Gorakhpur Seat: मठ से तय होती गोरखपुर की राजनीति, जानें इसका सियासी इतिहास
Gorakhpur Seat: पूर्वांचल की सबसे प्रभावशाली लोकसभा सीट है गोरखपुर जहां की राजनीति एक मठ से तय होती है। जी हां! गोरखपुर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके में आती है। इस लोकसभा सीट पर गोरक्षपीठ (गोरखनाथ मंदिर) का दबदबा माना जाता है। वर्तमान में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ इस सीट से 5 बार सांसद रह चुके हैं और वे गोरक्षपीठ के महंत भी हैं।
वर्तमान में यहां के सांसद बीजेपी नेता व भोजपुरी अभिनेता रवि किशन हैं। 2024 लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने एक बार फिर से रवींद्र श्याम नारायण शुक्ला उर्फ रवि किशन पर ही दांव खेला है। जबकि दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने टेलीविजन अभिनेत्री काजल निषाद को अपना उम्मीदवार बनाया है। दरअसल इंडिया गठबंधन में ये सीट सपा के खाते में गई है। जबकि बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी जावेद सिमनानी को मैदान में उतारा है।

गोरखपुर लोकसभा का सियासी इतिहास
उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में से एक गोरखपुर सीट पर पिछले 34 सालों से बीजेपी की सत्ता (केवल 2018-19 को छोड़कर, जब उपचुनाव में सपा ने जीत हासिल की) रही है। इस लोकसभा सीट का सियासी इतिहास भी बेहद दिलचस्प रहा है।
आजादी के बाद से गोरखपुर लोकसभा सीट पर 19 बार (2 उपचुनाव समेत) वोट डाले जा चुके हैं। जिसमें 6 बार कांग्रेस, 8 बार बीजेपी, 2 बार निर्दलीय, 1-1 बार जनता पार्टी, हिंदू महासभा और समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की है। ये लोकसभा सीट आज की तारीख में हॉट सीट इसलिए कही जाती है क्योंकि इस संसदीय क्षेत्र की राजनीतिक धुरी गोरखनाथ मठ है।
गोरखपुर के बारे में कहा जाता है कि यहां जिस पार्टी का उम्मीदवार जीतता है उसका प्रभाव आसपास की कई लोकसभा सीटों पर भी पड़ता है। गोरखपुर यूपी का एक धार्मिक महत्व वाला शहर है। विश्व प्रसिद्ध गीता प्रेस, गीता वाटिका के साथ टेराकोटा शिल्प के लिए गोरखपुर मशहूर है। इसके साथ ही इसे साहित्यकारों का भी शहर कहा जाता है। गोरखपुर कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कर्मस्थली रही है तो मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी का गृह जिला भी है। महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत स्थली के रूप में भी गोरखपुर को जाना जाता है।
गोरखपुर लोकसभा सीट के तहत कुल पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इन विधानसभा सीटों के नाम हैं कैंपियरगंज, पिपराइच, गोरखपुर शहरी, गोरखपुर ग्रामीण और सहजनवा। साल 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पांचों सीटों पर जीत दर्ज की थी।
कौन बना था गोरखपुर का पहला सांसद?
आजादी के बाद साल 1951-52 में जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ तब गोरखपुर जिले की स्थिति कुछ और थी। क्योंकि, वर्तमान में जो गोरखपुर लोकसभा सीट है, उसे गोरखपुर दक्षिण सीट के नाम से जाना जाता था। पहले लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस उम्मीदवार सिंहासन सिंह को जीत मिली थी।
पहले आम चुनाव में ही गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर मंहत दिग्विजयनाथ चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 1957 के चुनाव में दिग्विजयनाथ चुनाव से दूर रहे, इस चुनाव में गोरखपुर सीट से दो सांसद चुने गए थे। जिसमें सिंहासन सिंह दूसरी बार सांसद बने और दूसरी सीट से कांग्रेस के महादेव प्रसाद चुनाव जीते थे।
इसके बाद साल 1962 के लोकसभा चुनाव में गोरखनाथ मठ के महंत दिग्विजय नाथ पहली बार किसी पार्टी (हिंदू महासभा) के टिकट पर मैदान में उतरे थे। हालांकि, तब उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार सिंहासन सिंह ने 3260 वोटों से हरा दिया था। इसी के साथ सिंहासन सिंह ने तीसरी बार इस सीट पर जीत दर्ज की थी। महंत दिग्विजय नाथ चुनाव तो नहीं जीत पाए, लेकिन एक अलग सियासी चर्चा जरूर शुरू हो गई। जिसका असर 1967 के चुनाव में देखने को मिला।
पहली बार एक महंत बने सांसद
साल 1967 के लोकसभा चुनाव में महंत दिग्विजय नाथ ने निर्दलीय ही ताल ठोका और कांग्रेस उम्मीदवार एस एल सक्सेना को 42,715 वोटों से हराकर पहली बार संसद पहुंचे। हालांकि, सांसद बनने के महज दो साल बाद (1969) ही वह ब्रह्मलीन हो गए। अब बारी उपचुनाव की थी।
