Jharkhand Foundation Day: राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के चलते धीमी रही झारखंड की विकास यात्रा
Jharkhand Foundation Day: आज झारखंड का स्थापना दिवस है। 15 नवंबर, 2000 को झारखंड राज्य अस्तित्व में आया था। बिहार से अलग होकर बने झारखंड का अपना एक अलग इतिहास है। हालांकि, आजादी से पहले ही झारखंड राज्य के निर्माण की मांग उठी थी।

1938 में अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा द्वारा गठित 'आदिवासी महासभा' ने अलग झारखंड का सपना देखा था। 62 वर्ष बाद उनका यह सपना पूरा हुआ और भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन के अवसर पर झारखंड देश का 28वां राज्य बना।
क्या है झारखंड का अर्थ?
'झारखंड' नाम में 'झार' का मतलब झाड़ या जंगल और 'खंड' का मतलब टुकड़ा होता है। यानि भूमि का ऐसा टुकड़ा जहां झाड़ या जंगल भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। झारखंड के छोटानागपुर पठार पर स्थित होने के कारण इसे छोटानागपुर प्रदेश भी कहा जाता है।
यह राज्य आदिवासी बहुल है। यह मूलतः एक वन प्रदेश है। वहीं, प्रचुर मात्रा में खनिज भंडार भी हैं। इस कारण इस प्रदेश को खनिजों का प्रदेश भी कहते हैं। यहां काफी मात्रा में घने जंगल और वनस्पतियां पाई जाती हैं।
अलग झारखंड राज्य के लिए आंदोलन
सन् 2000 में अस्तित्व में आया झारखंड राज्य कई चरणबद्ध आंदोलनों की देन है। जंगल और प्राकृतिक संपदाओं से भरे-पूरे इस राज्य की मांग हालांकि 1938 में जयपाल सिंह मुंडा द्वारा स्थापित 'आदिवासी महासभा' ने सबसे पहले की थी। मगर 1949 में आदिवासी महासभा के पूर्ण रूप से एक राजनीतिक दल 'झारखंड पार्टी' बनने के साथ ही अलग झारखंड राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी।
बिहार की राजनीति में इस पार्टी की हैसियत लगातार बढ़ती गई। एक समय ऐसा भी आया जब यह पार्टी बिहार में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में भी रही। कहा जाता है कि अविभाजित बिहार में मौजूदा झारखंड के जो हिस्से शामिल थे, उनका उस अनुपात में विकास नहीं हो पा रहा था, जितना होना चाहिए था।
आजादी के बाद भारत में एक बड़ी समस्या रोजगार की थी। ऐसे में खनिजों का दोहन और कल-कारखानों की स्थापना सरकार की मुख्य नीतियों में शामिल किया गया। झारखंड शुरू से ही खनिज संपदा से संपन्न क्षेत्र था। यहां का अधिकतर क्षेत्र पठारी था। ज्यादातर भूमि कृषि योग्य नहीं थीं।
वनों पर पूरी तरह निर्भर रहने वाले आदिवासियों के लिए सरकार ने योजना बनाई कि यहां उद्योग धंधे शुरू होंगे तो स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। साथ ही, बंजर भूमि के अधिग्रहण से उन्हें कोई समस्या भी नहीं होगी और उसके बदले में मिलने वाले मुआवजे से उनके जीवन स्तर में सुधार होगा, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उल्टा।
खनिजों के दोहन के लिए बाहरी लोगों का यहां आगमन हुआ। आदिवासियों और स्थानीय लोगों की जमीन अधिग्रहण तो हुई, लेकिन उनको उसका उचित मुआवजा नहीं मिला और न ही कल कारखानों में उन्हें नौकरियां ही मिलीं। ऐसे में स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ता गया और उस असंतोष ने एक आंदोलन को जन्म दिया।
जिन नेताओं ने उस आंदोलन की अगुवाई की, उन्हें ही झारखंड आंदोलन का नेता माना गया। झारखंड आंदोलन में जयपाल सिंह मुंडा, बिनोद बिहारी महतो, एन.ई. होरो, ए.के. राय, निर्मल महतो, शिबू सोरेन, बागुन सुंब्रई, डॉ. रामदयाल मुंडा और बी.पी. केशरी आदि प्रमुख रूप से शामिल थे।
यहां से कई आदिवासी नेता बिहार की राजनीति में एक बड़े नाम तो जरूर हुए, लेकिन जंगलों से घिरे इस भूभाग को सरकार की ओर से उतनी सुविधाएं नहीं दिला पाए, जितनी यहां के आदिवासियों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए जरूरी थी। ऐसे में अलग राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी और आखिरकार सन 2000 में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को झारखंड को अलग राज्य का दर्जा देना पड़ा।
पिछले 22 वर्षों में कितना आगे बढ़ा झारखंड?
