की सीमा का निर्धारण

समुद्रों अथवा महासागरों में दो देशों की सीमाओं को इंटरनेशनल मैरीटाइम बाउंड्री लाइन (IMBL) कहा जाता है। इस मैरीटाइम बाउंड्री लाइन को एक अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा निर्धारित किया गया है। इस कानून को 'यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी' (यूएनसीएलओएस) के नाम से जाना जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे साल 1982 में अपनाया और 1994 में लागू किया गया। यूएनसीएलओएस के अंतर्गत तीन प्रमुख अवयव होते हैं - प्रादेशिक समुद्र, सन्निहित क्षेत्र और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन अर्थात ईईजेड)।

प्रादेशिक समुद्र का मतलब है कि किसी देश के समुद्र तट से 12 समुद्री मील (22.2 किलोमीटर) तक फैला हुआ क्षेत्र। सन्निहित क्षेत्र किसी देश के समुद्री तट से 24 समुद्री मील तक फैला हुआ होता है। जबकि ईईजेड, किसी देश के समुद्र तट से 200 समुद्री मील (370.4 किलोमीटर) तक फैला हुआ होता है।

साधारण शब्दों में समझें तो भारत के किसी भी समुद्री छोर से लगभग 370.4 किलोमीटर का क्षेत्र भारत के अधिकार में आयेगा। उसी प्रकार पाकिस्तान के किसी भी समुद्री छोर से लगभग 370.4 किलोमीटर का क्षेत्र पाकिस्तान के अधिकार में आयेगा। इसके बाद भी दोनों देशों के आखिरी ईईजेड क्षेत्रों के बाद भी अंतर रहता है उसे 'नो मैन्स लैंड' कहा जाता है।

नो मैन्स लैंड क्या होता है

यूएनसीएलओएस के अनुसार, नो मैन्स लैंड पर किसी भी देश का अधिकार नहीं है। इस इलाके में मछुआरों को जाने की अनुमति नहीं होती। इसलिए कई देशों ने मछुआरों पर नो मैंस लैंड में मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है।

कानून के अनुसार, अगर सम्बंधित दोनों देशों को कोई आपत्ति न हो तो इस नो मैन्स लैंड में मछली पकड़ने सहित प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा सकता है। बशर्ते दोनों देशों में इसके लिए आपसी सहमति हो।

समुद्री सीमाएं अगर ओवरलैप करें तो?

अब जैसे भारत और श्रीलंका के बीच समुदी सीमा 54.8 किलोमीटर की है। जबकि कानून के मुताबिक 370.4 किलोमीटर तक का इलाका किसी भी देश की सीमा के अंतर्गत आता है। इस ओवरलैप का समाधान वास्तव में यूएनसीएलओएस के पास नहीं है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस ओवरलैप के समाधान की जिम्मेदारी दोनों देशों पर डाली हुई है।

कानून के अनुसार दो देशों की समुद्री सीमाएं ओवरलैप होना सामान्य बात है। इससे जल के स्वामित्व और नियंत्रण जैसे विवाद पैदा होते हैं। यूएनसीएलओएस का कहना है कि पहले दोनों देश आपसी बातचीत से समाधान खोज सकते है। इस प्रक्रिया में समाधान न मिले तो वे इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) और इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल फॉर लॉ ऑफ द सी (आईटीएलओएस) का रुख कर सकते है जो इस तरह के विवादों को सुलझाने में सहायक हो सकते हैं।

यूएनसीएलओएस ऐसे मामलों को सुलझाने का एक और विकल्प भी देता है। इसके अंतर्गत यूएनसीएलओएस द्वारा स्वतंत्र न्यायाधीशों का एक पैनल बनाया जाता है जोकि विवादित पक्षों के तर्कों पर विचार कर समुद्री सीमा पर अपना फैसला सुनाता है।

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