Jallianwala Bagh Massacre: जलियांवाला बाग नरसंहार से जुड़े पांच महत्वपूर्ण और अनजाने तथ्य
ब्रिटिश काल में जलियांवाला बाग में हुआ नरसंहार बीती सदी की सबसे दुखद घटनाओं में से एक था। इस नरसंहार ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़े कई नेताओं और क्रांतिकारियों को प्रभावित किया।

Jallianwala Bagh Massacre: 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियांवाला बाग के पास एक संकरी गली में लगभग 5000 लोगों की एक सभा चल रही थी। इस सभा का आयोजन 'रॉलेट एक्ट' के विरोध में किया गया था। दरअसल, इसी एक्ट के तहत दो स्वतंत्रता-सेनानियों सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी की गई थी। जनरल रेजिनाल्ड डायर के साथ लगभग 90 लोगों की फौज वहां पहुंची। इनमें से 50 के पास राइफल्स, और 40 के पास छोटी-छोटी तलवारें थीं। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के इस सभा पर फायर करने का आदेश दे दिया।
यह गोलीबारी लगभग दस मिनट तक जारी रही। इस दौरान 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। इस घटना की जांच के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा 'हंटर कमेटी' का गठन किया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इस गोलीबारी में 379 लोग मारे गए। हालांकि, मरने वालों की संख्या इससे भी कहीं ज्यादा थी।
इस घटना के बाद, जनरल डायर ने लिखित में बताया था कि जितनी भी गोलियां चलाई गईं, वे कम थीं। अगर उसके पास और अधिक पुलिस बल होता, तो और भी लोग मारे जाते। इस घटना के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'नाइटहुड' की उपाधि को वापस कर दिया था।
उधम सिंह ने लिया इस हत्याकांड का बदला
कहा जाता है कि जब जलियांवाला बाग नरसंहार को अंजाम दिया गया तो उस सभा में उधम सिंह भी मौजूद थे और वह किसी तरह जिंदा बच गए। तब उनकी उम्र केवल 19 वर्ष की थी। उस समय पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ' ड्वायर था। उसने इस हत्याकांड को उचित ठहराया था। इससे उधम सिंह बहुत आहत हुए और ओ' ड्वायर की हत्या की योजना बनाने लगे।
इस नरसंहार के बाद माइकल ओ' ड्वायर लन्दन चला गया। वहीं, अपनी योजना को अंजाम देने के लिये साल 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां एक इंजीनियर के रूप में काम करने लगे। आखिरकार एक लम्बे इन्तजार के बाद वह दिन भी आ गया जब उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरसंहार के हत्यारें माइकल ओ' ड्वायर को मारकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी।
दरअसल, 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसायटी की संयुक्त बैठक में माइकल ओ' ड्वायर को भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। उधम सिंह ने एक रिवाल्वर के साथ हॉल में प्रवेश किया। जैसे ही माइकल ओ' ड्वायर बोलने के लिए मंच की ओर बढ़ा, उधम सिंह ने उसपर लगातार दो गोलियां चला दीं और माइकल ड्वायर की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। इसके बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी।
महात्मा गांधी ने जनरल डायर को किया माफ
25 अगस्त 1920 को 'यंग इंडिया' में लेख लिखकर महात्मा गांधी ने कहा कि यह पाप होगा कि मैं निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले जनरल डायर का सहयोग करूं। लेकिन अगर वह शारीरिक रूप से बीमार है, तो उसकी सेवा करना प्रेम का कार्य होगा और उसे हमें माफ कर देना चाहिए। गांधी की नजर में डायर ने सिर्फ कुछ लोगों की शरीर की हत्या की थी, जबकि अन्य लोगों ने राष्ट्र की आत्मा को मारने की कोशिश की।
जनरल डायर का बचाव करते हुए गांधी ने कहा कि जनरल डायर के प्रति लोगों का जो रोष और गुस्सा है, वह काफी हद तक गलत दिशा में है। दरअसल, जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद जनरल डायर गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था और इसी बीमारी के चलते साल 1927 में उसकी मौत हो गई थी।