झारखंड के बारे में यही कहा जाता है कि इसे भौगोलिक और प्रशासनिक अधिकार तो मिला, लेकिन संतुलित, सम्यक विकास और भविष्य का ताना बाना कहीं पीछे छूट गया। 2013 में आई रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट ने झारखंड को सबसे अल्प विकसित राज्यों की श्रेणी में पांचवें नंबर पर रखा।
झारखंड के साथ कई विरोधाभास भी हैं। कहा जाता है कि झारखंड क्षेत्र में शहरीकरण और औद्योगीकरण की शुरुआत 1907 में ही हो गई थी, जब टाटा कंपनी ने जमशेदपुर में एक स्टील प्लांट स्थापित किया था और करीब सौ वर्ष पहले ही धनबाद देश की कोयला राजधानी के रूप में विकसित हो चुका था।
हालांकि, इन उपलब्धियों के बावजूद आज झारखंड सबसे ज्यादा ग्रामीण आबादी वाले राज्यों में से एक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां शहरी आबादी 24 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत से काफी नीचे है।
झारखंड देश की कोयले की राजधानी है। यह राज्य अभ्रक, मैंगनीज और बॉक्साइट समेत लौह अयस्क का खनन केंद्र है। यहां भारत के दो सबसे बड़े स्टील प्लांट मौजूद हैं। पहला, टाटा का जमशेदपुर में स्थापित प्लांट और दूसरा 1964 में बोकारो में स्थापित सरकारी स्टील प्लांट। इसके बावजूद अधिकतर मानव विकास सूचकांकों के मामले में यह राज्य लगभग सबसे निचले पायदान पर आता है।
सन 2000 में तीन राज्यों छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का गठन हुआ। राज्य गठन के समय झारखंड अपने साथ बने दो अन्य राज्यों के मुकाबले कहीं ज्यादा संपन्न था। यहां छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के मुकाबले काफी खदानें, खनिज और उद्योग थे। प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता थी। लेकिन इसके बावजूद ये दोनों राज्य आज सकल घरेलू उत्पाद और मानव विकास के सूचकांकों के मामले में झारखंड से कहीं आगे हैं।
झारखण्ड की विकास गाथा
हालांकि झारखंड में पिछले दो दशक में काफी विकास भी हुआ है। राज्य के देवघर में एम्स की शुरुआत की गई है। रांची में भी एम्स बनाने के लिए भूमि चिन्हित की जा रही है। तीन नए और दो निजी मेडिकल कॉलेज स्थापित हुए हैं। राज्य में 15 निजी अस्पताल भी तैयार हुए हैं, जिनमें आधा दर्जन सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल हैं।
झारखंड अलग राज्य बनने के पहले राज्य में कुल 11 ग्रिड सबस्टेशन थे। 22 वर्षों में कुल 39 ग्रिड सबस्टेशन हो गए हैं। अब राज्य के लगभग सभी गांवों में बिजली पहुंच गई है। सड़क घनत्व 67.74 से बढ़कर 162.27 हो गया है। पथ विभाग की सड़क 5400 किमी से बढ़ कर 12936 किमी हो गई है। 11500 किमी से अधिक सड़क का चौड़ीकरण, मजबूतीकरण और राइडिंग क्वालिटी में सुधार हुआ। कई उच्चस्तरीय पुलों का निर्माण हुआ और ग्रामीण इलाकों में बड़े स्तर पर पुलिया का निर्माण हुआ है।
झारखंड सरकार के 2021-22 के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अुनसार झारखंड की प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2011-12 में 41,254 रुपये थी, जो बढ़कर वर्ष 2021-22 में 78,660 रुपये हो गई है। बजट आकार के मामले में भी झारखंड की स्थिति बेहतर है। अब तो झारखंड में स्थानीयता का आधार 1932 का खतियान भी विधानसभा से पारित करवा लिया गया है।
राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार
पर्यवेक्षकों का मानना है कि झारखंड के पिछड़ने का मुख्य कारण राजनैतिक अस्थिरता और नेताओं का भ्रष्टाचार है। मधु कोड़ा के शासनकाल में, उनके और उनके मंत्रियों के ठिकानों पर आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने छापा मारा। कोड़ा स्वयं तो जेल गए ही, साथ ही उनके कई मंत्री और नौकरशाहों को भी जेल जाना पड़ा था।
विश्लेषकों का कहना है कि जब केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार को सदन में अपना बहुमत सिद्ध करना था, उस समय झारखंड मुक्ति मोर्चा के तीन सांसदों पर समर्थन देने के बदले में पैसे लेने का आरोप लगा था। इनमें झारखंड मुक्ति मोर्चा से संस्थापक शिबू सोरेन और उन्हीं की पार्टी के शैलेन्द्र महतो और सूरज मंडल पर भी आरोप लगा और वे जेल भी गए। अब हेमंत सोरेन पर आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए खनन का पट्टा अपने नाम से जारी करा लिया।
