इजरायली ड्रोन भी बन रहे हैं भारत में, तेजी से फैल रहा है ड्रोन का बाजार

Indian Drone Companies: इधर भारत में चुनाव हो रहे हैं और दूसरी तरफ दुनिया में कई जगह जंग भी चल रही है। भारत इन जंगों में सीधे रूप से कहीं शामिल तो नहीं है, लेकिन कहीं युद्ध खत्म करने हेतु बातचीत की पहल कर रहा है, तो कहीं किसी देश के साथ सकंट से समय कुछ खास सहयोग भी कर रहा है।

ताजा युद्ध ईरान और इजरायल के बीच चल रहा है और इजरायल की सुरक्षा के लिए बेहद उपयोगी हर्मिज ड्रोन का उत्पादन भारत में भी हो रहा है। हैदराबाद स्थित अडानी-एल्बिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड उस हर्मीस 900 ड्रोन का निर्माण किया है, जिसका उपयोग इजरायली सेना युद्ध में करती आ रही है।

Israeli drones drone

दरअसल हर्मिज ड्रोन बनाने वाली इजरायल की एल्बिट सिस्टम्स ने भारत की अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के साथ मिलकर इस ड्रोन का उत्पादन इजरायल के अलावा भारत में भी शुरू किया है। हर्मीस 900, एक अत्याधुनिक मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) है, जो वर्तमान में इजरायल के हमास और ईरान के साथ संघर्ष में सक्रिय रूप से तैनात है। उच्च कोटि के सेंसर से लैस यह यूएवी अपनी सीमा में रहकर ही जमीन या समुद्री लक्ष्यों का पता लगाने में बहुत उपयोगी है।

कई भारतीय कंपनियां कर रही हैं ड्रोन उत्पादन

ड्रोन बनाने की तकनीक भारत में तेजी से विकसित हो रही है और भारत ड्रोन आपूर्ति करने वाला दुनिया का एक प्रमुख देश बनता जा रहा है। इस समय कई भारतीय कंपनियां हैं जो ड्रोन बना रही हैं और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑर्डर भी मिल रहे हैं। भारत रक्षा, सुरक्षा, कृषि और बुनियादी ढांचे के प्रयोग वाले ड्रोन के डिजाइन, विकास और निर्माण में आगे निकल चुका है।

कई भारतीय कंपनियां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए ड्रोन का निर्माण कर रही हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स, ज़ेन टेक्नोलॉजीज, पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक, आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी, थ्रॉटल एयरोस्पेस, अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, पारस एयरोस्पेस, कैडेट डिफेंस सिस्टम्स, सागर डिफेंस इंजीनियरिंग, न्यूस्पेस रिसर्च, रैपे एमफिब्र, जटायु अनमैन्ड सिस्टम्स, साइएंट सॉल्यूशंस एंड सिस्टम्स, आईआईओ टेक्नोलॉजीज और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, जैसे कुछ नाम ड्रोन के बाजारों में छाते जा रहे हैं।

भारत के लिए ड्रोन उद्योग में बड़ा अवसर

भारत का यूएवी उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और भारत के लिए पर्याप्त अवसर भी हैं। रूस ने सुखोई एस-70 ओखोटनिक, अल्टियस-यू और ओरियन-ई सहित कई ड्रोन विकसित किए हैं, लेकिन एक उद्योग के रूप में उसे आगे बढ़ाने में उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जिससे उसका विकास और उत्पादन सीमित हो गया है।

रूस में ड्रोन विकास के लिए निवेश और धन की भारी कमी है। अमेरिका और चीन की तुलना में, रूस ने अपने ड्रोन कार्यक्रम में बहुत कम निवेश किया है। इसके अलावा रूस ने परंपरागत रूप से मानवयुक्त विमान और अन्य प्रकार के सैन्य उपकरणों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया हुआ है, ड्रोन प्रौद्योगिकी के साथ उतना अनुभव रूस के पास नहीं है। लेकिन भारत तकनीकी क्षेत्र में दिन प्रतिदिन आगे बढ़ता ही जा रहा है।

तेजी से बढ़ रहा है ड्रोन बाजार

अप्रैल 2016 तक, गोपनीयता और सुरक्षा पर खतरे और चिंताओं के कारण पूरे भारत में मानव रहित हवाई वाहनों (यूएवी)/ड्रोन के किसी भी उपयोग पर प्रतिबंध था। लेकिन नवंबर 2017 में नागरिक उड्डयन नियामक महानिदेशालय (डीजीसीए) ने प्रकाशित नियमों के मसौदे ने मानव रहित विमान प्रणाली (यूएएस) प्रौद्योगिकी के नागरिक और वाणिज्यिक उपयोग के लिए एक नई गाइडलाइन जारी कर दी।

