संसद हमले को हुए 18 साल, आज से 6 साल पहले फांसी पर लटकाया गया था दोषी

नई दिल्ली। आज से 18 साल पहले 13 दिसंबर, साल 2001 को भारत की संसद पर हमला किया गया था। लोकतंत्र के इस मंदिर पर आतंकी हमला हुआ था। उस वक्त संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था और विपक्ष के हंगामे के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित हो गई थी। लेकिन उस वक्त किसी को इस बात का अंदेशा भी नहीं होगा कि यहां कोई आतंकी हमला होने वाला है।

मास्टरमाइंड था अफजल गुरु

मास्टरमाइंड था अफजल गुरु

इस हमले से पूरा देश हैरान रह गया था क्योंकि हमला देश की राजधानी में संसद पर हुआ था। आज इस हमले को 18 साल पूरे हो गए हैं। इस हमले को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने अंजाम दिया था। हालांकि बाद में इसके मास्टरमाइंड अफजल गुरु को मौत की सजा दी गई थी।

9 लोगों की मौत

9 लोगों की मौत

इस हमले में 9 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई घायल भी हुए थे। हालांकि सुरक्षाकर्मियों ने भी 5 आतंकी मार गिराए थे। हमले के दो दिन बाद ही दिल्ली पुलिस ने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सदस्य अफजल गुरु को जम्मू-कश्मीर से पकड़ लिया था। अफजल के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज के एसएआर गिलानी, अफसान गुरु और शौकत हुसैन गुरु को भी गिरफ्तार किया गया।

मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा

मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा

मामले की सुनवाई चली और एक साल बाद ही अफजल गुरु, शौकत हसन और गिलानी को मौत की सजा सुनाई गई। साथ ही अफसान गुरु को बरी कर दिया गया। इसके बाद 2003 में गिलानी भी दिल्ली हाईकोर्ट से बरी हो गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शौकत हसन की मौत की सजा को 10 साल के कारावास में बदला गया।

12 साल बाद फांसी पर लटका

12 साल बाद फांसी पर लटका

लेकिन अफजल गुरु की सजा बरकरार रही और उसे हमले के 12 साल बाद यानी 9 फरवरी, 2013 को फांसी पर लटकाया गया। अफजल आखिरी वक्त तक यही सोचता रहा कि उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसे ये बात 8 फरवरी को बताई गई कि अगले दिन 9 फरवरी को उसे फांसी पर लटका दिया जाएगा।

अफजल गुरु कौन था?

अफजल गुरु कौन था?

अफजल गुरु भारतीय संसद पर हुए हमले का मास्टरमाइंड और आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य था। वह जम्‍मू-कश्‍मीर के बारामूला जिले के सोपोर का रहने वाला था और एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा था। इसके साथ ही वह आईएएस की परीक्षा की भी तैयारी कर रहा था। पढ़ाई के दौरान ही वह जम्‍मू-कश्‍मीर लिबरेशन फ्रंट का सदस्‍य बन गया और आतंकवादी बनने की ट्रेनिंग लेने लगा।

पाकिस्तान में आतंकियों से मुलाकात

पाकिस्तान में आतंकियों से मुलाकात

फिर वह पाकिस्तान में अन्य आतंकियों से मिला और वहां फिदायीन हमले की ट्रेनिंग ली। जम्मू-कश्मीर का होने के नाते उसे पूरी उम्मीद थी कि वह फांसी से बच जाएगा। कश्मीरी उग्र ना हों इसलिए उसकी मौत की सजा हटा दी जाएगी। फिर 3 फरवरी, साल 2013 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उसकी दया याचिका को ठुकरा दिया और 9 फरवरी को उसे फांसी पर लटकाया गया।

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