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Goa Liberation Day: गोवा मुक्ति दिवस के बारे में कुछ रोचक तथ्य

फरवरी 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि गोवा का प्रश्न महत्त्वहीन है, गोवा के लोग भारत के साथ आना चाहते हैं, इस पर मुझे संदेह है। नेहरू की इसी अरुचि के कारण गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने में कई वर्ष लग गए।

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    Goa Liberation Day: गोवा मुक्ति दिवस के बारे में जानिए रोचक तथ्य | वनइंडिया हिंदी |*News

    गोवा मुक्ति दिवस 19 दिसंबर को मनाया जाता है, इसी दिन साल 1961 को गोवा को पुर्तगालियों से स्वतंत्रता मिली थी। दरअसल, भारत अंग्रेजों से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गया। लेकिन गोवा ने भारत के स्वतंत्र होने के 14 वर्ष बाद पुर्तगालियों के शासन से मुक्ति पाई।

    1510 में पहली बार पुर्तगालियों ने गोवा को अपने कब्जे में लिया था और लगभग 450 वर्षों तक उन्होंने यहां पर शासन किया। भारत ने स्वतंत्र होने के बाद पुर्तगालियों से अनुरोध किया कि वे गोवा को भारत के हवाले कर दें, लेकिन उन्होंने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया।

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    गोवा मुक्ति आंदोलन में लोहिया और लिमये की भूमिका
    कहा जाता है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया अपने मित्र और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. जूलियाओ मेनेज़ेस के आमंत्रण पर गोवा गए थे। वहां जाकर उन्हें पता चला कि पुर्तगालियों ने सार्वजनिक सभा करने पर रोक लगाई हुई है।

    ओमप्रकाश दीपक और अरविंद मोहन ने अपनी किताब 'लोहिया एक जीवनी' में गोवा में लोहिया के संघर्ष के बारे में लिखा, "लोहिया का इरादा तो बीमार शरीर को आराम देने का था, लेकिन गोवा जाकर उन्होंने देखा कि पुर्तगाली शासन अंग्रेजों से भी अधिक बर्बर है। लोगों के पास किसी भी तरह के नागरिक अधिकार नहीं थे। डॉ. लोहिया ने 200 लोगों को इकट्ठा करके एक बैठक की, जिसमें यह तय किया गया कि नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया जाए।"

    18 जून 1946 में डॉ. लोहिया ने पुर्तगाली प्रतिबंध को एक जनसभा करके पहली बार चुनौती दी और पुर्तगाली दमन के विरोध में आवाज उठाई। इस पर लोहिया को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया।

    महात्मा गांधी ने 'हरिजन' में लेख लिखकर पुर्तगाली सरकार के दमन और लोहिया की गिरफ्तारी की कड़ी आलोचना की। गोवा की जनता ने भी लोहिया की गिरफ्तारी पर आक्रोश प्रकट किए। पुर्तगालियों ने माहौल को देखते हुए लोहिया को गोवा की सीमा से बाहर ले जाकर छोड़ दिया। इसके बाद डॉ. लोहिया के गोवा में प्रवेश पर पांच वर्ष का प्रतिबंध लगा दिया गया।

    इसके बाद समाजवादी नेता मधु लिमये ने 1955 में एक बड़े सत्याग्रह का नेतृत्व किया और गोवा में प्रवेश किया। इसके बाद पुर्तगाली पुलिस ने मधु लिमये को गिरफ्तार कर लिया। 1957 में जेल से छुटने के बाद लिमये ने गोवा की मुक्ति के लिए जनता को संगठित करना जारी रखा और विभिन्न वर्गों से समर्थन मांगा।

    गोवा के प्रति नेहरू की उदासीनता
    दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि इस समय कांग्रेस भारत की स्वतंत्रता के लिए अपनी सारी शक्ति केंद्रित किए हुए है। हमें ऐसी छोटी लड़ाइयों पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।

    पुस्तक 'लोहिया एक जीवनी' में यह भी लिखा गया है कि "फरवरी 1947 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यहां तक कह दिया कि गोवा का प्रश्न ही महत्वहीन है। उन्होंने कहा कि गोवा के लोग भारत के साथ आना चाहते हैं, इस पर मुझे संदेह है।" इसके बाद गोवा की स्वतंत्रता का आंदोलन कमजोर पड़ने लगा। लेकिन गोवा के लोगों ने डॉ. लोहिया से स्वतंत्रता की प्रेरणा ले ली थी।

    आजाद गोमांतक दल की सक्रियता
    पुर्तगाली दमन से परेशान गोवा के लोगों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर स्वयं को संगठित करना शुरू किया। गोवा से पुर्तगालियों को भगाने के लिए एक क्रांतिकारी दल 'आजाद गोमांतक दल' सक्रिय था। इस दल के प्रमुख नेताओं में विश्वनाथ लवांडे, नारायण हरि नाईक, दत्तात्रेय देशपांडे और प्रभाकर सिनारी शामिल थे। इन लोगों ने पुर्तगाली पुलिस और बैंकों पर हमले किए। इसके कई सदस्यों को पुर्तगाली पुलिस ने गिरफ्तार करके अंगोला की जेल में लम्बे समय तक रखा। विश्वनाथ लवांडे और प्रभाकर सिनारी जेल से भागने में कामयाब रहे और क्रांतिकारी आंदोलन चलाते रहे।

