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आसमान से गिरे एस्टेरॉयड ने किया था परमाणु बम से बड़ा धमाका, जानें World Asteroid Day से जुड़ी बातें

World Asteroid Day: क्षुद्र ग्रह (एस्टेरॉयड) के खतरे को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 30 जून को अंतरराष्ट्रीय क्षुद्र ग्रह (वर्ल्ड एस्टेरॉयड दिवस) दिवस मनाने की घोषणा की थी। इसका मकसद लोगों के बीच क्षुद्र ग्रह को लेकर जागरूकता बढ़ाना और इससे होने वाले खतरे को लेकर युवा पीढ़ी को सतर्क करना है। आज भी कई लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं है कि क्षुद्र ग्रह क्या होता है। इसके गिरने से हमारी दुनिया में क्या हानि हो सकती है।

कैसे हुई शुरुआत

asteroidday.org वेबसाइट के अनुसार, क्षुद्रग्रह दिवस की शुरुआत खगोलशास्त्री एवं रॉक ग्रुप क्वीन के संगीतकार डॉ. ब्रायन, अपोलो 9 के अंतरिक्ष यात्री रस्टी श्वेकार्ट (Rusty Schweickart), फिल्म निर्माता ग्रिग रिक्टर्स और बी612 फाउंडेशन की अध्यक्ष डैनिका रेमी ने मिलकर की थी। उनका उद्देश्य जनता को क्षुद्र ग्रहों के महत्व के बारे में शिक्षित करना था। शुरुआत में 2014 में क्षुद्रग्रह दिवस शिक्षा कार्यक्रम शुरू करने के लिए क्षुद्रग्रह ऑर्गेनाइजेशन के सदस्यों ने एक याचिका का मसौदा तैयार किया। साथ ही सरकारों से क्षुद्रग्रह खोज कार्यक्रमों के वित्तपोषण में तेजी लाने का आह्वान किया। इस याचिका में दुनिया भर के सैकड़ों प्रमुख व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किए थे। इनमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और व्यवसाय के नेता और 125 से अधिक अंतरिक्ष यात्री शामिल थे।

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क्षुद्र ग्रह अर्थात एस्टेरॉयड क्या होते हैं?

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर क्षुद्र ग्रह क्या होते हैं? तो हम आपको बता दें कि तारों, ग्रहों एवं उपग्रहों के अलावा ऐसे असंख्य छोटे छोटे पिंड जो सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। उन्हें क्षुद्र ग्रह कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार क्षुद्र ग्रह, ग्रहों के ही भाग होते हैं, जोकि हजारों वर्ष पहले ग्रहों से टूटकर अलग हो गये थे। एस्टेरॉयड की खोज सबसे पहले 1801 में खगोलशास्त्री गुइसेप पियाजी ने की थी। नासा के सेंटर फॉर एनईओ स्टडीज के अनुसार पृथ्वी के निकट 16,000 से अधिक क्षुद्रग्रह खोजे जा चुके हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्षुद्र ग्रह और उल्कापिंड अलग-अलग होते हैं। उल्कापिंड की परिभाषा को यूं समझें कि सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़ों को उल्कापिंड कहते हैं। कभी-कभी ये उल्कापिंड पृथ्वी के नजदीक आकर पृथ्वी पर गिरने लगते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वायु के साथ घर्षण होने के कारण ये गर्म होकर जल जाते हैं। फलस्वरूप, चमकदार प्रकाश उत्पन्न होता है। कभी-कभी कोई उल्का पूरी तरह जले बिना पृथ्वी पर गिर जाते हैं जिससे धरातल पर गड्ढे बन जाते हैं।

क्‍या है 'तुंगुस्का विस्फोट'

आज के दिवस का संबंध इस घटना से है। दरअसल साइबेरिया में तुंगुस्का नदी के पास 30 जून 1908 में एक बहुत बड़ा विस्फोट हुआ था। उसी घटना को 'तुंगुस्का विस्फोट' कहा जाता है। कहा जाता है कि इस धमाके में इतनी ताकत थी कि धरती कांप उठी थी। जहां धमाका हुआ वहां से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित घरों की खिड़कियों के कांच टूट गए थे। इस धमाके ने करीब 2000 वर्ग मीटर के इलाके को राख में बदल दिया था। इस विस्फोट की वजह से करीब 8 करोड़ पेड़ जल गए थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस धमाके से इतनी ऊर्जा पैदा हुई थी कि यह हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 185 गुना ज्यादा थी।

इसके बाद इस घटना को याद करते हुए एस्‍टेरॉयड डे मनाने की शुरुआत की गई थी। दिसंबर 2016 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 30 जून को विश्व क्षुद्रग्रह दिवस के रूप में घोषित करने का प्रस्‍ताव अपनाया। हर साल 30 जून को दुनिया भर में इस दिवस को लेकर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ये कार्यक्रम बड़े पैमाने पर स्वतंत्र रूप से दुनिया भर के संग्रहालयों, अंतरिक्ष एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, क्लबों द्वारा सभी उम्र के लोगों के लिए आयोजित किए जाते हैं। आयोजनों में व्याख्यान और लघु कथा प्रतियोगिता से लेकर लाइव संगीत कार्यक्रम और व्यापक सामुदायिक कार्यक्रम शामिल होते हैं।

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