CBI and CM: केजरीवाल सहित आठ मुख्यमंत्री आ चुके हैं सीबीआई जांच के घेरे में
बीते दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को सीबीआई के समक्ष हाजिर होना पड़ा। हालांकि, वह पहले और आखिरी मुख्यमंत्री नहीं है जो अपने पद पर रहते हुए सीबीआई जांच के घेरे में आए हों।

CBI and CM: राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। कौन किसका दोस्त और शत्रु बन जाता है, कहा नहीं जा सकता। यह सब देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है। यही स्थिति जननेताओं की है। भरपूर मत व समर्थन के बावजूद भी सरकार चलाने वाले जनप्रतिनिधि कभी-कभी ऐसी चूक कर जाते हैं कि उन्हें सीबीआई के समक्ष हाजरी देनी पड़ जाती है। कई बार यह राजनीति से प्रेरित होती है तो कई बार भ्रष्टाचार का मामला होता है। गौरतलब है कि बीते तीन दशकों में सीबीआई के समक्ष पेश होने वाले मुख्यमंत्रियों में उत्तर प्रदेश के नेताओं की संख्या सर्वाधिक है।
सूची में उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव सहित अन्य तीन मुख्यमंत्रियों में उनके पिता और समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष रहे मुलायम सिंह यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व कद्दावर नेता कल्याण सिंह शामिल हैं। इसके अलावा चारा घोटाले में बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस सूची में शामिल हो गए।
अरविंद केजरीवाल
हाल ही में कथित शराब नीति मामले में सीबीआई ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पूछताछ के लिए बुलाया। सीबीआई ने लगभग साढे 9 घंटे तक उनसे पूछताछ की। गौरतलब है कि केजरीवाल के नेतृत्व में फरवरी 2015 के चुनावों में उनकी पार्टी ने 70 में से रिकॉर्ड 67 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया और 14 फरवरी 2015 को वह दोबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। 16 फरवरी 2020 से वे तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं। उल्लेखनीय है कि शराब नीति में कथित फेरबदल को लेकर आप पार्टी के नेता व दिल्ली सरकार के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पहले से ही जेल में है।
शिवराज सिंह चौहान
एमपी व्यावसायिक परीक्षा बोर्ड (व्यापम) द्वारा आयोजित विभिन्न प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं व घोटाले में सरकारी नौकरियां भी फर्जी तरीके से अपात्र लोगों को दी गईं। सीएम शिवराज सिंह ने विधानसभा में स्वीकार किया था कि घोटाले में 1000 फर्जी भर्तियां की गईं थी। उल्लेखनीय है कि यह घोटाला 2007 का है और 2013 में व्हिसल ब्लोअर के ठोस प्रयासों के बाद सीबीआई द्वारा मामले की जांच शुरू हुई।
सीबीआई ने एमपी में पीएमटी 2013 परीक्षा में अनियमितताओं से संबंधित व्यापम मामले में 490 अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। हालांकि, चार्जशीट में सीएम शिवराज सिंह चौहान को क्लीनचिट दे दी गयी। फाइल की गई उस चार्जशीट में 490 लोगों को आरोपी बनाया गया है। साथ ही चार्जशीट में दिग्विजय सिंह के आरोपों को गलत बताया गया है। गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह ने नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से मिली हार्डडिस्क में टेंपरिंग किए जाने के आरोप लगाए थे। जब हार्ड डिस्क की फोरेंसिक जांच कराई गयी तो पाया गया कि उसमें कोई भी छेड़छाड़ नहीं की गयी। इस मामले में 24 आरोपियों की मौतों पर सीबीआई ने कहा कि 16 लोगों की मौत इस घोटाले में पुलिस के आरोपी बनाए जाने से पहले ही हो चुकी थी।
अखिलेश यादव
साल 2005 में विश्वनाथ चतुर्वेदी नाम के वकील ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह, उनके बेटे अखिलेश यादव, बहु डिंपल यादव और दूसरे बेटे प्रतीक यादव के ऊपर आय से अधिक करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाते हुए जनहित याचिका दायर की थी। एक मार्च 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस आरोप की प्राथमिक जांच का आदेश दिया। अक्टूबर 2007 में सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि शुरुआती जांच में उसे मुकदमा दर्ज करने लायक सबूत मिले हैं। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने डिंपल को जांच के दायरे से बाहर कर दिया। मुलायम, अखिलेश और प्रतीक के खिलाफ जांच चलती रही।
हालांकि, बाद में कोर्ट ने उनके पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव और उनसे जुड़े आय से अधिक संपत्ति मामले में आगे सुनवाई से मना कर दिया। याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि 2013 में सीबीआई ने प्राथमिक जांच के बाद मामला बंद कर दिया था। चूंकि मुलायम सिंह यादव का भी निधन हो चुका है। इसलिए अब सुनवाई की जरुरत नहीं है।
इसी बीच समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश ने 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया। उनकी पार्टी को राज्य में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद, 15 मार्च 2012 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। वहीं, एक दूसरे मामले में जांच एजेंसी के मुताबिक खनन मंत्रालय संभालने वाले अखिलेश यादव ने 14 पट्टों को मंजूरी दी थी, जिनमें से 13 को 17 फरवरी 2013 को मंजूरी दी गई थी। सीबीआई का दावा है कि 2012 की ई-निविदा नीति का उल्लंघन करते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय से अनुमोदन प्राप्त करने के बाद, हमीरपुर की जिला मजिस्ट्रेट बी. चंद्रकला द्वारा पट्टे दिए गए थे, जिसे 29 जनवरी 2013 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित किया गया था।