साल 1970 के उपचुनाव में गोरक्षनाथ मठ के अगले उत्तराधिकारी महंत अवैद्यनाथ ने इस सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया और गोरखपुर संसदीय सीट पर मठ का कब्जा बरकरार रखा। हालांकि, अगले आम चुनाव 1971 में कांग्रेस ने इस सीट से नरसिंह नारायण पांडेय को उतारा और महंत अवैद्यनाथ निर्दलीय मैदान में उतरे। इस बार महंत अवैधनाथ को 37,578 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
आपातकाल के बाद गोरखपुर में बदली सत्ता
इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के बाद गोरखपुर की जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। साल 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी से हरिकेश बहादुर और कांग्रेस के नरसिंह नारायण पांडेय के बीच मुकाबला हुआ। महंत अवैद्यनाथ इस चुनाव में नहीं उतरे थे। इस चुनाव में हरिकेश बहादुर चुनाव जीत गए, लेकिन साल 1980 के चुनाव से पहले हरिकेश बहादुर कांग्रेस में शामिल हो गए और इस चुनाव में भी वह सांसद चुने गए।
इसके बाद साल 1984 का वक्त आया। इस लोकसभा चुनाव से पहले हरिकेश ने फिर पलटी मारी और अब वे लोकदल में शामिल हो गए, लेकिन इस बार वह चुनाव हार गए और कांग्रेस के मदन पांडेय यहां से जीतकर सांसद बने।
1989 से गोरखपुर संसदीय सीट पर है 'मठ का राज'
साल 1989 के लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे देश में राम मंदिर की लहर थी। गोरखपुर और गोरक्षपीठ मठ भी इससे अछूता नहीं रहा। इस दौरान गोरक्षनाथ पीठ के महंत अवैद्यनाथ की लंबे वक्त बाद राजनीति में वापसी हुई और वे हिन्दू महासभा के टिकट पर मैदान में उतरे। उन्होंने जनता दल के रामपाल सिंह को 45,837 वोटों के अंतर से हराकर दूसरी बार संसद की सदस्यता ली।
इसके बाद 1991 में फिर से चुनाव हुए और महंत अवैद्यनाथ इस बार बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरे। तब वे जनता दल के शारदा प्रसाद रावत को 91,359 वोटों के अंतर से हराकर तीसरी बार सांसद बने। इसी तरह 1996 के चुनाव में भी बीजेपी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया और वह विजयी हुए।
1998 में हुई योगी आदित्यनाथ की राजनीति में एंट्री
साल 1998 के लोकसभा चुनाव में महंत अवैद्यनाथ ने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को अपने बदले बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़वाया। तब योगी आदित्यनाथ महज 26 साल के थे। इस चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के जमुना प्रसाद निषाद को 26,206 वोटों के अंतर से हराया और पहली बार संसद में पहुंचे। इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1999, 2004, 2009 और 2014 में लगातार पांच बार गोरखपुर से सांसद निर्वाचित होते रहे।
लेकिन, पासा पलटा साल 2017 में जब बीजेपी ने उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। तब योगी आदित्यनाथ ने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद साल 2018 में उपचुनाव हुआ और समाजवादी पार्टी के प्रवीण निषाद ने बीजेपी उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ला को करीब 21 हजार वोटों के अंतर से हराकर बीजेपी के 22 सालों से जीत के सिलसिले को तोड़ दिया।
2019 में फिर हुआ बीजेपी का कब्जा
इसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने भोजपुरी अभिनेता रवि किशन को मैदान में उतारा। रवि किशन इस चुनाव में 60.54% वोट पाकर (7,17,122 वोट) अपने निकट प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी के रामभुआल निषाद को 3,01,664 वोटों के अंतर से हराकर बंपर जीत हासिल की और संसद पहुंचे। राम निषाद को 415458 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के मधुसूदन त्रिपाठी 22972 वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे।
गोरखपुर सीट का जातीय समीकरण
रिपोर्ट के मुताबिक गोरखपुर लोकसभा सीट में कुल 20,74,745 वोटर हैं। इनमें 11,12,023 पुरुष जबकि महिला वोटरों की संख्या 9,62,531 हैं। वैसे जातीय समीकरण देखें तो यहां की राजनीति ब्राह्मण और ठाकुर के खेमे में बंटी हुई है। वैसे ओबीसी और दलितों का भी मतदान यहां की राजनीति का रंग बदल सकता है।
गोरखपुर लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा निषाद जाति के करीब 4 लाख वोट हैं। इसके बाद यादव और दलित 2-2 लाख हैं। डेढ़ लाख के करीब मु्स्लिम वोटर्स भी हैं। जबकि डेढ़ लाख के करीब ब्राह्मण और सवा लाख राजपूत मतदाता हैं। वहीं भूमिहार और वैश्य वोटर भी एक लाख की संख्या में हैं।
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