    गोवा मुक्ति आंदोलन में संघ का योगदान
    क्विंट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, जून 1955 में जनसंघ की कार्यसमिति की बैठक हुई। इस बैठक में गोवा में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया गया। आरएसएस के सदस्य और कर्नाटक के जनसंघ नेता जगन्नाथ राव जोशी ने इसका नेतृत्व किया। जैसे ही उन्होंने गोवा में प्रवेश किया, पुर्तगाली सेना ने उन पर हमला कर दिया। उनको प्रताड़ित किया गया। उन्होंने तीन हजार स्वयंसेवकों के साथ जून से अगस्त 1955 तक लगातार सत्याग्रह किया। इस सत्याग्रह में महिलाएं भी शामिल थीं। पुर्तगाली सरकार ने जगन्नाथ जोशी सहित कई स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें दस वर्ष की कठोर सजा सुनाई।

    जगन्नाथ जोशी से प्रेरित होकर 'गोवा मुक्ति विमोचन समिति' (ऑल पार्टी गोवा लिबरेशन कमेटी) ने गोवा में सत्याग्रह चलाया। 15 अगस्त 1955 को पूरे भारत से 8000 लोग गोवा में जमा हुए। पुर्तगाली सेना ने इन लोगों पर गोली चला दी। कहा जाता है कि इस गोलीबारी में लगभग 51 लोगों की जान चली गई और 225 से अधिक लोग घायल हो गए।

    पाञ्चजन्य (1955) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने एक वक्तव्य में कहा, "गोवा में पुलिस कार्रवाई करने और गोवा को मुक्त कराने का इससे ज्यादा अच्छा अवसर नहीं मिलेगा। इससे हमारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी होगी और आसपास के जो देश हमारे लिए खतरा हैं, उन्हें भी सबक मिल जाएगा। भारत सरकार ने गोवा मुक्ति आंदोलन का साथ न देने की घोषणा करके मुक्ति आंदोलन की पीठ में छुरा घोंपा है। भारत सरकार को चाहिए कि भारतीय नागरिकों पर हुई इस अमानवीय गोलीबारी का जवाब दे और मातृभूमि का जो भाग अभी तक विदेशियों का गुलाम बना हुआ है, उसे अविलंब मुक्त कराने का प्रयास करे।"

    संघ प्रचारक राजाभाऊ महाकाल का बलिदान
    वर्ष 1955 में गोवा की मुक्ति के लिए आंदोलन प्रारम्भ होने पर देश भर के स्वयंसेवकों ने गोवा के लिए प्रस्थान किया। उज्जैन के जत्थे का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक राजाभाऊ महाकाल ने किया। 14 अगस्त 1955 की रात में लगभग 400 सत्याग्रही सीमा पर पहुंच गए। सबसे आगे वसंतराव ओक चल रहे थे और उनके पीछे चार-चार की संख्या में सत्याग्रही सीमा पार करने लगे। इस पर पुर्तगाली सैनिकों ने उन्हें चेतावनी दी, पर सत्याग्रही नहीं रूके।

    राजाभाऊ तिरंगा झंडा लेकर जत्थे में सबसे आगे थे। पुर्तगाली सैनिकों ने गोलियां चलानी शुरू की। सबसे पहले वसंतराव ओक के पैर में गोली लगी। फिर पंजाब के हरनाम सिंह के सीने पर गोली लगी और वे गिर पड़े। इसके बावजूद राजाभाऊ आगे बढ़ते रहे। अतः सैनिकों ने उनके सिर पर गोली मार दी। गोली लगने से राजाभाऊ मूर्छित होकर गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई।

    गोवा मुक्ति संग्राम के प्रथम बलिदानी
    26 वर्षीय बाला मापारी 'आजाद गोमांतक दल' के सदस्य थे। उन्हें गोवा मुक्ति संग्राम का पहला बलिदानी माना जाता है। उनके नेतृत्व में गोमांतक दल के क्रांतिकारियों ने अस्सोनोरा पुलिस चौकी पर हमला करके उस पर कब्जा कर लिया और पुर्तगाली पुलिस के शस्त्रागार पर अपना अधिकार जमा लिया।

    पुर्तगाल पुलिस ने इसे अपना अपमान समझा और पुलिस के एक बड़े समूह ने क्रांतिकारियों पर हमला बोल दिया। बाला मापारी को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन पर पुर्तगाल पुलिस द्वारा गुप्त सूचनाएं देने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन उन्होंने अपना मुंह नहीं खोला। इसके लिए उन्हें बहुत बेरहमी से प्रताड़ित किया गया और इसी प्रताड़ना के चलते उनकी पुलिस हिरासत में ही 18 फरवरी 1955 को मृत्यु हो गई।

    गोवा मुक्ति के लिए 'ऑपरेशन विजय'
    आखिर में जनता के दवाब में वर्ष 1961 में भारत सरकार ने पुर्तगालियों के चंगुल से गोवा को स्वतंत्र कराने का निर्णय किया। दरअसल, नवंबर 1961 में पुर्तगाली सैनिकों ने गोवा के मछुआरों पर गोलियां चलाईं, जिसमें एक मछुआरे की मौत हो गई।

    इसके बाद भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बैठक की और 17 दिसंबर 1961 को यह निर्णय लिया गया कि 'ऑपरेशन विजय' के तहत 30 हजार भारतीय सैनिकों को गोवा भेजा जाएगा। भारतीय सेना की ताकत को देखते हुए पुर्तगालियों ने 36 घंटे के अंदर ही घुटने टेक दिए और गोवा छोड़ने का निर्णय कर लिया।

    19 दिसंबर 1961 को गोवा के पुर्तगाली गवर्नर जनरल मैनुअल एंटोनियो वसालो ए सिल्वा ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह गोवा 450 वर्ष बाद पुर्तगालियों से मुक्त हो गया।

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