1932 Khatiyan in Jharkhand: क्या है 1932 का खतियान, जिसे झारखंड सरकार ने विधानसभा से पारित कराया?

झारखंड गठन के बाद से ही 1932 के खतियान का जिक्र होता रहा है। 1932 के खतियान को आधार बनाने का सीधा अर्थ है कि उस समय के लोगों का नाम ही खतियान में होगा। यानि 1932 में झारखंडवासियों के वंशज ही झारखंड के मूल निवासी माने जाए

झारखंड में खतियान आधारित स्थानीय नीति को अब नियोजन से जोड़ दिया गया है। झारखंड में 1932 या उसके पूर्व की खतियानी पहचान वाले झारखंडियों को ही राज्य में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरी मिल पाएगी।

11 नवंबर को विधानसभा के विशेष सत्र में सरकार ने झारखंड के स्थानीय व्यक्तियों की परिभाषा तय करने वाला विधेयक पारित किया। सरकार ने सदन की कार्यवाही के दौरान ही यह प्रावधान जोड़ा कि जो स्थानीय होंगे, वे ही तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के पात्र होंगे। इसके साथ ही, विधानसभा में आरक्षण संशोधन विधेयक को भी पारित कराया गया। ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण सहित अन्य वर्गों के कोटे को बढ़ाकर अब आरक्षण की सीमा 77 प्रतिशत कर दी गई है।

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दोनों विधेयकों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा। सामान्य प्रक्रिया के तहत दोनों ही विधेयक राज्यपाल के पास भेजे जाएंगे।

विधेयक में ही इसे नौवीं सूची में शामिल करने के बाद इसे लागू करने का प्रावधान जोड़ा गया है। यह केंद्र सरकार को करना है। राज्यपाल दोनों ही विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजेंगे।

इसके बाद केंद्र सरकार की भूमिका होगी। राज्यपाल पर निर्भर करता है कि वे कब राष्ट्रपति को भेजें या न भेजें। राज्यपाल के पास इसकी प्रक्रिया पूरी करने की समय सीमा की बाध्यता नहीं है।

स्थानीयता विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव माले के विनोद सिंह, भाजपा के रामचंद्र चंद्रवंशी, आजसू के लंबोदर महतो और निर्दलीय अमित यादव की ओर से लाया गया था। इनमें विनोद सिंह का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा में कहा कि विधेयक का उद्देश्य आदिवासियों को शैक्षणिक, सांस्कृतिक और वित्तीय लाभ देना है। उन्होंने कहा कि 1932 के बाद दूसरे राज्यों के लोगों की वजह से आदिवासियों के रहन-सहन, रीति-रिवाज और परंपराओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसलिए 1932 की मांग शुरू से राज्य में होती रही है। झारखंड सरकार उनकी मांगों को पूरा करने जा रही है।

इस अवसर पर भाजपा विधायक रामचंद्र चंद्रवंशी ने कहा कि सरकार ने इस विधेयक को जल्दबाजी में पेश किया है। इसे प्रवर समिति को सौंपना चाहिए, ताकि बाद में इसमें कोई कानूनी विवाद न हो। कानूनविदों से सरकार को सुझाव लेना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि 2016 में रघुवर दास के कार्यकाल में यह विधेयक लाया गया था। हम इस विधेयक के समर्थन में हैं, लेकिन इसमें संशोधन की जरूरत है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा है कि सत्ता में आने के तीन साल बाद हेमंत सोरेन सरकार को 1932 खतियान और पिछड़ा आरक्षण की याद तब आई, जब प्रवर्तन निदेशालय मुख्यमंत्री के द्वार पर पहुंची।

क्या है 1932 का खतियान?
झारखंड गठन के बाद से ही 1932 के खतियान का जिक्र होता रहा है। 1932 के खतियान को आधार बनाने का सीधा अर्थ है कि उस समय के लोगों का नाम ही खतियान में होगा। यानि 1932 में झारखंडवासियों के वंशज ही झारखंड के मूल निवासी माने जाएंगे। 1932 के सर्वे में जिसका नाम खतियान में चढ़ा हुआ है, उसके नाम का ही खतियान आज भी है। रैयतों के पास जमीन के सारे कागजात हैं, लेकिन खतियान दूसरे का ही रह जाता है।

बिरसा मुंडा के आंदोलन के बाद 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी अधिनियम ) बनाया गया। इसका उद्देश्य आदिवासियों की जमीन को गैर आदिवासियों के हाथों में जाने से रोकना था। लेकिन सीएनटी अधिनियम के प्रावधानों का क्रियान्वयन सरकार ने सही से नहीं किया। आदिवासी भूमि के कृषि या उद्योगों के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने के कई मामले वर्तमान में मौजूद हैं। आज भी खतियान यहां के भूमि अधिकारों का मूल मंत्र या संविधान है।

1831-1832 के कोल विद्रोह के बाद 'विल्किंसन अधिनियम' आया। कोल्हान की भूमि 'हो' आदिवासियों के लिए सुरक्षित कर दी गई। यह व्यवस्था निर्धारित की गई कि कोल्हान का प्रशासनिक कामकाज हो मुंडा और मानकी के द्वारा कोल्हान के अधीक्षक करेंगे।

इस इलाके में साल 1913-1918 के बीच भूमि सर्वेक्षण हुआ और इसी के बाद 'मुंडा' और 'मानकी' को खेवट में विशेष स्थान मिला। आदिवासियों का जंगल पर अधिकार इसी सर्वे के बाद दिया गया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1950 में बिहार में भूमि सुधार अधिनियम आया। इसको लेकर आदिवासियों ने प्रदर्शन किया। वर्ष 1954 में इसमें संशोधन किया गया और मुंडारी खूंटकट्टीदारी को इसमें छूट मिल गई।

1932 के खतियान पर राजनीति
2002 में झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने जब राज्य की स्थानीयता को लेकर 'डोमिसाइल नीति' लागू की, तो इसके पक्ष और विपक्ष में खूब प्रदर्शन हुए। कई स्थानों पर हिंसा हुई, जिसमें कई लोग मारे गए।

तब उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने ही इस नीति का विरोध किया और बाद में बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। झारखंड उच्च न्यायालय ने इस नीति को अमान्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया।

इसके बाद अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। स्थानीय नीति तय करने के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय कमेटी ने एक रिपोर्ट पेश की, लेकिन इस बार आगे कुछ नहीं हो सका। बाद की सरकारें इसे विवादास्पद मानकर इससे बचती रहीं।

लेकिन वर्ष 2013 में अपने पहले मुख्यमंत्री काल में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन ने स्थानीय नीति पर सुझाव देने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी। लेकिन तब यह नीति नहीं बन सकी। झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन भी 1932 के खतियान को आधार मानकर स्थानीय नीति बनाए जाने की वकालत करते रहे हैं, लेकिन उनके स्वयं मुख्यमंत्री रहते यह नीति नहीं बन सकी।

वर्ष 2014 में जब रघुवर दास सत्ता में आए तो उनकी सरकार ने 2018 में राज्य की स्थानीयता की नीति घोषित कर दी, जिसमें 1985 से राज्य में रहने वाले सभी लोगों को स्थानीय माना गया।

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