Himachal Day: जानें हिमाचल प्रदेश के पहनावे, भोजन, बोलियों, और लोक नृत्य के बारे में
आज हिमाचल के गठन को 75 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत जैसे पहनावा, खानपान, लोक नृत्य, धार्मिक महत्व पूरे देश और विश्व में अलग पहचान रखती है।

Himachal Day: 15 अप्रैल 1948 को छोटी-छोटी रियासतों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ था। हिमाचल प्रदेश के गठन के समय केंद्र सरकार ने एनसी मेहता को हिमाचल प्रदेश का प्रथम चीफ कमिश्नर नियुक्त किया था। चीफ कमिश्नर के परामर्श के लिए एक सलाहकार परिषद का भी गठन किया गया। वहीं हिमाचल के गठन को 75 वर्ष पूरे होने पर लाहौल स्पीति जिले के काजा में पहली बार राज्यस्तरीय हिमाचल दिवस कार्यक्रम होने जा रहा है। सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस बारे में बताया कि जनजातीय क्षेत्रों के लोग हर त्याेहार, उत्सव को नयी उमंग से मनाते हैं। वहीं उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री नाहन में आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करेंगे।
हिमाचल प्रदेश की विभिन्न सांस्कृतिक विरासतें जैसे पहनावा, खानापीना, लोक नृत्य, धार्मिक महत्व पूरे देश और विश्व में अलग पहचान रखती हैं। आज हिमाचल दिवस के मौके पर हम आपको इन्हीं सांस्कृतिक विरासतों के बारे में अवगत करवाएंगे।
विभिन्न जिलों का अपना अलग पहनावा
हिमाचल प्रदेश का चप्पा-चप्पा अपनी एक अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है। हर जिले के लोगों का अपना एक अलग पहनावा है। दरअसल, हिमाचल प्रदेश में भौगोलिक विभिन्नताओं के अनुरूप वहां की वेशभूषा भी है। जैसे चंबा के ऊपरी क्षेत्रों में लोग चोला डोरा नामक पहनावा पहनते हैं। वहीं इसके साथ आभूषणों में चौंक, चिड़ी, मांग टिक्का, लौंग, झुमके, चंद्र हार, तिल्ली का प्रयोग किया जाता है।
जबकि जिला कांगड़ा में शादी समारोह में घघरी पहनने का रिवाज है। अगर जिला कुल्लू की बात करें तो यहां पुरुषों का प्राचीन पहनावा चोला, टोपी और सुथन रहा हैं। महिलाएं सिर पर ढाठू का प्रयोग करती है। यह एक चौकोर रूमाल होता है, इसके साथ ही महिलाएं वस्त्रों के साथ पट्टू लगाती हैं।
ऐसे ही लाहुल स्पिति में पुरुषों का पुराना पहनावा चुब (एक लंबा कोट), कुर्ता, वास्केट, पजामा और टोपी हैं। महिलाएं गोंपा, चूड़ीदार पजामी, सिर पर रूमाल बांधती हैं। शिमला जिला के लोग 'बुशैहरी टोपी' और कोटनुमा 'लोइया' पहनते हैं।
हिमाचल की बोलियां
हिमाचल की पहाड़ी भाषा की लिपि टांकरी है। हिमाचल में 88.77 प्रतिशत लोग (पहाड़ी) बोलते हैं। जबकि जो इलाके पंजाब के साथ लगते हैं, वहां 5.83 प्रतिशत लोग पंजाबी बोलते हैं। राज्य के जिले अनुसार पहाड़ी बोली देखें तो चंबा जिले में चंम्बयाली बोली जाती है। हालांकि, चंबा जिले में स्थानीय बोलियां भी बोली जाती हैं जिनमें भटियाली, चुराही, पंगवाली और भरमौरी शामिल हैं।
इसके साथ ही बिलासपुर जिले में मुख्य बोली कहलूरी है। सिरमौर जिले की प्रमुख स्थानीय बोलियां बिशवाई और धारटी हैं। मंडी जिले में मण्डयाली, सरघाटी, सुकेती और बालडी बोली जाती हैं। कुल्लू की स्थानीय बोली सीराजी और सैजी हैं। किन्नौर जिले की प्रमुख बोलियां छितकुली, होमस्कंद, शुम्को और सुनामी हैं। सोलन में महासुवी उपभाषा बोली जाती है। यहां की स्थानीय बोलियां भगाटी, हांडूरी और क्योंथली हैं। लाहौल में लाहौली बोली जाती है और स्पीति में तिब्बती बोली जाती है।
हिमाचल प्रदेश का पारंपरिक भोजन
हिमाचल प्रदेश के खानपान की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी तारीफ कर चुके हैं। 10 मई 2019 को मंडी जिला में एक संबोधन के दौरान उन्होंने मंडी के 'सेपू बड़ी' नामक व्यंजन का जिक्र किया था। वहीं एक बार सोलन पहुंचने पर वह मशरूम का जिक्र करना नहीं भूले। आपको बता दें कि हिमाचल के अलग अलग जिलों में अलग अलग तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं।
जिला चंबा का मदरा और खट्टा बहुत प्रसिद्ध है, तो कांगड़ा जिला में कांगड़ी धाम नाम का एक पारंपरिक भोजन है। 'धाम' यानी पंगत में लोग जमीन पर बैठ कर लगभग 7 से 8 व्यंजनों का आनंद लेते हैं। वहीं कुल्लू में सिड्डू (एक प्रकार का मोमोज जैसा व्यंजन) फेमबड़ा, घांगड़ी, बोड़े, बबरू और राजमा चावल प्रसिद्ध हैं। जबकि लाहौल और स्पीति का मुख्य भोजन स्थानीय रूप से कथू के रूप में जाना जाता है।
देवभूमि के प्रसिद्ध लोक नृत्य और धार्मिक महत्व
हिमाचल प्रदेश का लोक नृत्य नाटी है। कुल्लू का नाटी सबसे अधिक लोकप्रिय है। यह नृत्य गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चुका है। इसके साथ ही शिमला और किन्नौरी नाटी भी प्रसिद्ध है। नाटी एक ऐसा पहाड़ी नृत्य है जिसमें सभी एक दूसरे का हाथ पकड़कर, पैर आगे पीछे करते हुए गीतों की लय के अनुसार नाचते हैं। इसके साथ ही पंजाब के साथ लगते क्षेत्रों में गिद्दा और भांगड़ा भी प्रचलित हैं।
वहीं अगर धार्मिक महत्व की बात करें तो हिमाचल प्रदेश में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं। जिनमें मंडी का महाशिवरात्रि मेला, कुल्लू का दशहरा, सिरमौर की बूढ़ी दिवाली, चंबा का मिंजर मेला, कांगड़ा और चंबा व अन्य जिलों के छिंज मेले प्रसिद्ध हैं।
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