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Tiranga: तिरंगे का सम्मान जरूरी, जानें इसे डिस्पोज करने का तरीका

Tiranga: भारत की आजादी के 76 साल पूरे हो चुके हैं। इस पर प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर पूरे देश में 13-15 अगस्त तक 'हर घर तिरंगा' अभियान चलाया जा रहा है। साथ ही स्वतंत्रता दिवस के मौके पर स्कूल में भी हर बच्चे को तिरंगा लाने के लिए कहा जाता है। इस सबके बीच यह ध्यान देने वाली बात है कि सिर्फ तिरंगा फहराना ही हमारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इसका सम्मान करना भी हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। क्योंकि अक्सर ये देखा जाता है कि झंडा फहराने के बाद लोग जानकारी के अभाव में उसे इधर-उधर सड़कों पर फेंक देते हैं। आपको बता दें कि तिरंगे का अपमान करने पर तीन साल की सजा और जुर्माना भी हो सकता है।

चलिए, आज हम आपको तिरंगा खरीदने से पहले बता दें कि इसे सही तरीके से कैसे डिस्पोज किया जाता है। क्या है इसके नियम? और देश ने कैसे इस तीन रंगों की पट्टियों के बीच अशोक चक्र वाले तिरंगे को अपनाया था?

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इन तरीकों से तिरंगे को करें डिस्पोज

भारतीय ध्वज संहिता 2002 के अनुसार, राष्ट्रीय ध्वज के डैमेज होने पर इसे दो तरह से डिस्पोज करने का तरीका बताया गया है। इसमें झंडे को गोपनीय तरीके से दफनाना और जलाना शामिल है। वहीं इन दोनों में से किसी भी प्रक्रिया को चुनते वक्त ध्यान रखें कि इससे संबंधित नियम का पालन करना जरूरी होता है।

● तिरंगे को दफनाने के लिए आपको सारे फटे, कटे, बेकार झंडे (तिरंगा) को एक लकड़ी के बॉक्स में जमा कर लें। ये सभी अच्छे से फोल्ड करके बॉक्स में रखें हो। अब इस बक्से को जमीन में दफना दें। हालांकि, इसके बाद कुछ देर मौन रहने का भी नियम है। यहां पर आपको बता दें कि सीधे झंडे को जमीन में नहीं दफनाना चाहिए, यह एक कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।
● वहीं झंडे को जलाने की प्रक्रिया के तहत सबसे पहले आप एक सुरक्षित जगह चुनें, उसे साफ करें। अब झंडे को अच्छी तरह से मोड़ लें। इसके बाद इसे जलते हुए आग के ठीक बीच में सावधानी और सम्मानपूर्वक रख दें, इसे यूं ही फेंक कर न जलाएं। ध्यान रखें बिना मोड़े हुए को सीधा जलाना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।

झंडे का ऐसे इस्तेमाल करना गलत है?

आपको बताते चलें कि झंडे को किसी भी जगह पर पर्सनल साज-सजावट के लिए इस्तेमाल करना गलत है। वहीं झंडे को किसी भी चीज को ढकने, पोंछने के लिए इस्तेमाल करना भी गलत है। वहीं कमर से नीचे पहनी जाने वाली किसी भी पोशाक पर तिरंगा नहीं बना होना चाहिए। ये एक कानूनन अपराध है। वहीं रूमाल, अंडरगारमेंट्स जैसी चीजों पर तिरंगे का प्रिंट या कढ़ाई नहीं होनी चाहिए।

भारत ने तिरंगा को राष्ट्रीय झंडा कब स्वीकार किया गया?

22 जुलाई, 1947 को दिल्ली के कांस्टिट्यूशनल हॉल में संविधान सभा के सदस्यों की बैठक हुई थी। इसमें तिरंगे को देश के राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर अंगीकार किया गया था। इसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा आजाद भारत के लिए एक झंडे का प्रस्ताव रखा गया था। इस प्रस्ताव पर गहन चर्चा हुई और फैसला लिया गया कि केसरिया, सफेद और हरे रंग वाले झंडे को ही कुछ बदलावों के साथ आजाद भारत का झंडा बनाया जाये।

पंडित नेहरु ने संविधान सभा में क्या कहा था?

