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Forex: क्यों बढ़ रहा है भारत का विदेशी मुद्रा भंडार

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, यानी भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के पास रखी विदेशी मुद्राओं में संपत्ति, का आकार अब 600 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। इसका सीधा अर्थ है कि विदेशी मुद्रा के मामले में हमारी तरलता बढ़ गई है और अब हमारा देश अपने बाहरी दायित्वों को और अधिक आसानी से पूरा कर सकता है। विदेशी मुद्रा भंडार देश की मुद्रा और अर्थव्यवस्था की स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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विदेशी मुद्रा भंडार की वर्तमान स्थिति

आरबीआई द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार 8 दिसंबर को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चार महीने के उच्चतम स्तर 606.859 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया था, जबकि 1 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 598.897 बिलियन डॉलर था। तब इसमे कुछ कमी आई थी, क्योंकि 14 जुलाई, 2023 को भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार 609.02 बिलियन डॉलर आँका गया था, जो कि 15 महीने के उच्चतम स्तर पर था।
विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा, सोना, विशेष आहरण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा आरक्षित निधि शामिल होते हैं। आरबीआई के अनुसार देश में विदेशी राशि (मुख्य रूप से यूएस डॉलर, यूरो और ब्रिटिश पाउन्ड) के रूप में कुल संपत्ति 5,30,691 मिलियन डॉलर की है, तो स्वर्ण भंडार 44,939 मिलियन डॉलर का। विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 18,195 मिलियन डॉलर है और आईएमएफ में आरक्षित निधि 5,073 मिलियन डॉलर की है।

पिछले पांच वर्षों में भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बढ़ता रहा है। 20 दिसंबर 2019 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4,54,948 मिलियन डॉलर का था, जो 25 दिसंबर, 2020 को बढ़कर 5,81,131 मिलियन डॉलर का हो गया। 8 सितंबर 2021 को भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 6,42,453 मिलियन अमेरिकी डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। फिर 23 दिसंबर, 2022 को यह विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 5,62,808 मिलियन डॉलर पर आ गया और अब 8 दिसम्बर 2023 को 6,06,859 मिलियन डॉलर पर पहुँच गया है।

भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार के प्रमुख स्रोत

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कई स्रोतों से प्राप्त होता है। जिसमें सबसे प्रमुख स्रोत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होता है। देश की वर्तमान राजनीतिक और आर्थिक स्थिति इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार होती है। निर्माण, आईटी, उद्योग और सेवा निर्यात में वृद्धि भी विदेशी मुद्रा कमाने के बड़े स्रोत हैं। भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक विनिमय दरों और मौद्रिक नीतियों के कारण भी विदेशी निवेशक अपनी पूंजी लेकर भारत आते हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने के फायदे

अमेरिकी डॉलर, यूरो और ब्रिटिश पाउंड जैसी प्रमुख मुद्राएं यदि प्रचुरता में हैं तो देश को अतिरिक्त तरलता मिलती है और हम अंतरराष्ट्रीय व्यापार लेनदेन के लिए भुगतान करने में ज्यादा सक्षम होते हैं। इससे देश में आर्थिक स्थिरता आती है और बाहर के निवेशकों का हमारे प्रति विश्वास बढ़ता है। विदेशी मुद्रा का अतिरिक्त भंडार घरेलू मुद्रा को भी स्थायित्व देता है। रुपये में अवमूल्यन की संभावना कम होती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर भी देश अपने विदेशी दायित्वों को आसानी से पूरा कर लेता है। यदि विदेशी मुद्रा के साथ सोने का भंडार भी बढ़ता है तो यह मुद्रास्फीति को अंकुश में रखने में बहुत कारगर होता है। किसी आर्थिक संकट के समय स्वर्ण भंडार एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

क्यों बढ़ रहा है भारत का विदेशी मुद्रा भंडार

सरकार की नीतियाँ: पिछले 9 वर्षों में केंद्र सरकार ने अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार किए हैं। सरकारी बैंकों के विलय, विनिवेश, कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, उज्ज्वला योजना, विमुद्रीकरण, राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली जैसे फैसलों ने दुनिया को एक मजबूत एवं निर्णायक सरकार के रूप में भारत को पहचान दी है। भारत को एक बढ़ती अर्थव्यवस्था के तौर पर देखा जा रहा है। 5 ट्रिलियन इकोनॉमी के लक्ष्य को पार करने के प्रयास में विदेशी निवेशक भी भागीदारी करने को तत्पर नजर आ रहे हैं। इससे नए निवेश आ रहे हैं और भारतीय विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ रहा है।

व्यापार संतुलन: भारत के व्यापार घाटे में लगातार सुधार हो रहा है। हाल ही में पीआईबी द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार अप्रैल-नवंबर 2023 की अवधि में देश का कुल व्यापार घाटा 61.44 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जबकि अप्रैल-नवंबर 2022 के दौरान घाटा 100.38 बिलियन डॉलर घाटा हुआ था, यानी एक साल में व्यापार घाटे में 38.79 प्रतिशत की कमी आई है। इसका सीधा सा मतलब है कि हमारा निर्यात बढ़ रहा है और देश में विदेशी मुद्रा की आय भी बढ़ रही है।

नियंत्रित मुद्रास्फीति: हमारी खुदरा मुद्रास्फीति की दर को भारतीय रिजर्व बैंक ने 5.4 प्रतिशत पर रखा है, हालांकि पूर्व मुद्रास्फीति अनुमान 5.1 प्रतिशत से यह ज्यादा है, फिर भी यह बाजार मूल्य को एक सीमा से बढ़ने से रोकने में समर्थ है। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा खरीदता या बेचता है, जिससे भंडार के स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है।

कुछ नकारात्मक प्रभाव भी है विदेशी मुद्रा भंडार के

यदि विदेशी धन का सही समय और उचित मात्रा में कहीं निवेश नहीं किया गया और भंडार बढ़ता गया तो भंडार रखने की अपनी लागत है, जो ब्याज और देनदारी के रूप में हो सकती है।

अत्यधिक विदेशी संसाधन अर्थव्यवस्था के भीतर मुद्रास्फीति पर दबाव डालते हैं और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ती हैं।

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