Muharram: मोहर्रम का ऐतिहासिक महत्व, जानें क्यों निकाले जाते हैं ताजिये

यौम-ए-आशूरा यानि मोहर्रम के 10वें दिन को मातम का दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करीब 1400 साल पहले मुहर्रम के 10वें दिन पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी।

कर्बला की जंग में उन्होंने इस्लाम की रक्षा के लिए अपने परिवार और 72 साथियों के सा​थ शहादत दी। यह जंग इराक के कर्बला में यजीद की सेना और हजरत इमाम हुसैन के बीच हुई थी।

Historical importance of Muharram

कर्बला के मैदान में शहीद हो गये थे हजरत इमाम हुसैन
इस्लाम धर्म की मान्यता के मुताबिक, हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ मोहर्रम माह के 10वें दिन कर्बला के मैदान में शहीद हो गये थे। उनकी शहादत और कुर्बानी के तौर पर इस दिन को याद किया जाता है। कहा जाता है कि इस्लाम के पांचवे खलीफा मुआविया का बेटा यजीद वंशानुगत आधार पर खलीफा बना। यजीद चाहता था कि हजरत अली के बेटे इमाम हुसैन भी उसके खेमे में शामिल हो जाएं। हालांकि इमाम हुसैन को यह मंजूर न था। उन्होंने यजीद के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। इस जंग में वह अपने बेटे, घरवाले और अन्य साथियों के साथ शहीद हो गये।

युद्ध के दौरान 6 माह के अली असगर ने प्यास से दम तोड़ा
युद्ध के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया तब सिर्फ हुसैन अकेले रह गये, लेकिन तभी अचानक उनके खेमे में शोर सुनाई दिया। उनका छह महीने का बेटा अली असगर प्यास से बेहाल था। हुसैन उसे हाथों में उठाकर मैदान-ए-कर्बला में ले आये। उन्होंने यजीद की फौज से बेटे को पानी पिलाने के लिए कहा, लेकिन फौज नहीं मानी और बेटे ने हुसैन के हाथों में तड़प कर दम तोड़ दिया। इसके बाद भूखे-प्यासे हजरत इमाम हुसैन का भी कत्ल कर दिया। इसे आशुर यानी मातम का दिन कहा जाता है। इराक की राजधानी बगदाद के दक्षिण पश्चिम के कर्बला में इमाम हुसैन और इमाम अब्बास के तीर्थ स्थल हैं।

हजरत मुहम्मद साहब के नवासे थे हजरत इमाम हुसैन
हजरत इमाम हुसैन पैगंबर मोहम्मद के नवासे थे। इमाम हुसैन के वालिद यानी पिता का नाम हजरत अली था, जो कि पैगंबर साहब के दामाद थे। इमाम हुसैन की मां बीबी फातिमा थीं। हजरत अली मुसलमानों के धार्मिक-सामाजिक और राजनीतिक मुखिया थे। उन्हें खलीफा बनाया गया था। कहा जाता है कि हजरत अली की हत्या के बाद लोग इमाम हुसैन को खलीफा बनाना चाहते थे लेकिन हजरत अमीर मुआविया ने खिलाफत पर कब्जा कर लिया। मुआविया के बाद उनके बेटे यजीद ने खिलाफत अपना ली। यजीद क्रूर शासक था। उसे इमाम हुसैन का डर था। यजीद के खिलाफ इमाम हुसैन ने कर्बला की जंग लड़ी और शहीद हो गए।

मुसलमान रोजा-नमाज के साथ ताजियों को करते हैं दफन
इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुसार करीब 1400 साल पहले आशूरा के दिन कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन का सिर कलम कर दिया गया था। तभी से उनकी याद में इस दिन जुलूस और ताजिया निकालने की रिवायत है। अशुरा के दिन तैमूरी रिवायत को मानने वाले मुसलमान रोजा-नमाज के साथ इस दिन ताजियों को दफन या ठंडा कर शोक मनाते हैं। मुहर्रम की दसवीं तारीख को यौम-ए-आशूरा मनाया जाता है। मोहर्रम की शुरुआत 20 जुलाई से हुई है। ऐसे में आशूरा 29 जुलाई को मनाया जाएगा।

शिया समुदाय के लोग निकालते हैं ताजिया
आशूरा के दिन शिया समुदाय के लोग ताजिया निकालते हैं और मातम मनाते हैं। इराक में हजरत इमाम हुसैन का मकबरा है, उसी मकबरे की तरह का ताजिया बनाया जाता है और जुलूस निकाला जाता है। आशूरा इस्लाम धर्म का कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है, जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं। मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म में शोक के रूप में जाना जाता है। इस महीने में उत्सव नहीं होता है। इमाम हुसैन की शहादत पर शोक व्यक्त करते हुए शिया मुस्लिम काले कपड़े पहनकर जुलूस निकालते हैं। इस दिन को कुर्बानी के रूप में याद किया जाता है, साथ ही इस दिन ताजिया निकाले जाते हैं।

इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है मोहर्रम
मोहर्रम का महीना इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। यह महीना इस्लाम धर्म में शिया और सुन्नी मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम इस साल 20 जुलाई 2023, गुरुवार से शुरू हो गया। वहीं मुहर्रम की 10वीं तारीख यौम-ए-आशूरा के नाम से जानी जाती है। यह इस्लाम का प्रमुख दिन है। आशूरा मातम का दिन होता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय मातम मनाता है।

तैमूर ने पहली बार किया था ताजिया का निर्माण
एशिया और हिंदुस्तान में ताजियादारी या ताजिया रखने का इतिहास तैमूर के काल से जुड़ा है, जिसने 1398 ईस्वी में भारत पर आक्रमण किया था। कर्बला की तीर्थयात्रा से समरकंद लौटने पर तैमूर ने पहली बार ताज़िया का निर्माण किया। मूल रूप से ताज़िया इमाम हुसैन के मकबरे की प्रतिकृति है, और कई रूपों और आकारों में बनाई जाती है। ताज़िया शब्द अरबी शब्द अज़ा से लिया गया है जिसका अर्थ है मृतकों का स्मरण करना।

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