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Human Rights Day: क्यों मनाया जाता है मानवाधिकार दिवस, भारत में मानवाधिकारों को लेकर क्या हैं प्रावधान?

हर साल 10 दिसंबर को विश्वभर में मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। गौरतलब है कि 10 दिसंबर 2023 को 75वां मानवाधिकार दिवस मनाया जाएगा।

International Human Rights Day importance and provisions of human rights in India?

International Human Rights Day अर्थात अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस 10 दिसंबर को मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को अपनाने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। दरअसल, आज ही के दिन वर्ष 1948 में यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स (UDHR) को अपनाया गया था। इसकी घोषणा 10 दिसंबर 1948 को पेरिस, फ्रांस में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई। इस ऐतिहासिक उपलब्धि की वर्षगांठ मनाने के लिए हर साल 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।

यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स, मानवाधिकार मानकों की एक सीमा निर्धारित करती है और अवगत कराती है कि यह अधिकार यूनिवर्सल हैं - जिसका अर्थ है कि वे सभी लोगों पर बिना भेदभाव लागू होते हैं। यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स सभी देशों के प्रतिनिधियों द्वारा तैयार किया गया है और यह दुनियाभर में बुनियादी मानवाधिकार मानकों का नियमन करता है।

यह घोषणापत्र इस बारे में एक आम समझ प्रदान करता है कि मौलिक मानवाधिकारों का गठन क्या होता है और नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की एक श्रृंखला निर्धारित करता है, जिसका लोगों को आनंद लेना चाहिए चाहे वे कहीं भी रहते हों या उनकी राष्ट्रीयता कोई भी हो।

क्या होते हैं मानवाधिकार?

मानवाधिकार वे अधिकार एवं स्वतंत्रता हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को उनकी राष्ट्रीयता, जाति, लिंग, भाषा, धर्म, यौन अभिविन्यास या राजनीतिक मान्यताओं की परवाह किए बिना प्रदान किये जाते हैं। मानवाधिकार केवल कानूनी अधिकार नहीं हैं बल्कि इसमें अन्य प्रकार के नागरिक और राजनीतिक अधिकार भी शामिल हैं। वे प्रकृति में सार्वभौमिक हैं, जिसका अर्थ है कि वे दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होते हैं।

भारत में मानवाधिकारों को लेकर क्या प्रावधान हैं?

मानवाधिकार व्यक्तियों के समग्र विकास के लिए आवश्यक हैं। भारत का संविधान अपने नागरिकों के साथ-साथ विदेशियों के मौलिक अधिकारों के लिए भी प्रावधान करता है। भारतीय संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा देने के लिए कई प्रावधान दिए गए हैं। भारतीय संविधान मानवाधिकारों के संरक्षण से संबंधित एक समृद्ध दस्तावेज है। वास्तव में, यह दुनिया के किसी भी देश द्वारा बनाए गए मानवाधिकारों पर एक विस्तृत दस्तावेज है। इसके अलावा, भारत में न्यायपालिका मानवाधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय संविधान की संरचना वर्ष 1946 से वर्ष 1949 के बीच में की गई। भारतीय संविधान की धाराएँ मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करती हैं। किसी व्यक्ति के लिंग, जाति, धर्म या आस्था के बावजूद, इन मौलिक अधिकारों को सभी नागरिकों के मौलिक मानवाधिकारों के रूप में माना जाता है। भारतीय संविधान की एक अच्छी विशेषता यह है कि मानवाधिकारों के बड़े हिस्से को मौलिक अधिकारों के रूप में नामित किया गया है।

भारतीय संविधान के 6 मौलिक अधिकार भी मानवाधिकार हैं जिनमें, समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24), धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28), सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30), संवैधानिक उपचार का अधिकार (अनुच्छेद 31) शामिल है। चूंकि ये अधिकार बुनियादी मानवाधिकार हैं जिनका इस्तेमाल करने के लिए भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता है, ये मौलिक अधिकार भारतीय संविधान का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू हैं। भारतीय संविधान में ऐसे और कई अनुच्छेद और अधिकार है जो मानवाधिकारों की पूर्ण रूप से रक्षा करते हैं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जिसे NHRC के नाम से भी जाना जाता है, भारत सरकार की एक स्वतंत्र एजेंसी है, जिस पर मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने और उनकी रक्षा करने की जिम्मेदारी है। यह भारतीय संविधान में एक कानूनी संस्था है जिसे 1993 में बनाया गया था और "मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम" के तहत इसमें 2006 में संशोधन किया गया था। NHRC के संयोजन में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के एक जज, एक हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य सदस्य शामिल होते है।

भारत में मानवाधिकार उत्पीड़न के कितने मामले?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर 2022 में मानवाधिकार उत्पीड़न के 7,760 मामले दर्ज किए गए हैं। 7,760 मामलों में 16 मामले पुलिस हिरासत में उत्पीड़न के है, कानूनी हिरासत में 199 मामले उत्पीड़न के है, पुलिस एनकाउंटर से हत्या के 10 मामले हैं, बंधुआ मजदूरी के 27 मामले हैं, बच्चों पर उत्पीड़न के 61 मामले हैं, 438 मामले महिलाओं पर उत्पीड़न के है, SC/ST/OBC पर उत्पीड़न के 76 मामला है और अन्य उत्पीड़न के 6,933 मामले दर्ज है जिसमें रैगिंग, दहेज, भुखमरी, टॉर्चर आदि अन्य कई उत्पीड़न शामिल हैं।

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