डायर की मौत के कुछ वर्षों बाद, महात्मा गांधी ने कहा कि उनके कहने पर ही कांग्रेस जांच समिति ने जनरल डायर के खिलाफ मुकदमा करने की मांग को वापस ले लिया था। गांधी ने कहा कि मेरे मन में डायर के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। मैं उनसे व्यक्तिगत तौर पर मिलना चाहता था। लेकिन यह केवल एक आकांक्षा बनकर ही रह गई।
जलियांवाला नरसंहार के बाद वहीं कांग्रेस ने रखा अपना अधिवेशन
27 दिसंबर 1919 को कांग्रेस का 34वां अधिवेशन अमृतसर में बुलाया गया। इस अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण मोतीलाल नेहरू ने दिया। इस भाषण में उन्होंने ब्रिटिश शासन की जमकर तारीफ की। उस दौरान जॉर्ज फ्रेडरिक पंचम ब्रिटेन के राजा और भारत के सम्राट थे। उनके उत्तराधिकारी प्रिंस ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड अष्टम का भारत दौरा तय था। अधिवेशन में मोतीलाल ने भगवान से प्रार्थना करते हुए भारत की समृद्धि के लिए एडवर्ड की बुद्धिमानी और नेतृत्व की जमकर सराहना की। अपने भाषण में उन्होंने ब्रिटिश शासन की उदारता और उसके प्रति अपनी निष्ठा का भी खूब बखान किया।
एक ओर तो मोतीलाल नेहरू ब्रिटिश साम्राज्य की तारीफों के पुल बांध रहे थे, वहीं दूसरी तरफ, ब्रिटेन की संसद में जनरल डायर को 'क्षमतावान अधिकारी' बताया जा रहा था। दरअसल, 19 जुलाई 1920 को ब्रिटिश संसद में एक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए डायर की तारीफ की जा रही थी। जबकि कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी बनाए रखी।
भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार की होम पॉलिटिकल विभाग की फाइल संख्या जनवरी 1920/77 के अनुसार कांग्रेस ने अमृतसर को अपने अधिवेशन के लिए जानबूझकर चुना, जिससे एक खास राजनीतिक मकसद को पूरा किया जा सके। दस्तावेज के अनुसार मोतीलाल की नेतृत्व वाली कांग्रेस उन खूनी धब्बों से ब्रिटिश सरकार को बचाने का प्रयास कर रही थी, जिनके निशान आज तक अमृतसर में मौजूद हैं।
इस फाइल में एक पत्र भी है, जो कांग्रेस के एक सदस्य ने अमृतसर के उपायुक्त को लिखा था। इस पत्र में उन्होंने सुझाव दिया कि अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन ब्रिटेन और कांग्रेस के हितों के लिए जरूरी है और अगर ब्रिटिश सरकार कांग्रेस के अधिवेशन की अनुमति देती है, तो इससे जनता के बीच सरकार की छवि सुधरेगी।
मदनमोहन मालवीय ने छोड़ दी कुलपति की कुर्सी
जब जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना हुई, उस समय बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कुलपति का पद खाली था। मालवीय जी को कुलपति बनना था। लेकिन, कांग्रेस ने जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया, जिसका अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय को बनाया गया। अतः सात महीनों की जांच के बाद ही उन्होंने कुलपति का पद संभाला। मालवीय जी की रिपोर्ट के अनुसार जलियांवाला बाग हत्याकांड में 1300 लोग मारे गए थे और 2 हजार से अधिक लोग घायल हुए थे।
भगत सिंह ने खून से सनी मिट्टी को लेकर खाई सौगंध
जब जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना हुई तो भगत सिंह केवल 12 वर्ष के थे। कहा जाता है कि भगत सिंह ने खून से सनी बाग की मिट्टी उठाकर एक बोतल में भरी और घर लौट आए। जब वह घर पहुंचे तो उनकी बहन ने कहा कि आज तुमने इतनी देर कहां लगा दी? आओ खाना खा लो। भगत सिंह गुस्से और गहरे दुःख में थे। वह बोले आज मैं खाना नहीं खाउंगा।
इसके बाद उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने हमारे बहुत सारे लोगों को गोलियों से भून दिया है। फिर उन्होंने अपनी बहन को बोतल दिखाते हुए कहा कि इसमें देश के शहीदों का खून भरा हुआ है। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि देश के निर्दोष लोगों का खून बहाने वाले अंग्रेजों को भारत से बाहर करके ही दम लूंगा।
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