FCRA Licence: क्या है विदेशी चंदा लेने से जुड़ा कानून और उससे जुड़े विवाद ?
विदेशी अनुदान अधिनियम बनाने का उद्देश्य था कि विदेशों से डोनेशन लेने वाली सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं पर नजर रखी जा सके। साथ ही यह सुनिश्चित किया जा सके कि उस अनुदान का देश-विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न हो।

13 दिसंबर 2022 को लोकसभा में सौगत राय (टीएमसी सांसद) के एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि 2019 से 2021 तक 1811 संगठनों के विदेशी चंदा (विनियमन) अधिनियम (FCRA) पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द किये गये।
किसी भी गैर-सरकारी संस्था यानि NGO को विदेशों से चंदा अथवा अनुदान लेने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी अनिवार्य है। अनुमति मिलने पर उक्त संस्था को विदेशी चंदा (विनियमन) अधिनियम (FCRA) नाम से एक लाइसेंस दिया जाता है। जब किसी संस्था द्वारा एफसीआरए के अंतर्गत मिले विदेशी पैसे के दुरुपयोग का मामला सामने आता है तो केंद्रीय गृह मंत्रालय उस संस्था का एफसीआरए लाइसेंस निरस्त करने का अधिकार भी रखता है।
कब और क्यों बना FCRA
साल 1969 में एफसीआरए को लेकर संसद में चर्चा हुई, लेकिन 1976 में आपातकाल के दौरान इसे अधिनियमित किया गया। उस समय आशंका व्यक्त की गयी थी कि विदेशी ताकतें स्वतंत्र संगठनों/संस्थाओं के माध्यम से भारत में अनुदान भेजकर देश के मामलों में हस्तक्षेप कर रही हैं। इसी शंका को लेकर FCRA कानून का गठन किया गया, जिसकी सहायता से विदेशों से मिलने वाले अनुदान पर नियंत्रण रखा जा सके। साथ ही यह सुनिश्चित किया जा सके कि उस अनुदान का देश-विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न हो।
गौरतलब है कि अगर किसी संस्था/एनजीओ के पास FCRA प्रमाणपत्र नहीं है तो वह विदेशों से अनुदान प्राप्त करने के लिए अधिकृत नहीं होगी। इस प्रमाण पत्र की अवधि पांच वर्ष तक होती है, अगर कोई संस्था एफसीआरए के निर्धारित नियमों का ठीक से पालन करती है तो उसके लाइसेंस का नवीनीकरण किया जा सकता है।
वर्तमान FCRA कानून क्या कहता है
1 जुलाई 2022 को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना अनुसार, "केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) नियमावली 2011 में संशोधन कर नए नियम जोड़े हैं। यह नियम विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2022 कहा जाएगा।"
इस नए संशोधन के अनुसार नियम 6 में दो प्रावधान जोड़े गए हैं, जिसके अनुसार 'एक लाख रुपये' शब्द को 'दस लाख रुपये' और 'तीस दिन' को 'तीन महीने' शब्द से बदला गया है। जिसका अभिप्राय है कि यदि विदेशी अनुदान की राशि 10 लाख रुपये से अधिक होगी तो इसकी सूचना 90 (तीन महीने) दिन पहले अधिकारियों को देनी अनिवार्य होगी।
इसके अलावा, इस संशोधन के अनुसार विदेशी अनुदान भारतीय स्टेट बैंक, नई दिल्ली की एक शाखा में खुले बैंक अकाउंट में ही प्राप्त किया जा सकता हैं और उस खाते में विदेशी अनुदान के अलावा और अन्य कोई राशि जमा नहीं की जा सकती। इस विदेशी अनुदान को अन्य किसी व्यक्ति को हस्तांतरित करना भी अब प्रतिबंधित किया गया है।
FCRA के तहत हुई बड़ी कार्रवाई
एफसीआरए के तहत विभिन्न संस्थाओं/संगठनों को विदेशी अनुदान मिलता रहा है। वर्ष 1982 में यह 233.78 करोड़ रूपये था जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 11548.28 करोड़ रूपये पहुंच गया और 2020 आते-आते लगभग दोगुना हो गया।
FCRA की वेबसाइट से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1 जनवरी 2022 तक पंजीकृत एनजीओ की संख्या 16829 रह गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2016 से 2020 के बीच 6,600 से अधिक एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द और लगभग 264 NGOs के लाइसेंस को निलंबित किया गया। दरअसल, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब से एफसीआरए कानून बना है, तब से ही ऐसे संगठनों/संस्थाओं के लाईसेंस रद्द अथवा निलंबित किया गया है, जो मानकों को पूरा नहीं करते।
1984 में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री पी. केंकटसुब्बैया ने दीनी तालीमी परिषद (उत्तर प्रदेश) के विदेशी अनुदान पर रोक लगा दी थी। फिर 1987 में गृहराज्य मंत्री पी चिदंबरम के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 125 संस्थानों का रजिस्ट्रेशन सहित 35 संगठनों का पंजीकरण रद्द किया था।
केंद्रीय गृहराज्य मंत्री एमएम जैकब के अनुसार साल 1989, 1990 व 1991 में 21 संगठनों पर कार्यवाही की गयी थी। वही, 1992 से 1995 के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 23 संगठनों पर कार्यवाही की। साल 2001 में तत्कालीन गृहराज्य मंत्री सी विद्यासागर राव ने अधिकारिक रूप से 945 संगठनों पर कार्यवाही की पुष्टि की थी। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार (2004 से 2014) के दौरान भी अनेक संगठनों के लाईसेंस रद्द एवं पंजीकरण निरस्त किये गए थे।
25 दिसंबर 2021 को मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का रजिस्ट्रेशन FCRA के तहत रिन्यू करने से इनकार कर दिया गया। दरअसल, केंद्र सरकार के अनुसार इस संस्था से संबंधित कुछ प्रतिकूल इनपुट पाए गए थे और लाइसेंस 31 अक्टूबर तक ही वैध था। हालांकि 7 जनवरी 2022 को इसे फिर से बहाल कर दिया गया था।
23 अक्टूबर 2022 को राजीव गांधी फाउंडेशन का FCRA लाइसेंस निरस्त कर दिया गया। इसके संबंध में गृहमंत्री अमित शाह ने बताया कि लाइसेंस रद्द होने की खास वजह थी कि संस्था ने वित्तीय वर्ष 2005-06 तथा 2006-07 में चीनी दूतावास से 1.35 करोड़ रुपये का अनुदान प्राप्त किया था। इसके अलावा, इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के फाउंडर जाकिर नाइक की संस्था भी प्रतिबंधित हो चुकी है, क्योंकि इसे मिलने वाला विदेशी चंदा भी FCRA के नियमों के मुताबिक सही नहीं था।
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