बुलंदशहर की महविश के लिये नासूर बनी लव मैरेज
लखनऊ (सुयश मिश्रा)। देश के विभिन्न राज्यों में आज भी कला और संस्कृत के रंग बिरंगे पर्दों के पीछे खाप पंचायतों की शक्ल में क्रूर कितयां कार्यरत हैं। ग्रामीण इलाकों में सक्रिय ये पंचायतें अपनी झूठी शान-ओ-शौकत की खातिर किसी को भी मौत का फरमान सुनाने में भी गुरेज़ नहीं करतीं। बात जब सम्मान पर आती है तो इंसानियत व मानवता का इनके लिए कोर्इ मोल नहीं रहता। इन्हीं पंचायतों की शिकार हुर्इ उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में रहने वाली महविश।
भारतीय जनवादी महिला समिति द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में लखनऊ आर्इ महविश ने मंच पर पहुंच कर जब अपना दर्द सुनाया तो सभी की आखों में आंसू आ गए। प्रेम विवाह करने की इतनी बड़ी सज़ा उसे मिली जो ताउम्र उसके लिए नासूर बन गर्इ है।
कहानी शुरू होती है बुलन्दशहर के अड़ौली गांव से जहां अक्टूबर 2010 को अब्दुल हकीम को महविश नाम की युवती से प्रेम हो गया। युवती एक ओझा थी पर अब्दुल फकीर विरादरी से था। दोनों ने भागकर कोर्ट में शादी कर ली और दिल्ली में रहने लगे। पर महविश के घर वालों को यह रास नहीं आया और अगले ही दिन खाप पंचायत बुलार्इ गर्इ। पंचायत ने अपना तालिबानी फरमान सुनाते हुए अब्दुल को मौत की सज़ा मुकररर कर दी। साथ ही यह घोषणा भी कर दी कि जो भी उसे मारेगा उसे 6 हजार का इनाम दिया जायेगा। हकीम पर अपहरण का केस भी दायर करा दिया गया।
आमिर खान के चर्चित शो सत्यमेव जयते में अब्दुल और महविश प्रेम विवाह और खाप पंचायत विषय पर आयोजित कार्यक्रम में नज़र आये थे। उसके बाद से वे वापस बुलन्दशहर आकर रह रहे थे। पर उनकी मुसीबतें अभी थमी न थी महविश के घर वाले उसके घर में गुंडे भेजते उसे धमकाते थे। पर सरकारी सुरक्षा व्यवस्था होने के कारण वे भाग जाते थे। महविश के अनुसार 22 नवम्बर 2012 को हकीम दवार्इ लेने के लिए बाजार गया था।
तभी उसे पांच लोगों ने गोलियों से छलनी कर दिया और उस नृशंस हत्याकाण्ड में महविश ने अपना सबकुछ गवा दिया। आज भी वह समस्याओं से गुज़र रही है। पंचायतों ने उसे व उसके परिवार वालों को गांव छोड़ने का आदेश ज़ारी कर दिया है। पर पुलिस का लचर रवैया आज भी कायम है। उसकी माने तो मौत का भय बना रहता है। घर से बाहर निकलना मुशिकल हो गया है।

क्या आप इसे आनर किलिंग मानती हैं?
उ. मैने कोर्इ गलत काम तो नही किया था। बस नीची जाति में खाप पंचायतों के विरूद्ध शादी ही तो की थी और इसकी सज़ा मुझे अपने पती की मौत से चुकानी पड़ी। सम्मान के खातिर घर व गांव वालों ने मेरी पती की हत्या कर दी। क्योंकि उन्हें यह मंजूर न था कि उनकी बेटी किसी नीचे घराने की बहू बने।

इस पूरे प्रकरण में पुलिस का क्या रवैया रहा?
उ. पुलिस शुरूवात से मामले को टालने में लगी रही है, पर मीडि़या के दबाव के कारण वह बस बाहरी दिखावा करती नज़र आर्इ। मेरी पती की हत्या को आज भी पुलिस आनर किलिंग नही मांनती। स्थानीय पुलिस ने मेरे ससुराल वालों से मुकदमा वापस लेने के लिए दबाव बनाती रही है।

खाप पंचायतों के लिए आप क्या कहना चाहती हैं?
उ. ये इंसान नहीं है बस उनकी शक्लें हैं। जो इस समाज के लिए यह एक अभिशाप बनी हुर्इ हैं। जिन्हें इंसानियत से कोर्इ वास्ता नही। बस ये अपनी ताकत दिखाने के लिए झूठी शान व सम्मान की दुहार्इ देते हैं। वास्तव में इनका समाज से कोर्इ लेना देना नही है।

अब आप क्या चाहती हैं?
उ. मुझे इंसाफ चाहिए! हर उस इंसान से जो इसमें शामिल था उसे सज़ा मिलनी चाहिए। जिसमें दोबारा कभी ये ऐसी क्रूरता करने की जुररत न करेंं आज भी कुछ लोग है जो इसमें शामिल थे वे आज़ाद घूम रहे।

क्या सिथतियां हैं आपके गांव की?
उ. मेरे पती को मारने के बाद पंचायत ने मुझे व मेरे घरवालों को गांव से बाहर जाने के आदेश दे दिये हैं। वह हमें धमकाते हैं गांव से निकल जाने को कहते है अगर मैने ऐसा न किया तो मारडालने की धमकिया भी देते हैं।

आपके एक बेटी है और कमाने वाला कोर्इ नही कैसे गृहस्ती चलती है?
उ. पती की मौत के बाद दो वक्त की रोटी भी सकून से नही मिल पाती। एक तो गांव वालों के डर से काम के लिए बाहर भी नही जा सकती। मेरे ससुराल वाले मदद करते हैं। यदि वे मदद न दे तो रोटियां नसीब नही होंगी।












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