मंगल पांडे: वो वीर जिसने कहा गुलामी की सांस से अच्छा आजादी का कफन है....

नई दिल्ली। महान क्रांतिकारी मंगल पांडे भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत थे। मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 को बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। अपनी भारत माता को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के लिए संघर्ष करने वाले इस वीर से तो एक बार अंग्रेज शासन भी बुरी तरह से कांप गया था और सही मायने में देश में आजादी का बिगुल मंगल पांडे ने ही फूंका था, उनके बलिदान को ये देश कभी नहीं भूला सकता है।

आइए जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें...........

 जन्म 19 जुलाई, 1827

जन्म 19 जुलाई, 1827

अंग्रेजों के आदेश को मानने से किया इंकार...

अंग्रेजों के आदेश को मानने से किया इंकार...

1857 में सिपाहियों को नई बंदूक दी गई थी जिसे भरने के लिए कारतूस को दांत से काटकर खोलना पड़ता था। भारतीय सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है। उनके मन में ये बात घर कर गयी कि अंग्रेज हिन्दुस्तानियों का धर्म भ्रष्ट करने पर अमादा हैं, बस यहीं से विद्रोह का बिगुल बजा।

अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन की हत्या

अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन की हत्या

9 फरवरी 1857 को जब 'नया कारतूस' देशी पैदल सेना को बांटा गया तब मंगल पांडे ने उसे लेने से मना कर दिया जिस पर गुस्साए अंग्रेजों ने उनके हथियार छीन लिये जाने और वर्दी उतारने का हुक्म दिया। मंगल पांडे ने उस आदेश को मानने से मना कर दिया और उन्होंने कहा कि मेरे लिए गुलामी की सांस से अच्छा आजादी का कफन है, जिस पर गुस्साए अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन मंगल को मारने के लिए आगे बढ़े तो मंगल ने उस पर आक्रमण कर दिया।

8 अप्रैल सन् 1857 को फांसी पर लटका दिया गया

8 अप्रैल सन् 1857 को फांसी पर लटका दिया गया

मंगल पांडे ने मदद के लिए साथियों की ओर देखा लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की लेकिन मंगल पांडे ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया। ह्यूसन को मारने के बाद मंगल पांडे ने एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेन्ट बॉब को भी मार गिराया और उसके बाद मंगल पांडे को अंग्रेजों ने पकड़ लिया, उन पर कोर्ट मार्शल का केस चला, जिसके तहत उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी, पर ब्रिटिश सरकार ने मंगल को निर्धारित तिथि से दस दिन पहले ही 8 अप्रैल सन् 1857 को फांसी पर लटका दिया।

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