India-Turkiye Relations: भारत-तुर्किये रिश्तों के बीच क्यों हैं दूरियां, जानें पूरा इतिहास

India-Turkiye Relations: फरवरी के आखिरी सप्ताह में कश्मीर के मुद्दे पर भारत-तुर्किये एक बार फिर से आमने-सामने आ गए थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 55वें सत्र में तुर्किये ने कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर सवाल उठाया और भारत को घेरने का प्रयास किया था।

हालांकि, राइट टू रिप्लाई के तहत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने तुर्किये को जवाब देते हुए कहा कि हमें दुख है कि तुर्किये ने भारत के आंतरिक मामले पर टिप्पणी की। उम्मीद है कि वह आगे इस तरह के गैर-जरूरी बयान से बचेगा।

India-Turkey Relations

वैसे तुर्किये द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठाना कोई पहला वाक्या नहीं है। तुर्किये पहले भी कई बार कश्मीर का राग अलाप चुका है। अब सोचने वाली बात ये है कि आखिर क्यों तुर्किये पाकिस्तान की तरह बार-बार कश्मीर का राग छेड़ता है? भारत द्वारा बार-बार मदद करने के बावजूद क्यों दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ी हुई हैं? इसे समझने के लिए भारत और तुर्किये का पूरा इतिहास समझते हैं।

तुर्किये और भारत का तनाव है पुराना

भारत और तुर्किये के बीच 1948 से डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। हालांकि, शीतयुद्ध के समय दोनों देशों में थोड़ी दूरी बढ़ गई थीं। क्योंकि, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही दुनिया अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ की अगुआई वाले दो ध्रुवों में बंट गई और शीतयुद्ध का दौर शुरू हुआ।

तुर्की तब अमेरीकी खेमे में चला गया और पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो में शामिल हो गया। पाकिस्तान ने भी अमेरीका का धड़ा पकड़ लिया। तब भारत ने तटस्थ रहना मुनासिब समझा और न पूंजीवादी अमेरिका का हाथ थामा और न ही साम्यवादी सोवियत संघ की अगुआई वाले झंडे तले गया।

इसके बाद 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग हुई तब तुर्किये ने पाकिस्तान की काफी सहायता की। यहां तक कि तुर्किये ने पाकिस्तान की सैन्य मदद भी की थी। इस वजह से दोनों देशों के बीच दूरियां और ज्यादा बढ़ गईं।इस

के बाद 1974 में तुर्किये ने साइप्रस (तुर्किये का पड़ोसी देश) पर हमला कर दिया। तब भारत ने साइप्रस का साथ दिया क्योंकि वहां के राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोज गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बड़े नेता थे। इसके बाद और कई घटनाएं हुईं, जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं और तुर्किये धीरे-धीरे पाकिस्तान का करीबी बनता गया।

80 के दशक में सुधरने लगे रिश्ते?

80 के दशक में कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय पटल पर सुर्खियों में छाने लगा था। मुस्लिम देशों के संगठन (ओआईसी) ने कश्मीर में मानवाधिकारों के मामलों को लेकर एक समूह बनाया था। सऊदी अरब व तुर्किये जैसे देश भारत के खिलाफ सक्रियता दिखा रहे थे। तब भारत ने तुर्किये से रिश्ता कायम करना शुरू किया। इसकी पहल राजीव गांधी ने की।

साल 1988 में एक प्रधानमंत्री के रुप में उन्होंने तुर्किये का दौरा किया। इसके बाद नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्रियों ने भी तुर्किये का दौरा किया। इसी तरह साल 2000 में तुर्किये के तत्कालीन प्रधानमंत्री बुलेंट एसेविट भारत यात्रा पर आए। दो दशकों से दोनों देशों के बीच सब ठीक चल रहा था।

जब तुर्किये में बदली सरकार

2001 के करीब लगने लगा था कि तुर्की अब पाकिस्तान को छोड़ भारत के करीब आ जाएगा तभी 2002 में रेचेप तैय्यप एर्दोगान की पार्टी 'इस्लाम' के नाम पर सत्ता में आई। यहीं से स्थिति बदलने लगी, और तुर्किए मुस्लिमों देशों का खलीफा बनने की आस लिए मुस्लिम समुदायों से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने लगा। जिनमें फिलिस्तीन और कश्मीर का मुद्दा भी शामिल था।

एर्दोगान की जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी जब सत्ता में आयी तो उसे भारत से सबसे पहली समस्या हुई व्यापार की। क्योंकि, भारत तब ज्यादा सामान तुर्की को भेजता था, तुर्की से कम सामान खरीदा करता था। तुर्किये चाहता था कि इसे दुरूस्त किया जाए, भारत अपना आयात बढ़ाए और साथ ही मध्य पूर्व में तुर्किये के साथ मिलकर प्रोजेक्टों पर काम करें।