मुलायम सिंह यादव
सुप्रीम कोर्ट ने 5 मार्च 2007 को एक जनहित याचिका पर मुलायम के खिलाफ सीबीआई जांच का आदेश दिया था। जिसमें उन पर मौद्रिक लाभ के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया गया था। मुलायम उस वक्त यूपी के मुख्यमंत्री थे। मुलायम तीन बार क्रमशः 5 दिसम्बर 1989 से 24 जनवरी 1991 तक, 5 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1996 तक और 29 अगस्त 2003 से 11 मई 2007 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे। इसके अतिरिक्त वह केन्द्र सरकार में रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं।
मायावती
एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई 2003 को उत्तर प्रदेश और देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ आगरा में ताजमहल के आसपास के क्षेत्र को विकसित करने के लिए एक परियोजना पर ₹17 करोड़ के गबन के आरोप में सीबीआई जांच का आदेश दिया था। 1997 में और 2002 में वह भाजपा के बाहरी समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनी। दूसरी बार 26 अगस्त 2003 तक केवल एक साल और बाद में 13 मई 2007 से 6 मार्च 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं।
लालू प्रसाद यादव
अस्सी और नब्बे के दशक में बिहार के पशुपालन विभाग के विभिन्न कोषागारों से फर्जी बिल्स के आधार पर करीब ₹900 करोड़ की अवैध निकासी की गयी थी। साल 1985 में बिहार के तत्कालीन महालेखाकार ने भी इस पर आपत्ति उठायी। तब बिहार में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और डॉ. जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री थे। इस बीच बिहार की सत्ता बदली और साल 1990 में तत्कालीन जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने।
इसके बावजूद अवैध बिल पर धन निकासी जारी रही। 1996 में यह पहली बार व्यापक चर्चा का विषय बना। तब बिहार सरकार ने युवा आइएएस अधिकारी अमित खरे को चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम) जिले का उपायुक्त बनाकर भेजा। उन्होंने चाईबासा ट्रेजरी में छापा मारकर कई लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी और ट्रेजरी को सील कर दिया। उसके बाद यह घोटाला पकड़ में आया। इसके बाद कई कोषागारों में छापेमारी की गयी और बिहार पुलिस ने रिपोर्टें दर्ज की। हालांकि बाद में यह मामला सीबीआई को चला गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को भी अभियुक्त बनाया गया।
इसी दौरान 1997 में जब सीबीआई ने उनके खिलाफ चारा घोटाला मामले में आरोप-पत्र दाखिल किया तो 25 जुलाई 1997 को लालू को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा गया। उसी साल 30 जुलाई को उन्होंने पटना में सरेंडर किया और वह इस घोटाले में पहली बार जेल गए।
राबड़ी देवी
19 अगस्त 1998 में बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी पर आय से अधिक सम्पत्ति का मामला दर्ज किया गया। 4 अप्रैल 2000 को लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप पत्र दर्ज हुआ और राबड़ी देवी को सह-आरोपी बनाया गया। 5 अप्रैल 2000 को लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने समर्पण किया और राबड़ी देवी को जमानत मिली। वहीं 18 दिसंबर 2006 को सीबीआई की विशेष अदालत ने राबड़ी और लालू को बरी कर दिया। राबड़ी ने तीन बार बिहार का मुख्यमंत्री पद संभाला। मुख्यमन्त्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल 2 साल का रहा जो जुलाई 1997 से फरवरी 1999 तक चल सका। उनके दूसरे और तीसरे कार्यकाल की अवधि क्रमशः मार्च 1999 से मार्च 2000 और मार्च 2000 से मार्च 2005 तक रही।
कल्याण सिंह
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6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराए जाने के दौरान कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने की अनुमति नहीं दी थी। ढांचा गिराए जाने के बाद कल्याण सिंह सहित कई भाजपा नेताओं के खिलाफ सीबीआई जांच का आदेश दिया गया था। कल्याण तब यूपी के मुख्यमंत्री थे। उन्हें बाबरी मस्जिद की रक्षा के लिए संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं करने के लिए सीबीआई द्वारा चार्जशीट किया गया और मुकदमे का सामना करना पड़ा। इस विध्वंस मामले में अदालत में लंबी सुनवाई चली। इस बीच वह राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। राजस्थान के राज्यपाल का कार्यकाल पूरा होने के बाद सितंबर 2019 में वह लखनऊ लौटे और फिर से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये। इस दौरान उन्होंने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत के समक्ष मुकदमे का सामना किया और अदालत ने सितंबर 2020 में उनके समेत 31 आरोपियों को बरी कर दिया।
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