Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Religious Processions: सड़कों पर धार्मिक आयोजन और धार्मिक स्वतंत्रता पर क्या कहता है संविधान?

Religious Processions: सड़कों पर धार्मिक आयोजनों के बारे में संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं। लेकिन लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य सेवाओं के आधार पर सरकार द्वारा इन आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने का उल्लेख जरूर है।

law in constitution for Religious Processions rallies in india

Religious Processions: बीते दिनों उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने ईद उल-फितर, अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती जैसे त्योहारों को देखते हुए एक आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि आगामी त्योहारों के दौरान सड़कों पर किसी भी तरह के धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस संबंध में उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद और विशेष पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने संबंधित अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी किए थे।

इन दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि फील्ड के सभी अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि धार्मिक कार्यक्रम घरों में या उनके निर्धारित स्थान पर ही आयोजित किए जाएं और किसी भी व्यक्ति को सड़कों को अवरुद्ध करने की अनुमति न दी जाए। किसी भी परिस्थिति में सड़क और यातायात को बाधित कर कोई धार्मिक आयोजन नहीं होना चाहिए।

पिछले वर्ष भी अक्षय तृतीया और ईद उल-फितर के मौके पर योगी सरकार ने यह आदेश जारी किया था कि कोई भी शोभायात्रा या धार्मिक जुलूस बिना विधिवत अनुमति के न निकाली जाए। अनुमति देने से पूर्व आयोजकों से शांति-सौहार्द कायम रखने के संबंध में शपथ पत्र लिया जाए। इसके अतिरिक्त केवल उन्हीं धार्मिक जुलूसों को अनुमति दी जाए, जो पारंपरिक हों और नए आयोजन को अनावश्यक अनुमति न दी जाए।

बीते दिनों त्योहारों पर हुई हिंसा

बीते कुछ सालों से हनुमान जन्मोत्सव सहित राम नवमी पर शोभायात्राएं निकालने पर हिंदुओं एवं मुसलमानों के बीच झड़प और हिंसा देखने को मिली है। इसी को देखते हुए योगी सरकार ने एहितायतन इन दिशा-निर्देशों को जारी किया था, ताकि प्रदेश में कोई अप्रिय घटना न हो। एक ओर जहां देश के कई राज्यों में धार्मिक शोभायात्राओं के दौरान हिंसा की खबरें आती रहती हैं, वहीं योगी सरकार के इन दिशा-निर्देशों के कारण उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में शांति व्यवस्था आमतौर पर बनी रहती है।

रामनवमी की शोभायात्रा पर पथराव

इस साल रामनवमी की शोभायात्रा के दौरान कई राज्यों में हिंसा हुई। पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना में रामनवमी की शोभायात्रा पर पथराव किया गया। पश्चिम बंगाल के दो जिलों हावड़ा और हुबली में हिंसा इतनी बढ़ी कि कई दुकानों और मकानों में तोड़-फोड़ की गई और उन्हें आग के हवाले कर दिया गया।

इसी तरह से साल 2022 के रामनवमी और हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर भी देश के कई हिस्सों में आगजनी और पथराव किया गया। दिल्ली की जहांगीर पुरी में हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर जबरदस्त हिंसा की गई और पथराव हुआ। इस हिंसा में आम लोगों के साथ-साथ कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गए। मध्य प्रदेश के खरगौन जिले में भी रामनवमी जुलूस पर पथराव किया गया। हिंसा इतनी बढ़ी कि कई दुकानों और मकानों को आग के हवाले कर दिया गया। हिंसा करने वाले कई लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार भी किया गया था।

दूसरी ओर, देश के कई हिस्सों से सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर नमाज पढ़ने के वीडियो और खबरें आती ही रहती हैं। साल 2021 में हरियाणा के गुरुग्राम में सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने की घटनाएं देश और दुनिया की सुर्खियां बनीं। इस विवाद पर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने विधानसभा में बयान दिया था कि किसी भी समुदाय के किसी भी नागरिक को सार्वजनिक स्थान पर धार्मिक प्रार्थना नहीं करनी चाहिए।

धार्मिक आयोजनों पर क्या कहता है संविधान?

सड़कों पर धार्मिक आयोजनों के बारे में संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। लेकिन लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य सेवाओं के आधार पर सरकार द्वारा इन आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने का उल्लेख जरूर है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने का अधिकार है। धार्मिक स्वतंत्रता में अंतःकरण की स्वतंत्रता भी समाहित है, जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का चुनाव अपनी इच्छा से कर सकता है। यहां तक कि संविधान में किसी भी धर्म का पालन न करने की भी स्पष्ट छूट है।

धार्मिक स्वतंत्रता का यह भी अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को अपने धर्म को अबाध रूप से मानने, उसके अनुसार आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। कुछ सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए सरकार धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है। उदाहरण के तौर पर सरकार ने सती प्रथा, एक से अधिक विवाह और मनुष्यों की बलि जैसी कुप्रथाओं पर प्रतिबंध के लिए अनेक कदम उठाए हैं। ऐसे प्रतिबंधों को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता।

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर नियंत्रण लगाने से विभिन्न धर्म के मानने वालों और सरकार के बीच अक्सर ही तनावपूर्ण स्थिति पैदा होती है। जब भी किसी धार्मिक समुदाय के कुछ क्रियाकलापों पर सरकार नियंत्रण लगाती है, तो उस समुदाय के लोग यह महसूस करते हैं कि वह उनके धर्म में एक हस्तक्षेप है। संविधान ने सभी नागरिकों को अपने धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता दी है। इसमें लोगों को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के लिए मनाने का अधिकार भी शामिल है। लेकिन कुछ लोग धर्म प्रचार की इसी स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल कर जबरन या लालच देकर धर्मांतरण कराते हैं। संविधान भी जबरन धर्मांतरण की इजाजत नहीं देता है। वह हमें केवल अपने धर्म के बारे में सूचनाएं प्रसारित करने का अधिकार देता है।

क्या है भारतीय दंड संहिता (IPC) में प्रावधान?

जबकि आईपीसी के अनुसार अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी भी धार्मिक भीड़, धार्मिक जुलूस या धार्मिक कार्यक्रमों आदि में, जो वैध तरीके से चल रहे हों, में रूकावट डालता है वह व्यक्ति धारा 296 के तहत दोषी होगा। धारा 296 के तहत किये गए अपराध की सुनवाई किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है। दोषी व्यक्ति को एक वर्ष की कारावास या जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+