एक दिसंबर 2018 से भारत में ड्रोन का व्यावसायिक उपयोग शुरू करने की अनुमति दे दी गई। उसके बाद तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां और स्टार्टअप अपने ड्रोन उत्पादों और सेवाओं को बेहतर बनाने में पूरी तरह जुट गए। भारतीय ड्रोन विनिर्माण उद्योग का वार्षिक बिक्री कारोबार 2030 तक $13 बिलियन डॉलर तक होने का अनुमान है, जो 2022 में $2.71 बिलियन डॉलर था। रक्षा मंत्रालय के आकड़ों के अनुसार भारत में वर्तमान में 200 से अधिक ड्रोन तकनीक स्टार्टअप हैं, जिनमें से 13,000 से अधिक ड्रोन देश में पंजीकृत हैं।

जीवन के हर क्षेत्र में ड्रोन का उपयोग

इस समय यूएवी या ड्रोन कृषि, स्वास्थ्य सेवा, उत्पादों की डिलीवरी, बुनियादी ढांचे के निरीक्षण आदि क्षेत्रों में अपनी उपयोगिता साबित कर रहा है। नई प्रौद्योगिकी ने इस क्षेत्र में भारत को गेम चेंजर बना दिया है। वैसे ड्रोन ने पूरी दुनिया में डिलीवरी सिस्टम में क्रांति ला दी है। सिलिकॉन वैली स्थित कंपनी जिपलाइन ने अफ्रीका में ग्रामीण और भीतरी इलाकों में रहने वाले लोगों को रक्त पहुंचाकर हजारों लोगों की जान बचाई।

ई-कॉमर्स दिग्गज अमेजॉन ने भारत में अपने अमेज़ॅन प्राइम एयर डिलीवरी सिस्टम को पेश करने के लिए भारत में एक पेटेंट भी दायर किया है। ड्रोन के जरिए किसी व्यक्ति द्वारा ऑर्डर किए गए उत्पादों को मिनटों के भीतर डिलीवर कर सकते हैं। कई देशों में बुनियादी ढांचे के निरीक्षण के लिए भी ड्रोन का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। ड्रोन का उपयोग बांधों और पुलों जैसे बुनियादी ढांचे की निगरानी और सैन्य अड्डों जैसी उच्च प्राथमिकता वाली संपत्तियों की निगरानी के लिए किया जा सकता है।

आंध्र प्रदेश सरकार नियमित रूप से ड्रोन का उपयोग करके अपनी प्रतिष्ठित पोलावरम सिंचाई परियोजना की प्रगति की निगरानी कर रही है। अमेरिका में वैज्ञानिक तूफान के प्रक्षेप पथ पर नज़र रखने के लिए पानी के नीचे ड्रोन का भी उपयोग कर रहे हैं। तूफान इरमा और मारिया के दौरान हुई तबाही के बाद प्यूर्टो रिको में बिजली वापस लाने के लिए बिजली के तारों को उठाने के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था।

क्या हैं ड्रोन के बारे में नए नियम?

भारत में डीजीसीए ने वाणिज्यिक ड्रोनों में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस), रिटर्न-टू-होम सुविधा, टक्कर-रोधी क्षमता, उड़ान डेटा लॉगिंग क्षमता वाला उड़ान नियंत्रक के लिए एक सिम और एक पहचान प्लेट को अनिवार्य कर दिया है। पायलटों को हर उड़ान के लिए अपने सिम के जरिए अनुमति लेनी होगी।

सभी वाणिज्यिक ड्रोनों को डिजिटल स्काई नामक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर पंजीकृत किया जाना जरूरी है। वे वजन और भूगोल के आधार पर ड्रोन के समय, ऊंचाई और सीमा को भी सीमित करते हैं। सभी ड्रोनों को केवल दृश्य रेखा के साथ और केवल दिन के दौरान, अधिकतम 400 फीट की ऊंचाई पर संचालित करने की अनुमति होगी। नैनो ड्रोन के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी।

भारत में ड्रोन विनिर्माण सफलता का मंच पूरी तरह तैयार है। देश इस क्षेत्र में एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बनने की ओर अग्रसर है। भारत सरकार की अनुकूल नीतियों ने ड्रोन उद्योग के विकास को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। सरकार ने ड्रोन उद्योग को विनियमित करने और सुरक्षित और जिम्मेदार ड्रोन उपयोग सुनिश्चित करने के लिए नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) में एक विभाग की स्थापना की है।

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