Jet Engine: अमेरिका से मिली क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन तकनीक से भारत को क्या फायदा होगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान रक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में कई समझौते हुए हैं। इन समझौतों के तहत भारत में अब फाइटर जेट्स के क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन बनाये जायेंगे। इस इंजन को एफ-414 के नाम से जाना जाता है।

यह इंजन अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस और हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड मिलकर बनायेंगे। जोकि मुख्य रूप से भारतीय लड़ाकू विमान (LCA)-MK-2 तेजस में इस्तेमाल होंगे।

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हल्के लड़ाकू जहाजों के लिये क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन बनाने की कोशिशें भारत कर चुका हैं। मगर इसमें खास सफलता नहीं मिल पायी है। इसलिए यह तकनीक भारत को रक्षा की दुनिया में ताकतवर बनायेगी। गौरतलब है कि एफ-414 इंजन का इस्तेमाल करने का लाइसेंस अभी तक सिर्फ 8 देशों के पास है। जिसमें अमेरिका और भारत सहित स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, कुवैत, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं।

कावेरी इंजन का क्रमिक विकास
दिसंबर 1986 बेंगलुरु में डीआरडीओ ने गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने मल्टी-रोल लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी हल्के लड़ाकू विमान (LCA) के लिए स्वदेशी कावेरी इंजन बनाना शुरू किया था। टर्बाइन इंजन को जेट विमान का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना जाता है जिसके बिना विमान आसमान तक नहीं जा सकता।

साल 1999 तक कई गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट ने 9 प्रोटोटाइप कावेरी इंजनों के साथ-साथ 4 कोर इंजन बनाये, जिसका नाम काबिनी था। भारत के साथ-साथ ही दूसरे देशों में भी इनके परिक्षण किये गये, लेकिन ये इंजन जरूरी पैरामीटर पर खरे नहीं उतरे। इससे बाद कावेरी पर रिसर्च का काम धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

साल 2008 और 2010 में इन इंजनों के फिर से परिक्षण रूस में किये गये। कावेरी प्रोटोटाइप (K-9) का मॉस्को के ग्रोमोव फ्लाइट रिसर्च इंस्टीट्यूट में सफल परीक्षण हुआ। तब यह इंजन 6 किमी की ऊंचाई पर एक घंटे तक हवा में रहा। मगर फिर भी यह सफलता आंशिक थी। साल 2011 में जारी सीएजी रिपोर्ट में बताया गया कि इंजन का वजन अधिक है और कंप्रेसर, टर्बाइन सहित इंजन-नियंत्रण प्रणाली विकसित करने की दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई। इसके बाद कावेरी परियोजना अंततः बंद होने की कगार पर पहुंच गयी।

इसके बाद फ्रांस से जब डसॉल्ट राफेल की बातचीत आगे बढ़ी तो उसने कावेरी इंजन कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव दिया। डीआरडीओ ने साल 2018 में इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके तहत 2022 तक, फ्रांस से भारत में एम-88 इंजन प्रौद्योगिकी के महत्वपूर्ण हस्तांतरण के साथ प्रोटोटाइप के पहले बैच को अपग्रेड करने की योजना है ताकि कावेरी को उड़ान योग्य बनाया जा सके और तेजस पीवी-1 (प्रोटोटाइप वाहन -1) विमान में उपयोग कर सके। इंजन का आकलन करने वाले फ्रांसीसी विशेषज्ञों का कहना है कि इंजन को उड़ाने लायक बनाने के लिए 25-30 प्रतिशत अधिक काम करने की जरूरत है। कावेरी को अभी विकसित होने में समय लगेगा, इसलिए अमेरिका से मिली तकनीक फिलहाल भारत की जरूरतों को पूरा कर सकेगी।