झंडे को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव संविधान सभा में प्रस्ताव रखा था। उन्होंने कहा था कि यह प्रस्ताव पेश करना मेरे लिए गौरव की बात है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज 'तिरंगा' होगा। जो गहरा केसर (केसरी), सफेद और गहरा हरा समान अनुपात में होगा। वहीं केंद्र में सफेद बैंड का प्रतिनिधित्व करने के लिए नेवी ब्लू रंग में एक पहिया (चक्र) होगा, जो चरखा की जगह लेगा। चक्र की आकृति उस चक्र के समान होगी, जो सारनाथ के अशोक कालीन सिंह स्तूप के शीर्ष भाग पर स्थित है। चक्र का व्यास सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होगा। राष्ट्रीय झंडे की चौड़ाई और लंबाई का अनुपात साधारणतः 2:3 होगा।

पंडित नेहरू ने कहा कि झंडे का रंग वही है जो पहले था लेकिन इसमें चरखे की जगह चक्र लाया गया क्योंकि जैसा कि पहले इस ध्वज पर चरखा दिखाई देता था। तिरंगे में जब आप चरखा को देखते हैं तो वो सही दिखता है लेकिन जब आप उसे दूसरी तरफ से देखते हैं तो चरख पलट जाता है। कुछ इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि चरखे में एक तरफ पहिया है तो दूसरी धुरी होती है। लेकिन, जब आप दूसरी तरफ से झंडे को देखते हैं तब धुरी पहले दिखती है और पहिया दूसरी तरफ नजर आता है। यह आनुपातिक नहीं है, क्योंकि पहिया ध्रुव की ओर होना चाहिए, ध्वज के अंत की ओर नहीं। साथ ही चरखे की तकली और डोरी भी भ्रम पैदा करती है।

सम्राट अशोक का नेहरू ने किया जिक्र

पंडित नेहरू ने संविधान सभा में कहा कि मैंने अशोक का उल्लेख किया क्योंकि भारतीय इतिहास में अशोक का काल वास्तव में इतिहास का अंतरराष्ट्रीय काल था। यह वह काल था जब भारतीय राजदूत सुदूर विदेशों में गये। साम्राज्य और साम्राज्यवाद के रूप में नहीं, बल्कि शान्ति, सदाचरण और शुभकामना का संदेश लेकर। इसलिए जिस झंडे को आपको भेंट करने का सम्मान मुझे प्राप्त हुआ है। वह झंडा साम्राज्य का, साम्राज्यवाद का, किसी व्यक्ति पर आधिपत्य जमाने का नहीं है, बल्कि वह एक स्वतंत्रता का झंडा है और वह केवल हमारी स्वतंत्रता का नहीं बल्कि उन सभी मनुष्यों का है। जो भी इसे देखें उनकी स्वतंत्रता का चिन्ह है। दुनिया में जहां भी भारतवासी रह रहे हैं जहां यह झंडा पहुंचे, मैं आशा करता हूं कि उन लोगों को यह स्वतंत्रता का संदेश देगा। मित्रता का संदेश देगा और यह संदेश देगा कि भारत संसार के प्रत्येक देश से मैत्रीपूर्ण संबंध रखना चाहता है। जो भी लोग स्वतंत्रता चाहते हैं, उनकी सहायता करना चाहता है।

'चक्र में स्वस्तिक होना चाहिए था'

हालांकि, जब पंडित नेहरू ने इस झंडे का प्रस्ताव रखा और सबको झंडा दिखाया, तब संविधान सभा के किसी सदस्य ने इसका खुलकर विरोध नहीं किया। लेकिन, एच. वी. कामथ चाहते थे कि वह चक्र के अंदर सफेद पट्टी के बीच में स्वस्तिक, द शांतम, शिवम, सुंदरम के प्राचीन भारतीय प्रतीक अंकित किये जाये। हालांकि, उन्होंने संविधान सभा के बहस पटल पर कहा कि यह संशोधन मैंने तब भेजा था, जब मैंने झंडे का डिजाइन नहीं देखा था। उन्होंने कहा कि मैंने अब झंडा देखा है और मुझे लगता है कि स्वस्तिक को इस चक्र में फिट करना कठिन है। स्वस्तिक की वजह से चक्र का डिजाइन बोझिल लगने लगेगा। इसलिए हमें चक्र से कोई आपत्ति नहीं है।

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