पिछले 22 वर्षों में यहां पर 11 सरकारें बनीं। जबकि तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा। 14 वर्षों तक झारखंड में निर्दलीयों का कुनबा सरकार बनाने-गिराने की ताकत में रहा और राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही।
राज्य गठन के बाद बिहार विधानसभा चुनाव के आधार पर पहली झारखंड विधानसभा का गठन किया गया और भाजपा के बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।
2002 में मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी जब राज्य की स्थानीयता को लेकर 'डोमिसाइल नीति' लाए, तो इसके पक्ष और विपक्ष में खूब प्रदर्शन हुए। तब उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने ही इस नीति का विरोध किया और बाद में बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसके बाद अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने और लगभग दो वर्षों तक वे इस पद पर रहे।
वर्ष 2005 में पहली बार विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें यूपीए या एनडीए किसी को बहुमत नहीं मिला। झारखंड की राजनीति में कुर्सी के लिए जोड़-तोड़ का नया अध्याय यहीं से शुरू हुआ।
इस विधानसभा कार्यकाल में चार सरकारें बनीं। बहुमत का आंकड़ा नहीं होने के बावजूद झामुमो नेता शिबू सोरेन ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया और मुख्यमंत्री भी बने। हालांकि 10 दिन में शिबू सोरेन की सरकार गिर गई।
फिर अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। इसके बाद निर्दलीय मधु कोड़ा को कांग्रेस, झामुमो और राजद ने समर्थन देकर मुख्यमंत्री बना दिया। मधु कोड़ा दो वर्ष का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सके, फिर शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने। इसके बाद राष्ट्रपति शासन लगा।
राष्ट्रपति शासन में ही वर्ष 2009 में चुनाव हुआ, लेकिन राजनीतिक स्थिरता नहीं आई। इस विधानसभा के कार्यकाल में तीन सरकारें बदलीं। भाजपा के सहयोग से शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने। तब वे सांसद थे। लेकिन, संसद में उन्होंने यूपीए को वोट कर दिया, जिससे नाराज भाजपा ने उनसे नाता तोड़ लिया।
झारखंड में फिर राष्ट्रपति शासन लगा। पांच महीने बाद झामुमो-भाजपा साथ आए। 28-28 महीने का समझौता हुआ। अर्जुन मुंडा के नेतृत्व को झामुमो ने समर्थन दिया, लेकिन वे 28 महीने का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। झामुमो ने सरकार गिरा दी। फिर राष्ट्रपति शासन लगा। राष्ट्रपति शासन के क्रम में ही झामुमो के साथ यूपीए के सभी दल साथ आए। इसके बाद हेमंत सोरेन के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी।
वर्ष 2014 में झारखंड में तीसरा विधानसभा चुनाव हुआ। 14 वर्ष बाद झारखंड स्थिरता के रास्ते पर चला और एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला। भाजपा-आजसू ने मिल कर सरकार बनाई। मुख्यमंत्री रघुवर दास बने और पहली बार किसी सरकार ने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया।
वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भी झारखंड राजनीतिक स्थिरता की राह पकड़ कर चला। इस बार यूपीए को पूर्ण बहुमत मिला और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में दूसरी बार राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।
अब 2022 में फिर से राजनीतिक अस्थिरता दिख रही है। सामान्य बहुमत से अधिक विधायकों का आंकड़ा होने के कारण अभी हेमंत सोरने की कुर्सी को खतरा नहीं है, लेकिन तकनीकी मामलों में फंसे होने के कारण एक बार फिर से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनती दिख रही है।
प्रवर्तन निदेशालय ने अवैध खनन घोटाला के मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पूछताछ के लिए बुलाया है। इसके अलावा मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए अपने नाम से पत्थर खनन लीज लेने संबंधी आरोप में उनकी विधानसभा की सदस्यता पर भी तलवार लटक रही है। राज्यपाल ने इस संबंध में चुनाव आयोग से दोबारा राय मांगी है।
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