GE-F414 की खासियत
GE-F414 एक मिलिट्री एयरक्राफ्ट इंजन है। जिसे अमेरिका में 30 सालों से इस्तेमाल किया जा रहा है। जीई एयरोस्पेस के मुताबिक कंपनी अब तक 1600 से अधिक इंजन डिलीवर कर चुकी हैं। यह इंजन 5 मिलियन से अधिक घंटों की उड़ान पूरी कर चुके हैं। यह इंजन इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें फुल अथाॉरिटी डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल FADEC सिस्टम लगा हुआ है। इसके अलावा इसमें लेटेस्ट एयरक्राफ्ट इग्नीशन सिस्टम भी मौजूद है। ये तकनीकें इंजन को न सिर्फ पावरफुल बल्कि अधिक भरोसेमंद भी बनाती हैं।

भारत का भविष्य टिका है इस तकनीक पर
तेजस जैसे हल्के स्वदेशी लड़ाकू विमानों के इंजन बनाने की तकनीक पर भारत 1980 से काम कर रहा है लेकिन अभीतक सफल नहीं हो सका है। अब अमेरिका से मिली यह तकनीक तेजस जैसे विमानों में इस्तेमाल हो सकेगी। साथ ही भारत जगुआर, मिग-29 और मिराज 2000 जैसे पुराने फाइटर जेट्स को जल्दी सेवामुक्त करना चाहता है। इसलिए नये और अत्याधुनिक विमानों के निर्माण की तैयारी पहले से ही शुरू करनी होगी। भारत में बनने वाले F-414 जेट इंजनों को एलसीए मार्क-2 के अलावा पांचवीं पीढ़ी के उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (एएमसीए) में भी लगाये जाने की योजना है।

सुपर लीग में शामिल होगा भारत
इस डील से फाइटर जेट्स के इंजन के मामले में भारत की निर्भरता दूसरे देशों पर कम होगी। दरअसल, अमेरिका ने इंजन की तकनीक हस्तांतरण पर रोक लगा रखी थी। ऐसे में भारत को न सिर्फ मौजूदा तकनीक मिलेगी बल्कि भविष्य में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण (टीओटी) और बढ़ने की उम्मीद है। घरेलू लेवल पर बनने से इनकी लागत भी कम होगी। जिसकी वजह से इनका निर्यात करना भी आसान हो जायेगा। इस हस्तांतरण के साथ-साथ फाइटर जेट्स में लगने वाले कई कलपुर्जे भी भारत में बनाये जाएंगे।

अभीतक इस तरह के इंजन सिर्फ अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस में ही बनते थे। यानी दुनियाभर में इस तकनीक के साथ उड़ रहे सभी फाइटर जेट्स में इन्हीं देशों में बने इंजन लगे हैं। अब भारत भी इन देशों की लिस्ट में शामिल हो जायेगा।

चीन से मुकाबला और रूस पर निर्भरता कम
अमेरिका के स्वतंत्र थिंकटैंक, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के रिचर्ड रोसो के अनुसार भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जो वास्तव में चीन के सामने खड़ा होकर लड़ रहा है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि वह चीन जैसे देश के साथ अकेले लड़ाई जीत नहीं पाएगा।

अमेरिका भारत के साथ सौदा करके रूस पर भारत की निर्भरता कम करना चाहता है। वर्तमान में भारत अपनी लगभग आधी सैन्य आपूर्ति के लिए रूस पर निर्भर है। भारत दशकों से लड़ाकू जेट, टैंक, परमाणु पनडुब्बियां रूस से खरीदता आया है। हालांकि, अमेरिका, फ्रांस और इजराइल जैसे अन्य देशों के कारण रूस से धीरे-धीरे भारत की निर्भरता कम भी हुई है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के मुताबिक साल 2017 तक भारत अपने कुल हथियारों का 62 प्रतिशत रूस से खरीदता था। यह आयात साल 2022 तक घटकर 45 प्रतिशत ही रह गया है। वहीं रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिका से नई दिल्ली की सैन्य खरीद 2008 में लगभग शून्य से बढ़कर 2020 में ₹20 बिलियन डॉलर हो गयी है।

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