Jammu Kasmir में मिला 59 लाख टन लिथियम का भंडार, इलेक्ट्रिक व्हीकल की बैट्री में होता है इस्तेमाल
Lithium Reserves In India: भारत में पहली बार जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में 5.9 मिलियन टन लिथियम का भंडार मिला है। इसका उपयोग इलेक्ट्रिक व्हीकल के अलावा मोबाइल, लैपटॉप की बैट्री में भी किया जाता है।

Lithium Reserves In India: लिथियम से जुड़ी एक अच्छी खबर सामने आई है। देश में पहली बार लिथियम का बड़ा भंडार मिला है। यह भंडार जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में मिला है। 59 लाख टन लिथियम के भंडार की यह पहली साइट है, जिसकी पहचान भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने रियासी जिले के सलाल-हैमाना इलाके में करीब की है। आपको बता दें कि लिथियम का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल के लिए रिचार्बेल बैट्री के अलावा मोबाइल, लैपटॉप की बैट्री में भी किया जाता है।
बता दें, लिथियम को आयात दूसरे देशों से किया जाता था। लेकिन, अब जम्मू कश्मीर में लिथियम का भंडार मिलने के बाद आयात पर निर्भरता कम होगी। दरअसल, 09 फरवरी को खनन मंत्रालय ने कहा, 'जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को पहली बार जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में सलाल-हैमाना में 59 लाख टन लिथियम इन्फर्ड रिसोर्सेज (G3) मिले हैं।' सरकार ने जानकारी देते हुए बताया है कि लिथियम और गोल्ड सहित 51 खनिज ब्लॉक राज्य सरकारों को सौंप गए हैं।
इन 51 खनिज ब्लॉकों में से 5 ब्लॉक सोने से संबंधित हैं। अन्य ब्लॉक जम्मू कश्मीर, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक के 11 राज्यों में फैले हैं, जो पोटाश, मोलिब्डेनस, बेस मेटल आदि जैसी वस्तुओं से संबंधित हैं। इनके अलावा 7897 मिलियन टन के कोयला और लिगनाइट की 17 रिपोर्ट्स को कोयला मंत्रालय को दिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जम्मू कश्मीर में मिला लिथियम एक अलौह धातु है जो मोबाइल, लैपटॉप, डिजिटल कैमरा और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए रिचार्बेल बैट्री में उपयोग किया जाता है।
इसके अलावा लिथियम का उपयोग खिलौनों और घड़ियों के लिए भी किया जाता है। आपको बता दें कि अभी तक भारत लिथियम के लिए पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर था। लेकिन अब जम्मू कश्मीर में लिथियन का भंडार मिलने से आयात पर निर्भरता कम होगी। बता दें, वर्तमान में चीन और ऑस्ट्रेलिया दुनियाभर में लिथियम के बड़े सप्लायर हैं। अपने विशाल लिथियम भंडार के चलते ये अपनी मनमानी भी करते हैं। लेकिन, अब भारत में भी लिथियम भंडार का पता चलने के बाद इनकी बादशाहत पर असर पड़ना तय है।
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भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की शुरूआत साल 1851 में रेलवे की मदद के लिए जमा कोयला खोजने के लिए हुई थी। हालांकि, 200 सालों से ज्यादा की यात्रा के दौरान GSI जियो साइंस के मामले में अहम भूमिका निभा रहा है। साथ ही, जियो साइंटिफिक ऑर्गेनाइजेशन होने का दर्ज भी प्राप्त कर चुका है।












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