दूसरी समस्या ये हुई कि तुर्किये के पास अपना तेल-गैस नहीं है। इसलिए वो न्यूक्लियर पावर या परमाणु बिजली बनाने की तैयारी कर रहा था। लेकिन, उसके लिए थोरियम से बिजली बनाने की जो तकनीक थी वो भारत के पास थी। तुर्किये चाहता था कि भारत उन्हें ये तकनीक दें। भारत ने इससे इनकार कर दिया। इस तकनीक के लिए खुद रेचेप तैय्यप एर्दोगान दो बार 2017 और 2018 में भारत आए थे। तकनीक न मिलने से नाराज तुर्किये ने भारत को घेरना शुरू कर दिया खासकर कश्मीर के मुद्दे पर।

तुर्किये को जब भी मौका मिलता वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर का मुद्दा उठाता। 5 अगस्त 2019 को जब कश्मीर से धारा 370 हटाई गई थी, तब भी तुर्किये ने बयान जारी कर कहा था कि भारत का ये कदम मौजूदा तनाव को और बढ़ा सकता है। साथ ही 370 हटाने का विरोध किया।

इसके बाद फरवरी, 2020 में तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान पाकिस्तान दौरे थे। तब पाकिस्तानी संसद में एर्दोगान ने कहा था कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए जितना अहम है, उतना ही तुर्किये के लिए भी है। कश्मीर का मुद्दा जितना आपके दिल के करीब है, उतना ही हमारे भी है। अतीत की तरह हम भविष्य में भी पाकिस्तान को समर्थन देना जारी रखेंगे। तुर्किये द्वारा लगातार दिए गए ऐसे बयानों के कारण भारत से तल्खी बढ़ती गई।

ग्रीस से दोस्ती पर तुर्किये नाराज?

अगस्त, 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दिवसीय यात्रा पर ग्रीस पहुंचे थे। पिछले 40 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का ये पहला ग्रीस दौरा था। इससे पहले इंदिरा गांधी ने 1983 में ग्रीस का दौरा किया था। ग्रीस लगातार भारत के साथ नए प्रोजेक्ट पर काम करना चाहता है क्योंकि तुर्किये के साथ उसकी दुश्मनी जगजाहिर है और वो भारत को एक मजबूत साथी के तौर पर देखता है। जो तुर्किये जैसे कट्टर देशों पर लगाम लगाने में उसका साथ दें।

वहीं भारत को भी ग्रीस जैसे दोस्त की जरूरत हैं क्योंकि भू-मध्यसागर में ग्रीस एक अहम शक्ति है। वैश्विक व्यापार के लिए भूमध्य सागर काफी अहम है। ये यूरोप व अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को चीन, भारत और जापान से जोड़ता है। इस समंदर में करीब 15 फीसदी ट्रैफिक इसी रास्ते से होकर गुजरता है। जहां ग्रीस की हिस्सेदारी है।

इसलिए भूमध्य सागर में ग्रीस और तुर्किये अक्सर एक-दूसरे से टकराते रहते हैं। दो साल पहले ही दोनों देश युद्ध के करीब पहुंच गए थे, लेकिन फ्रांस के दखल देने के बाद तुर्किये को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। ग्रीस के कई द्वीपों पर तुर्किये अपना दावा ठोकता रहता है। क्योंकि, ये इलाके प्राकृतिक संसाधनों से भरे हुए हैं।

तुर्किये में कितने भारतीय?

विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2022 तक तुर्की में 1,708 भारतीय रहते थे। जबकि यहां के शिक्षण संस्थानों में महज 193 भारतीय छात्र ही पढ़ाई कर रहे हैं। हालांकि, भारतीय पर्यटकों के लिए तुर्किये मनपसंद जगह है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में 2.3 लाख और 2023 में लगभग 2.7 लाख भारतीय तुर्किये घूमने गए थे।

भारत और तुर्किये के बीच कितना बड़ा है कारोबार?

मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, 2021-22 में भारत और तुर्की के बीच करीब 80 हजार करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था। इसमें से 65 हजार करोड़ का निर्यात और 15 हजार करोड़ का आयात हुआ था। भारत की ओर से तुर्की को ऑयल और ईंधन, कृत्रिम रेशे, प्राकृतिक रेशे, ऑटोमोटिव कल-पुर्जे, साजोसामान और ऑर्गेनिक कैमिकल दिया जाता है। जबकि तुर्की से भारत को खसखस, मशीनरी, इंजीनियरिंग उपकरण, लोहे और स्टील की चीजें, अकार्बनिक रसायन, मोती, जवाहरात और संगमरमर मिलता है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+